Monday 5 September 2011

प्रयोगधर्मी फिल्मकार मणि कौल का जाना

( स्मृति षेश )
भगवान स्वरूप कटियार
सिनेमा के जरिये रूढ़ियों का विरोध और नयेपन का अह्सास कराने वाले प्रयोगधर्मी फिल्मकार मणि कौल का जाना पूरे संस्कृति जगत के लिए एक गहरा धक्का है. महज ६६ वर्श की उम्र में मणि कौल का निधन प्रगतिषील सिनेमा आन्दोलन को एक जबरजस्त झटका है.उन्होंने भारतीय सिनेमा को बेहतरीन फिल्में दीं .उन्होंने लीक पर चलने वाले सिनेमा से हट कर एक अलग पहचान बनाई.राजस्थान के जोधपुर के एक कष्मीरी परिवार में जन्में कौल ने अपने फिल्मी करियर की षुरुआत १९६९ में ”उसकी रोटी “ फिल्म से की जिसे १९७१ में बेहतरीन फिल्म की श्रेणी का फिल्मफेयर क्रिटिक पुरस्कार मिला. बाद में यही पुरस्कार उनकी तीन अन्य फिल्मों १९७२ में ” असाढ़ का एक दिन “ ,१९७४ में “दुविधा “ और १९७३ में ईडियट को मिला . “ दुविधा“ के लिए उन्हें सर्वश्रेश्ठ निर्देषक के राश्ट्रीय पुरस्कार् से भी सम्मानित किया गया. १९८९ में कौल को उनके वृत्तचित्र ” सिध्देष्वरी“ के लिए रार्श्ट्रीय पुरस्कार भी मिला . पुणे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (पिएफटीआईआ्ई) से उन्होंने ने १९६६ में स्नातक किया .१९७१ में कौल बर्लिन अन्तराश्ट्रीय फिल्मफेस्टीवल के जूरी सदस्य भी रहे जो भारतीय फिल्म जगत के लिए गर्व कि बात थी . जाने माने फिल्म निर्देषक महेष कौल के भतीजे मणि कौल ने पूना फिल्म इन्स्टीटयूट में पढ़ाने के अलावा वर्श २॰॰१-२॰॰२ में हावर्ड विष्वविद्यालय में विजिटिंग लेक्चरर भी रहे . उन्होंने “घासीराम कोतवाल“ ,“ सतह से उठता आदमी“, “ ध्र्ु्रवपद “,“नौकर की कमीज“ ,“मंकीज रेनकौट “ बोझ ,नजर जैसी महत्वपूर्ण फिल्में बनाकर न सिर्फ भाारीय सिनेमा बल्कि विष्व सिनेमा को समृध्द किया . सिनेमा के इतिहास में मणि कौल की एक अपनी पहचान है. उन्होंने सिनेमा के वैचारिक स्तर को बढ़ाया . भारतीय सिनेमा में वे नयी लहर के पथप्रदर्षक थे और उन्होंने सिनेमा में नये भावों और नयी भाशा की खोज की . मौलिक सर्जक की तरह मणि कौल का काम बिल्कुल अपनी तरह का है. उनके सिनेमा में साहित्य, कविता और चित्रकला समेत अनेक कला माध्यमों का विलक्षण समिश्रण है . उनकी सिध्देष्वरी और दुविधा जैसी फिल्मों में विविध कलात्मक मिश्रण साफ झलकता है .
मणि कौल जितने बड़े फिल्मकार थे उतने ही बड़े धु्रवपद षिक्षक और धु्रवपद गयक भी थे .सिनेमा की अनुभूत उनके लिए सबसे जरूरी चीज थी . इसलिए हर स्तर पर वे प्रयोग करते रहे . कथा, दृष्य ,संवाद , ध्वनि , संगीत आदि सभी पक्षों पर उनकी बारीक नजर रहती थी . पर कभी भी उन्होंने इनमें से किसी को लेकर पूर्व धारणा या तय रूप रेखा के आधार पर उन्होंने कभी फिल्मांकन नहीं किया . वे मुक्त भाव से द्दष्यों को कैद करते और ऐसे संयोगो को घटित होने देते जिनके जरिए अनुभूत और अधिक प्रगाढ़ बनाया जा सके . ऐसे में कहानी उनके लिए बाधा नहीं बनती . बगैर किसी संवाद के लम्बे द्दष्य , बीच में कहीं कोई सिर्फ आवाज भर . इस तरह् उनकी फिल्मों में एक मामूली आवाज भी कथन की षक्ल अख्तियार कर लेती . द्दष्य में जितना महत्व दो पात्रों को देते उतना ही महत्व खुली जगहों को भी . यही बजह थी की वे कैमरामैन से कहते कि द्दष्य को परदे पर देखते हुए नहीं बल्कि बन्द आंखों से फिल्मांकन करें.ें इसमें पा्त्रों और वस्तुओं की स्थितियां जो भी रहें वे परवाह नहीं करते थे . उन्हें उनके स्वाभाविकरूप में दर्षानए के पक्षधर रहेे . इस तरह एक एक भंगिमा और मामूली हरकतों पर भी उनकी नजर रह्ती थी . कैमरे को पात्रों के चेहरे पर केन्द्रित करने के बजाय कौल उनके हॉथ,उनकी उगलियों ,उनके सिर ,पैर पर आदि की स्थित पर ध्यान देते . इस तरह समान्तर सिनेमा के फिल्म निर्माताओं में मणि कौल ज्यादा प्रयोगधर्मी थे . वे कहते थे कि फिल्म और वृत्तचित्र में बहुत बारीक फर्क है इसलिए फिल्म को भी वृत्तचित्र की तरह मुक्तभाव से फिल्मांकित किया जाना चाहिया . उनकी ज्यादातर फिल्मों की विशय वस्तु हिन्दी की किसी साहित्यिक रचना पर आधारित है . पर उानकी रुचि साहित्य तक सीमित नहीं थी . कला के विविध पक्षों को उन्होंने बड़े मनोयोग से विविध रंगों में उकेरा है .
“ सिध्देष्वरी“ में कविता ,“धु्रवपद“ में संगीत ,“दुविधा“ में चित्रकला, “सतह से उठता आदमी “ में वास्तुषिल्प को महत्व देना इसका प्रमाण है . वे कई बार द्दध्य के रूप में किसी चित्र या किसी षिल्प को प्रस्तुत कर प्रभाव पैदा करते थे . उनमें गजब का खुलापन था. वे वर्जनाओं और बन्धनों के षख्त खिलाफ थे . वे अभिनय करने वालों को खुला छोड़ देते थे ताकि किरदार अपने तरीके से जी सके . इसी तरह से संपादन के मामले में वे कोई रेखा नहीं खीचते थे . वे मानते थे कि चीजें विचार से षुरू ना हों बल्कि विचार तक पहुचें . वे ना तो अतिनाटकीयता में विष्वास रखते थे और ना ही बेवजह की चुप्पी में . जहां उन्हें प्रभावी अनिभूति नजर आती वहीं वे द्दष्य को पूर्ण मान लेते . अनायासपन उन्हें पसंद था .इस तरह् उनकी एक फिल्म में कई फिल्मों का आभास पाया जा सकता है . जिस दौर में उन्होंने फिल्म जगत में कदम रखा उस समय तक सिनेमा पैस कमाने का एक षक्तिषाली स्रोत बन गया था पर मणि कौल सिनेमा को व्यवसाय की बजाय कला के रूप में अपनाया और कुछ महत्वपूर्ण और मूल्यवान देने के लिए जोखिम उठाते रहे . वे हमेषा ऐसे दर्षकों को पैदा करने की जद्दोजहद करते रहे जिनके लिए सिनेमा में षिल्प और अनुभूति मायने रखती हो . इस तरह मृणालसेन और कुमार षाहनी से कदम से कदम मिलाते हुए मणि कौल ने नई धारा के सिनेमा को निरंतर आगे बढा़ने का प्रयास किया . उनका जाना वास्तव में कलात्मक मूल्यों की चाह रखने वलों के लिए एक गहरे सदमें की घड़ी है . मणि कौल अभी तक भारतीय सिनेमा के लिविंग लिजेन्ड थे और अब ऐतिहासिक किवदन्ति बन गये . सिनेमा जगत उनका सदैव ऋणि रहेगा . उनकी प्रगतिषील परम्परा को सतत आगे बढ़ाना ही उनकी प्रति सच्ची श्रध्दांजलि होगी .

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