Thursday, 15 September, 2011

विश्व शांति बनाम हथियारों का कारोबार



भगवान स्वरूप कटियार
दुनिया की सबसे बडी ताकत अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को गत वर्श विष्व शान्ति के नोबेल पुरश्कार से नबाजा गया.यह बार बार सिध्द हो रहा है कि व्यक्ति, कुर्सी का चरित्र और चेहरा नहीं बदल बाता पर कुर्सी व्यक्ति का चेहरा बदल देती है.विश्व शान्ति पुरस्कार से नबाजे गये अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देष में हथियारों के कारोबार को लगातार बढावा दे रहे . उसके पीछे सोची समझीे चाल यह है कि दुनियां के गरीब देष विकास करें और आत्म निर्भर बनने की बजाय हथियार खरीदे और आपस में लडे और अमेरिका का हथियार कारोबार फले फूले और उसकी चौधराहट दुनियां में बरकरार रहे.जरा देखें गत पांच वर्शों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढ गया है और पाकिस्तान का हथियार आयात इस बीच १२८ गुना बढा है. यह कैसा मजाक है कि जिन देशों के पास लोगों का पेट भरने के लिए भर पेट भोजन नहीं है वहां की सरकारें हथियारों की हवस पर जनता क पैसा फूंके जा रही है. विडम्बना देखिए कि नोबेल षान्ति पुरस्कार से नवाजे जाने के तुरन्त बाद साउदी अरब के साथ ६॰ अराब डालर के हथियार बेचने का सौदा किया.पिछले तीन दषक का यह सबसे बड हथियार सौदा है. इस सौदे से बोइंग कम्पनी के एफ-१५ बनाने वाले विभाग को आने वाले समय २॰१८ तक के लिए रषन पानी मिल गया. जबकि इस सौदे से पह्ले इसी बोइंग कम्पनी जो दुनियां की सबसे बडी हथियार निर्माता कम्पनी है के प्रबंन्धन और कर्मचारियों में बहश चल रही थी कि बोइंग प्रबंन्धन एफ-१५ लडाकू विमान युनिट के ४४ हजार कर्मचारियों की छटनी करने जारहा था क्योंकि लम्बे समय से इस जेट विमान के खरीददार नहीं मिल रहे थे.मगर बदलाव के नारे के साथ वाइट हाउस में प्रवेश करने के साथ ही ओबामा के हस्तक्षेप के बाद घटनाक्रम् में यह बदलाव तेजी से आया.छटनी की योजना बना रहे बोइंग कंम्पनी अब नये कर्म्चारी भरती करने जारही है और विशेषज्ञों का कहना है कि ओबामा द्वारा साउदी अरब के साथ किया गया यह सौदा हथियार बनाने की इस सबसे बडी कंम्पनी में ७७ हजार नौकरियां सुरक्षित करेगा.
बिडंम्बना देखिए कि साउदी अरब को बेचे जाने वाले एफ-१५ विमान अब पुराने पड चुके हैं.शीतयुध्द के दौरान रूस के मिग विमानोंका मुकाबला करने के लिए इनका निर्माण् किया गया था. आखिर अमेरिका के इस कचरे से साउदी अरब किससे मुकाबला करेगा.तेल के बल पर कमाये अकूत् धन का दुरुपयोग कर अमेरिका जैसे विकसित देश खाडी देशों को पुराने हथियारों को खपाने के अड्डों में तब्दील कर रहे हैं. आतंकवाद से लडाई और सुरक्षा के नाम पर गरीब देषों के पैसे से विकसित देशों की तिजोरियां भरी जा रही हैं.दुनियां का हथियार उद्योग डेढ खरब डालर का है जो वैश्विक जीडीपी का २.७ प्रतिशत है और इस अमानवीय उद्योग पर ९॰ प्रतिशत कब्जा पश्चिमी विकसित देशों का है और उसमें भी ५॰ फीसदी पर अमेरिका का कब्जा है.दुनियां की तीन सबसे बडी हथियार निर्माता कंम्पनियां अमेरिका की हैं। दो धु्रवीय दुनियां के जमाने में अपने अपने खेमें के देशों को हथियारों की आपूर्ति करने में अमेरिका और सोवियतसंघ में होड रहती थी. पर सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनियां भर में हथियारों की आपूर्ति और खपत् में कमी आयी जिसके परिणामस्वरूप बोइंग,
रेथ्योन और लाकहीड जैसी बडी हथियार कंम्पनियों की बैलेंसशीट गडबडा गयी. इन्तारानेशानल पीस रिसर्च गु्रप (सिपरी ) स्टाकहोम के आंकडे भी इस बात पर मोहर लगाते हैं. ओबामा से दुनियां को बहुत उम्मीदें थीं. एक तो अष्वेत हैं इसलिए यह समझा जाता है कि उन्हें तीसरी दूनिया की बेहतर जानकारी है और उनकी समस्याओं के प्रति वे प्रतिबध्द और निष्ठावान होंगे. पर जिस तरह से वाशिंगटन नीतकारों ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के हथियार खपाने के लिए आग से खेलना षुरू कर दिया है. यह क्डुवी सच्चाई है कि अमेरिका चाहे लाख घोषणा करे पर अलकायदा,हमास,से लेकर लिट्टे तक के आतंकवादी संघळन उसी के हथियारों पर पलें हैं. अमेरिकी हथियारों की खपत बढे इसके लिए जरूरी था कि अलग थलग पडे देषों में आपसी झगडे बढें. अमेरिका ने दुत्कार और पुचकार की नीत अपना कर अपना अभियान चला रहा है .पकिस्तान-भारत- अफगानिस्तान,मध्य-पूर्व,खाडी और अफ्रीकी देशों के उलझे तनावपूर्ण संम्बन्धों अमेरिका की भुमिका छिपी नहीं है।नब्बे के दषक में तीसरी दुनियां की कई अर्थव्यवस्थाओं ने मैकडोनाल्ड और कोका कोला के साथ ही बोइंग जैसी कंम्पनी के लिए रास्ता साफ कर दिया था.एक रपट में यह भी खुलासा किया गया कि अमेरिकी कंम्पनियां अन्तरराश्ट्रीय कानून से परे जाकर २८ से ज्यादा आतंकवादी संगळनों को हथियार बेंच रही हैं.हम भले ही यह समझें कि अमेरिका स्तर पर् आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रहा है पर इस आड में उसने अकूत धन कमाया है. अमेरिका के रक्षा विभाग ने गत वर्श अमेरिकी काग्रेस को दी गयी सूचना में खुलासा किया है कि १९९५ से रक्षा सौदों में हर साल १३ अरब डालर की बढोत्तरी हो रही है.२॰॰१ के बाद से रक्षा सौदों की रफ्तार तीन गुनी हो गयी है.भारत पहले हथियार रूस से खरीदता था पर २॰॰१ में बुश प्रशासन के समय से शुरू हुई दोस्ती ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के लिए दिल्ली के दरवाजे खुल गये हैं.गत २॰॰९ में भारत ने बोंइंग से निगरानी विमान खरीदने के लिए २.१ अरब डालर का समझौता किया था और हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरा राष्ट्रपति ओबामा ने ४.१ अरब डालर का सौदा विमान आपूर्ति के लिए किया.सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आगामी एक दशक में भारत अपने सैनिक साजो सामान पर १॰॰ अरब डालर की भारी भरकम रकम खर्च कर सकता है जिसका सबसे बडा हिस्सा अमेरिकी हथियार कंपनियों को जाने वाला है.ऐसे में दक्षिण एशिया में शान्ति की अमेरिकी कवायतों को समझा जा सकता है.विकीलीक्स द्वारा फरबरी २॰१॰ मे़् जारी की गयी एक केबल में मैसाचुसेटस के सीनेटर जान कैरी अमेरिकी हथियार कंम्पनियों के लिए लाबिंग करते नजर आ रहे हैं.यद्यपि अमेरिकी दूतावासों पर राजनैतिक दखलंदाजी और हथियार कंपनियओं के हित साधने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं ब्राजील और नार्वे की विकीलीक्स केबलें भी की हथियार दलाली की बात प्रमाणित करती है.
शान्ति का मशीहा भारत हथियार खरीदने में सबसे आगे है. स्टाकहोम की संस्था इन्तारानेशानल पीस रिसर्च इन्स्तीत्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने दुनियां में सबसे अधिक हथियार आयात किये हैं. दुनियां के हथियार उधोग का ९ फीसदी कारोबार भारत द्वारा किया गया और पिछ्ले ५ सालों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढा और इसी अवधि में पाकिस्तान का हथियार आयात १२८ गुना बढा.यह कैसी बिडंम्बना है कि जिन देशों में जनता को भर पेट रोटी मयस्सर ना हो वहां हथियारों कि हवस पर सरकारें जनता का पैसा वेमुरौअत फूंक रही हैं.दुनियां के १॰ बडे हथियार निर्यातक देश चीन को छोड कर पश्चिमी देश हैं.जी-८ के देशों वैश्विक हथियार कारोबार के ९३ फीसदी हिस्से पर कब्जा है शेष ७ फीसदी में तीसरी दुनियां के देष् हैं.भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अन्तरराश्टीय संस्था त्रनास्पेरेंसी इन्टरनेषनल के अनुसार अंतरराष्ट्रीय हथियार उद्योग दुनियां के तीन महाभ्रष्ट उद्योगों मंे एक हैअमेरिका
हथियार उद्योग को बढावा देते हुए विश्व शान्ति का मशीहा नहीं् बन सकता .कम से भारत जैसा दुनियां का सबसे लोकतंत्र को तो यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए.

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