Monday, 5 September, 2011

व्यवस्था परिवर्तन बनाम सत्ता परिवर्तन

भगवान स्वरूप कटियार
हम ६२-६३ सलों से चुनाव के जरिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन कर रहे हैं,जबकि समय का तकाजा है व्यवस्था परिवर्तन का . वैसे सत्ता परिवर्तन से भी व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है बषर्ते सत्ता में बैठे लोगों के अन्दर व्यवस्था परिवर्तन की इच्छा षक्ति ,प्रतिबद्धता और जनसरोकारों के प्रति ईमानदारी हो . हमारे ताजे राजनैतिक इतिहास में दो ऐसे उदाहरण दिखाई देते हैं जब व्यवस्था परिवर्तन की पहल की गयी और उन्हे अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी . डा॰ अम्बेड्कर जब कानून मंत्री की हैसियत से हिन्दू कोड बिल संसद में लाये तो उसे स्वीकार नहीं किया गया और उन्होंने कानून मंत्री पद से स्तीफा दे दिया . हिन्दू कोड बिल हिन्दू समाज की स्त्रियों की सामाजिक - आर्थिक स्थिति सुधारने का बुनियादी समाधान था . जिसे बाद की सरकारों ने टुकड़ो-टुकड़ो में कमजोर तरह से उसके प्रविधानों को लागू किया . जनता से चुनी गयीं सत्ताएं जनता को अधिकार और सत्ता सौपने में बहुत डरतीं हैं . दूसरा उदाहरण है जब वी॰पी॰ सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिसें लागू करने का फैसला लिया ,जैसे भुचाल आ गया . क्या क्या नहीं सहा सामाजिक न्याय के उस महानायक ने ़ किसी के पास मंडल के विरोध में ठोस तर्क नहीं थे . दबी कुचली कौमों को उठाने का काम क्यों किया जाय वे तो सिर्फ षासित होने के लिए हैं .पर बिडम्बना देखिए कि कंमडलवादियों ने भी अपनी राजनीत का सबसे अधिक राजनीतीकरण किया जिसके तहत कल्याण सिंह, उमा भारती ,विनय कटियार ,गोपीनाथ मुन्डे जैसे नेता स्थापित हुए.यह अलग बात है कि कंमडलवादी उन्हें हजम नहीं कर पाये . आज जन लोकपाल कानून का मुद्दा भी व्यवस्था परिवर्तन का मुद्दा है जिसे कोई भी राजनैतिक दल हजम नहीं कर पा रहा है . वे सिर्फ चुनाव को ही लोक्तंत्र मानते है और उसे वहीं तक सीमित भी रखना चाहते हैं . जनता को मतदान का अधिकार देकर सरकार के जनता कए प्रति सारे दायित्व समाप्त हो जाते हैं . सरकार में बैठे लोग सोचते हैं कि संसद ही सर्वोपरि है . यह बात कानून पास कराने तक तो सच है ,उसके लिए तो संसद या विधायिका सर्वोपरि हो सकती है . पर जनता के द्वारा चुनी गयी संसद और उसके प्रतिनिधि संासद जनता से ऊपर कैसे हो सकती . लोकतंत्र में तो जनता और उसके सामूहिक हित ही सर्वोपरि होते हैं . इस तरह संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देना अंहकार है और इसी अंहकार के कारण सभी क्षेत्रों में भ्रश्टाचार फैला है .
लालू, मुलायम,और मायावती जब लोकतंत्र की दुहाई देते हुए कहते हैं कि यदि लोकतंत्र ना होता तो उनके जैसे लोगों को कभी सत्ता नसीब नहीं होती , पर उनसे लोकतंत्र को क्या मिला-भ्रश्टाचार और राजनीत का अपराधीकरण. क्या यही थे डा॰ अम्ब्रडकर और डा॰ लोहिया के आदर्ष और सपने . क्या लोकतंत्र का फलना फूलना भ्रश्टाचार का फलना फूलना है ,राजनीत का अपराधीकरण होना है. तो लानत है ऐसे लोकतंत्र पर और हम गुलाम बेहतर थे कमसेकम एक व्यवस्था तो थी और हम अफसोस कर लेते थे कि क्या करें हम परतंत्र थे . आज जरूरत है लोकषक्ति को मजबूत करने की क्योंकि लोकषक्ति ही लोकषाही की असली ताकत है और इसी लोकषक्ति से निरंकुष सत्ता की बांह मरोड़ी जा सक्ती है . सत्ता परिवर्तन को गांधी ने कभी आजादी नहीं माना . इसीलिए उन्होंने आजादी के बाद कंग्रेस को खत्म कर लोकसेवक संघ बनाने की बात कही थी . वे चाहते थे कुछ अच्छे लोग जनता के बीच रहें क्योंकि असली सत्ता तो जनता की है . जयप्रकाष नारायण भी लोकषक्ति मजबूत करने के लिए संघर्शरत रहे .जवाहरलाल नेहरू उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाना चाहते थे पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया और ताजिन्दगी जनता के बीच जनता की लड़ाई लड़ते रहे़.
देष में एक प्रभावी और स्वायत्त लोकपाल देष में एक बुनियादी परिवर्तन कारगर उपाय है जिससे भले ही व्यवस्था पूरी तरह न बदले पर परिवर्तन की संभावनाओं का सषक्त मार्ग प्रषस्त हो सकता है और परिवतन के बहुत सारे दरवाजे खुल सकते हैं . वैसे व्यस्था में आमूल चूल परिवर्तन के लिए तो इस पूंजीवादी व्यवस्था के सारे ढांचे को ही ढहाना होगा और उसकी स्थान पर श्रम की सर्वोच्च सत्ता कायम करनी होगी . यही था हमारे क्रान्तिकारियों का सपना जिसके लिए उन्होंने षहादत दी . आखिर स्वयत्त और प्रभावी लोकपाल से डर कौन रहा है? भ्रश्टाचार से दुखी कौन है? आम आदमी ना कि भ्रश्टाचार में लिप्त सत्ता वर्ग और उसके कृपापाात्र .जिस समय देष में बहस होनी चाहिए कि कैसा लोकपाल चाहिए पर मुद्दे से भटकाने के लिए बहस की जा रही संसद की गरिमा पर , प्रधानमंत्री और न्यायपालिका की गरिमा और विष्वसनीयता पर . षायद वे भूल रहे हैं इन पवित्र संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और विष्वसनीयता को सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों ने ध्वस्त किया है जो उसकी दुहाई दे रही है.
संसद की गरिमा और प्रधानमंत्री तथा न्याय्ापालिका की विष्वसनीयता यदि आज बची होती तो षायद लोकपाल जैसी संस्था के बारे में सोचने की जरूरत ही ना पड़ती और उसे पुनः जीवित करने के ले ही एक स्वायत्त और प्रभावी लोकपाल संवैधानिक संस्था की जरूरत महसूस की जा रही ताकि अंहिसक तरीकों से देष को भ्रश्ट काले अंग्रेजों से मुक्त कराया जा सका . और इसके लिए यदि संविधान में संसोधन और धन की आवष्यकता है तो उससे गुरेज क्यों है . लोकपाल के गठन से भ्ररश्टाचार पर प्रभावी अंकुष लगेगा उससे देष को राजस्व की एक बड़ी धनराषि अर्जित होगी . इसी के साथ आम आदमी से जुड़े मुद्दे जैसे एक जैसी निषुल्क षिक्षा, चिकित्सा,न्याय और रोजगार व्यव्स्था के लिए संघर्श को भी आजादी की इस दूसरी लड़ाई से जोड़ने की जरूरत है़ ़ आज कोई भी राजनैतिक दल खुल कर अण्णा हजारे के मसौदे के साथ
खड़ा नहीं दिखता सिर्फ कुछ वामपंथी दलों के . सामाजिक न्याय के नेता जैसे रामविलास पासवन , मुलायम सिंह यादव ,मायावती के पैरों के नीचे की धरती ही खिसक गयी हो . गरीब किसान परिवार से आये इन नेताओं से बड़ी उम्मीदें थीं . डा॰ अम्बेडकर और डा॰ लोहिया के नाम पर ये सब एक बड़ी लानत हैं . सामाजिक न्याय के ये सब अपराधि हैं और जनता तथा इतिहास इन्हें कभी मांफ नहीं करेगा . आखिर गरीब घरों के इन नेताओं के पास अरबों रुपयों की सम्पत्ति आयी कहां से? ये सब देषद्रोही है और स्वाय्ात्त लोकपाल इन सबको जेल का रास्ता दिखायेगा . इसलिए लालू जी कहते हैं कि लोकपाल तो नेताओं पर अफ्सर बैठाने की साजिष है . नेता क्या कानून से ऊपर है लालू जी जो उसे घोटाले पर घोटाले करने की छूट देदी जाय .
समझनेकी पहली बात यह है कि अण्णा हजारे का प्रस्तावित लोकपाल कानून कोई व्यक्ति नहीं एक पूरी संवैधानिक संस्था है . इसमें जांच विभाग और अदालत में मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन विभाग और इन सबकी निगरानी रखने के लिए अध्यक्ष सहित ग्यारह सदस्यों का पैनल होगा . यह व्यवस्था केन्द्र सरकार के ४॰ लाख कर्मचारियों के लिए होगी और इसी तर्ज पर हर एक राज्य में लोकायुक्त संस्था होगी . देष का कोई भी नागरिक लोकपाल या लोकायुक्त के पास केन्द्र या राज्य के किसी कर्मचारी या प्रतिनिधि के भ्रश्टाचार की षिकायत लेकर जा सकेगा . पूरी पारदर्षिता से समयबध्द ढंग से जांच कर संम्धित को दंडित किया जायेगा . अगर जांच प्रधनमंत्री , जजों और सांसदों के विरुध्द है तो जांच षुरू होने से पहले लोकपाल की सात सदस्यीय पीठ जिस्में विधिक पृश्ठभूमि के सदस्य होंगे तय करें गे कि जाांच होनी चाहिए या नहीं. . लोकपाल सरकार के प्रति नहीं बल्कि जनता के प्रति जबाबदेह होगी इसलिए लोकपाल को किसी की भी षिकायत पर सर्वोच्च न्यायालय के आधाार पर दंडित किया जा सकेगा . देष आज बेहद नाजुक दौर में है .देष के रक्षक ही देष के दुष्मन हैं .यह लड़ाई जटिल और कठिन पर लड़नी तो है और लड़ी भी जायेगी .

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