Tuesday 25 January 2011

बेहमई अपने समय का एक डरावना सच







१४ फरबरी १९८१ यानि आज से ठीक तीससालपहलेकानपूर जिले जो अब रमाबाई नगर हो गया है के बेहमईनाम के इस गाँव में फूलनदेवी नाम की महिला डकैत ने दिन दहाड़े २१ ग्रामवासियों को मार कर पूरीदुनिया कोथर्रा दिया.गत २२ जनवरी २०११ को मैं अपने गाँव के ४अन्य साथियों के साथ बेहमई में था .जमुना के बीहड़ों में
बसे कुल ४०० आबादी के इस गाँव में गत तीस वर्ष के इतिहास से हाँथ मिला रहा था .बेहमई अब तरक्की की राह
पर है .गाँव तक पक्की सड़क है ,बच्चों की पढाई के लिए स्कूल खुल गए हैं पर सरकारी स्कूलों पढाई का हाल सभी
जानते हैं .जमुना और जमुना का बीहड़ फूलन का शरणस्थल और कार्यस्थल रहा .आज जमुना में जे सी बी मशीनों से बालू ,मौरंग निकालने व्यवसाय फलफूल रहा है .जमुना के उस पार उरई [जालौन] पड़ता है .पीपे का पुल पार कर या नावों से उस पार लोग जाते हैं .उ .प्र.सर्कार एक पक्के पुल का निर्माण करा रही है .इसके बन जाने से यह बीहड़ इलाका कालपी- जालौन से सीधे जुड़ जाये गा .पुल का काम तेजी से चल रहा है .बेहमई की इस यात्रा
में हमारे साथ थे रामदत्त एडवोकेट ,सिद्धार्थ प्रधान ,सर्वेश कटियार पूर्व बी.डी .सी .,गौतम मीडियाकर्मी और मै स्वयं लेखक कवी और एक्टिविस्ट .बेहमई गाँव के निवासियों से मिलते हुए और बात करते हुए ऐसा लग रहा था कि
इतिहास हमारे सामने खड़ा हो .उस घटना पर बात करने में किसी को कोई हिचक या संकोच नहीं लगता है .बेहमई
जो आज दुनिया के नक्से में दर्ज है हमारे सामने खड़ा था जिन्दा इतिहास के टुकडे की तरह .

Tuesday 18 January 2011

किसानो का ‘शोक गीत



भागवान स्वरुप कटियार


अब सब ;ह मान चुके हैं कि आजादी के बाद दे‘ा में ‘ाासन करने वालों की चमडी का सिर्फ रंÛ बदला है-‘ाो”ा.ा का दमन चक्र पुराने ढांचे मे$ न;े जुमलों के साथ ;थावत जारी है-संवै/ाानिक मूल्;ों को अनदेखा कर विकास के लि, Ûैरबरबरी को अनिवार्; मान लि;ा Û;ा है-दे‘ा के विकास की परि/िा से सात लाख Ûांवों को हांसि;े पर /ाकेल दि;ा Û;ा है-कृ”िा प्र/ाान भारत में जहां आज भी साळ फीसदी जनता का जीवन खेती पर निर्भर् है वहां खेती किसानी को अकु‘ाल श्रम की श्रे.ाी मे रखा Û;ा है-खेती किसानी में आज भी 30-40 रुप;े रोज है जबकि छळे वेतन आ;ोÛ के बाद सा/ार.ा् कर्मचारी 400 रुप;े रोज का हकदार है-सन 1948 में सं;ुक्त रा”ट्र ?ाो”ा.ाा प= में कहा Û;ा था कि मेहनत की हकदारी इतनी तो होनी चाहि, कि मेहनतक‘ा और उसके परिवार का अच्छी तरह भर.ा-पो”ा.ा हो स्अके-पर उसी वर्”ा बने भारत के न्;ुनतम मजदुरी अ/िानि;म और बाद में भारती; संवि/ाान के अनुच्छेद 43 मे$ मेहनतक‘ा का जिक्र तो है लेकिन परिवार नदारद है- रा”ट्री; नमूना सर्वे{ा.ा के अनुसार ग्रामी.ा परिवाार में औसतन पांच सदस्; माने Û;े हैं लेकिन हमारी सारकार चार सदस्;ों को परिवार में ‘ाामिल करता है और उसमें भी दो बच्चों को ,क व;स्क मान कर तीन व;स्क सदस्;ों को ,क परिवर मान है-श्रम के मूल्; को निरन्तर दबा कर रखने के कार.ा खेती-किसानी ?ााटे का सौदा बानती Û;ी ।खेती लÛातार ?ााटे का सौदा होते जाने के कार.ा किसान कर्ज मे$ डूबते चले Û;े और आत्महत्;ा के कÛार पर पहुंच Û;े अब तक भरत में तीन लाख से ज्;ादा किसान आत्महत्;ा कर चुके हैं-दुनि;ां के किसी भी दे‘ा में किसानों ने इतनी आत्महत्;ा,ं नहीं की है$- दुनि;ां के सबसे बडे लोकतं= को ‘ार्म‘ाार करता है-खेती-किसानी के लि, कार्ज के कानूनों के तहत उस पर चक्रवृ/िद ब्;ाज नहीं लÛ सकता है -पर इस बात की जानकारी बहुत कम लोÛों को है और किसान लÛातार चक्रबृ/िद ब्;ाज के दलदल मे फंसा हुआ है-इतना ही नहीं केन्द्र सरकार ने 1984 मे$ कम्पनी अ/िानि;म में संसो/ान कर ,क न;ी /ाार और जोड दी जिसके तहत किसान कर्ज की ‘ार्तों् को अदालत में चुनौती नही दे सकता रा“ट्री; कृ“िा नीति के तहत सन 2000 में खेती को ?ााटे का सौदा बता;ा ेंÛ;ा जबकि दे‘ा की अ/िाकां‘ा जनता की अजीविका कृ“िा पर निर्भर् है-कुल सकल ?ारेलू उत्पाद में कृ“िा {ो= का ;ोग्दान कुल अळारह फीसदी है जबकि 60 फीसदी जनता कृ“िा पर निर्भर है- कृ“िा {ो= और Ûैरकृ“िा {ो= में प्रति व्;क्ति आ; के बीच बडी असमानता है- बिदम्बना ;ह कि खेती को ?ााटे का सौदा मानने के बाबजूद नीति निर्/ाार.ा मेंइसकी अनदेखी की Û;ी- कहना Ûलत न होÛा कि किसान को लÛातार Ûरीब बना;े रखने की साजि‘ा सरकारों }ार की जाती रही है-खेती किसानी के मामले में आजदी के तुरंन्त बाद से ही तात्कालिक राह्त की राजनीत चल रही है-उनके श्रम और तकनीकी कौ‘ाल का अवमूल्;न कर उनका Ûौरव चूर कि;ा और फिर उसे खैरात का मुरीद बना दि;ा-इसी का नमूना है कि किसान के बच्चों को स्कूल में मिड डे मील के नाम पर कटोरा ले कर खडा कर दि;ा जाता है और उनके भीतर् त्‘ाुरू से खैरात पर पलने वाले बो/ा को रोपा जा रहा है-दे‘ा का ख;ा पि;ा अ?ाा;ा वर्Û् अपनी नजर मे$ं किसान की छवि हमे‘ाा ;ाचक् की रखता है-भारात की अपे{ा अन्; दे‘ाों में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी बहुत अ/िाक है-भारत में प्रति किसान सब्सिडी 66 डलर है जबकि जापान में 26हजार् डालर, अमेरिका में 21 हजार डालर् और ;ूरोपी; दे‘ाों में 11 हजार डालर है- सरकारी आंकडों के मुताबिक 1947 में सकल रा“ट्री; आ; में खेती का हिस्सा 67 फीसदी था जो ?ाट् कर वर्तमान् मे$ 18 फीसदी रह Û;ा है-

Tuesday 11 January 2011

पानी की सतह पर तैरता एक खुबसूरत शहर वेनिस





वेनिस को इटैलि;न भा“ाा में वेनीजि;ा कहते हैं जैसे रोम को रोमा कहते हैं-वेनिस चारो तरफ पानी से ?िारा हुआ है-वेनिस में आने-जाने के लि, वाटर टैक्सी का इस्तेमाल करते हैं ;हां पेट्रोल् वाहन नहीं चलते हैं-वेनिस मे लोÛ आफिस,बाजार,और अपने ?ारों को नाओं से ; पैदल
जाते हैं-लोÛोम का कहना है कि वेनिस से सुन्दर ‘ाहर ‘ाा;द ही दुनि;ा में कोई हो-वेनिस नहरों और पानी की Ûलि;ों का ‘ाहर है-उसमें इतनी भूल-भुलै;ां है कि कोई भी आसानी से खो सकता है -वैसे भी वेनिस के सौन्दर्; में डूब कर अपने को भऊल जा;े तो कोई आ‘चर्; नहीं है- इटली के लोÛ भारतावासि;ों की तरह मिलनसार और खुले दिमाÛ् के होते है$-उन्हें किसी से बातचीत करने में किसी से कोई झिझक नहीं होती है- अजूबा ‘ाहर है देखते ही बनता है नैसर्Ûिक सौन्दर्; से सरबोर ,क सुन्दरी कि तरह-मार्कोपोलो ने अपनी चीन की ;ा=ा
वेनिस ही ‘ाुरु की थी-वेनिस मे छोटे-छोटे 117 टापू( आइलैन्ड) हैं-इसके अलावा 140नहरें और
400 पुल हैं-लÛता है पूरा ‘ाहर पानी की सतह पर तैर रहा हो-चारो तरफ पानी ही पानी होने
के बाबजूद वेनिस की स्थापत्;कला और मूर्तिकला दर्‘ाकों को मुग्/ा और आ‘चर्;चकित करती है-वेनिस को क्रम‘ाः कनार्जिआ,कैसिलो,सैनमार्को ,डारसुडूरो,सैनपोलो,तथा सैन्ट्क्रेसर 6भÛों में बांटा Û;ा है-वेनिस में मुख्; Ûलि;ों को कैले और छोटी Ûलि;ों को कलैटा ; रौना कहतें हैं-
सैनमार्को स्क्वा;र ;हां की म‘ाहूर जÛह है-सैन्मार्को चर्च बेहद खुबसूरत है-;हंा
कबूतरों के झुन्ड ?ाूमते रहते हैं और दर्‘ाकों ंके कन्/ाों पर बैळ जातें हैं-;हां सेन्ट्मार्क की कब्र
है-कहा जाता है कि मिश्र के व्;ापारी सेन्ट्मार्क कीकब्र चुरा ले Û;े थे इसलि, मिश्रवासि;ों ने
उसका पुनर्निर्म.ा करा;ा है-सैनमार्को चर्च का ?ान्टा?ार 99मीटर ऊंचा है-इसे दसवीं ‘ाताब्दी
मे बनवा;ा Û;ा था-14जुलाई 1902 में ;ह ?ान्टा?ार पूरी तरह /वस्त हो Û;ा था जिसे वेनिस
वासि;ों ने पुनः बना कर खडा कर दि;ा-;हां मुरैनो आइलै.ड अपने ग्लासवर्क केसौन्दर्; के
लि, म‘ाहुर है और बुरैनो आइलै.ड फि‘िांÛ विलेज के नाम से जाना जाता है,,क छोटा सा
आइलै.ड है टारसिलो जहां कैथडरल चर्च का आटर््वर्क आकर्“ाक है-वेनिस को अन्तररा“टी;
फिल्ममहोत्सव का ‘ाहर कहा जाता है-;हां अन्तर्रा“टी; कलप्रदर्‘ानि;ों का आ;ोजन आम बात है ;हां की Ûैडोलारेस बहुत म‘ाहूर है जिसमें भारत में केरल की तरह नावों की दौड होती है- इटली के इस छोटे से ‘ाहर की प्राकृतिक खुबसूरती देखते ही बनती है-इसके सौन्दर्; र्वा.ान के लि, अद्भुत,सुन्दर,और आकर्“ाक ‘ाब्द पर्;ाप्त नहीं हैं-वेनिस दुनि;ां के म‘ाहूर कला और सांस्कृतिक केन्द्रों में से ,क है-;हां की भा“ाा वेनी‘िा;न और स्पेनि‘ा है-,ेतिहासिक इमारतें-खुबसूरत Ûिरजा?ार-ऊंची-ऊंची बिल्ड्Ûें,ाार्ट्Ûैलरी तथा चारो तरफ पानी हीपानी और नीले-नीले बादल साथ में मानवी; सौन्दर्; वेनिस के सफर को ;ाद्Ûार बनाते हैं-पूरा ‘ाहर किसी लकार की बनाई हुई पेन्टिंÛ जैसी लÛती है-हर वर्“ा वेनिस में 120 रैÛाटा आ;ोजित कि;े जाते हैं-रैÛाटा का खेल वेनिस मे बहुत लोक्प्रि; है- वेनिस निवासी इस खेल मे बड्चड् कर हिस्सा लेते है-वेनी‘िा;न आर्सनल ;हां के प्रसि/द बन्दरÛाहों में से है-रंगमंच्प्रेमि;ों के लि, ;हंा प्रतिवर्“ा नाट्य्समरोहों का आ;ोजन कि;ा जाता है-5 अक्टऊबर से क्रिसमस तक सेन्ट्मार्क स्का;र मे चलने वाले कार्निवाल में वेनिस के इतिहस और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है-स्कालाकोट्वीनो बोवोल महल ;हां का अद्रभुत आकर्“ा्.ा केन्द्र है-इस महल में अनÛिनत वृत्तखंड और सीड्;िां हैं -;हां की अकादमि;ां और आर्ट् Ûैलरि;ंा बहुत म‘ाहूर हैं--;हां 18वीं ‘ाताब्दी के कलाकृति;ों को देखा जा सकता है-वेनिस में ग्रा.ड कैनाल पर बने
रि;ाल्टो ब्रिज से पूरे ‘ाहर का खुबसूरत नजारा देखा जा सकता है-वेनिस के लोÛ ईसाई /ार्म
के अनु;ा;ी हैं इसिलि, Ûिरज?ारों में भीड लाÛी रहती है-सेन्टामेरि;म Ûिरजा?ार में ;ोरोपी;
और इस्लामिक स्थापत्;कला का अद्रभुत समन्व; है-बेसिलिकाडे फरारी चर्च् पि;ाजका इतिहास काफी पुराना है-पि;ाजा सैनमार्को में प्रवे‘ा करते ही क्लाक्टावर (?ांटा?ार) पर नजर जाती है ो
कफी आकर्“ाक है- अकादमि;ां और पैÛीÛुÛेन्हाइम संहृाल; देखने ;ोग्; हैं- अक$दमि;ा$ में प्राचीन और म/य्कालीन इटैलि;न वैनी‘िा;न का बहुत प्रभावी संग्रह है- दो बातें स्प“ट हैं कि
तमाम दो“ाों के बाबजूद सरकारी साामंती संर{ा.ा मे ही महान कला का सृजन और संर{ा.ा
संभव हुआ है-

Monday 10 January 2011

जनपक्ष: डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का विरोध प्रदर्शन

जनपक्ष: डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का विरोध प्रदर्शन

जनपक्ष: डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का विरोध प्रदर्शन

जनपक्ष: डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का विरोध प्रदर्शन

हम फौलाद के गीत गायें गे


हम फौलाद के गीत गायें गे
दुनिया फौलाद की बनी है
और हम फौलाद की संताने हैं |

हम प्यार का नया संसार रचें गे
जहाँ भेदभाव की नफ़रत के लिए
कोई जगह नहीं होगी
पर द्वंद्व होगा जो हमें आगे बढ़ने का
हौसला दे गा |

जैसे लोग निहाई पर
लोहे का पत्तर ढालातें हैं
वैसे ही हम
नए दिन ढालें गे
उसमें उल्लास हीरे की तरह जड़ा होगा |

पसीने से नहाये हम पाताल में उतरे गे
और धरती के गर्भ से
हम नया वैभव जीत लायें गे
हम पर्वत के शिखर पर चढ़ कर
सूरज के टुकडे बन जाएँ गे |

इंसानियत से सराबोर
हम एक शानदार जिंदगी ढालें गे
ऊषा की लाली से हम
अपनी मांसपेसियों में लाल रंग भरें गे |

हम अनेक है पर
एक में संगठित हो गे
फौलाद के उस गीत में
हम सब की आवाज होगी
हम फौलाद के बने है
इसलिए
फौलाद के गीत गए गे |

Saturday 8 January 2011

एक रोशनी जिसके उजाले में हमें जीना है

जिंदगी की सारी जद्दोजहद ख़ुशी हासिल करने की होती है |आखिर क्या है ख़ुशी ,यह कहाँ रहती है | यह तो वैज्ञानिक अनुसंधानों और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हो चूका है की ख़ुशी वहां नहीं है जहाँ हमतलाशाते हैं |खास कर धनदौलत और सत्ता केन्द्रों में तो बिलकुल नहीं है |ख़ुशी रहती है प्रगाढ़ आत्मीय संबंधों में |नए साल पर हमारी एक ही चाह है इक हम आप सब खुश रहें | बचपन में जब हम बहुत छोटे थे न कोई धन की चाह थी और न ही वर्चस्व और मान सम्मान की भूख थी ,बस पेट भराकोईस्मानीतकलीफ नहीं तो खुशहै |हमने अपने बचपन का स्वाभाव खो दिया है और उस संसारिकता में डूब गए हैं जहाँ दुःख ही दुःख है जब कीमनुष्य के आलावा दुनिया के अन्य प्राणियों ने अपना वह स्वाभाव नहीं छोड़ा और वे हम से ज्यादा खुश है |यह कहाजा सकता है कि मनुष्य ने जितनी तरक्की कि है उतनी अन्य प्राणियों ने नहीं कि है पर किस कीमत पर |मनुष्यता को खो कर |पशुओं में हत्याएं ,बलात्कार और लूट जैसे अपराध नहीं होते |मनुष्यता को बचाने के लिए पशुओं क़ी नैतिकता उधर लेनी होगी |

नई उम्मीदों का नया समाज



- भगवान स्वरूप कटियार

तमाम विफलताओं और दुश्वारियों बावजूद उम्मीदों के सहारे हमंे जीवन के भविष्य की राह तलाशनी होती है। आजादी के 63 साल बाद भले ही देश का समाजिक आर्थिक और राजनैतिक पतन हुआ हो तथा राजनीति की विश्वसनीयता और प्रशासन तंत्र की निष्ठा ध्वस्त हो गयी हो परन्तु फिर भी नये विकल्प और नये रास्ते कभी बन्द नहीं होगे। इन्हीं परिस्थितियों के बीच हमने अपने देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था तो ये काले अंग्रेज किस खेत की मूली हैं। हमंे लगता है कि जब हम कम जानते थे तब समझते अधिक थे। हमारी जानकारियों ने हमारी समझदारी को भोथरा किया है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम जानकारियों से मुँह मोड़ लें। पर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आखिर क्यांे तमाम सूचना क्रान्ति और आर्थिक विकास के बावजूद मनुष्य की मनुष्यता, नैतिकता और संवेदना तिरोहित हो रही है। कहने को इंटरनेट और मोबाइल ने भौतिक दूरियों को कम किया है। पर पारस्परिक सम्बन्धों को और आत्मीय रिश्तों तथा भावनाओं की निरन्तर हो रही कमी से परिवार और समाज न सिर्फ टूट रहे हैं बल्कि पूरा समाज एक गहरे अवसाद में डूबा हुआ है। यह विचारणीय विशय है कि जब हमारे पास कम साधन थे तब हम ज्यादा खुश थे। उसकी वजह परस्पर सहयोग और प्रगांढ़ रिश्ते ही थे। साधनों की बहुलता ने रिश्तों की प्रगांढ़ता को खत्म कर तनाव, घुटन, अकेलापन और अवसाद भर दिया है। सोंचने की बात यह है कि ऐसा सब क्यों हुआ और क्यों हो रहा है। धन की आवश्यकता जीवन को चलाने के लिये हमेशा रही है और रहेगी पर धन न तो जीवन है और न ही जीवन का लक्ष्य हो सकता है। सिर्फ साधन है और साधन रहेगा। धन को जीवन का लक्ष्य बना लेने के कारण पूरी दुनिया मंे चौतरफा एक दूसरे से आगे बढ़ने की लड़ाई सी छिड़ गयी है। जिसमंे हम एक दूसरे को मार रहे हैं भले ही वे हमारे ही क्यों न हों। गहराई में जाये ंतो अन्तर्राष्ट्रीय तनाव, आतंकवाद राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्टाचार जैसे भयावह मुद्दे मुद्दों के पीछे यही है।
आये दिन बड़े-बड़े विमर्शों और मीडिया के जरिये हम मौजूदा व्यवस्था की आलोचनात्मक व्याख्या सुनते और पढ़ते हैं। यहाँ तक की समाज और देश को तबाह करने वाले लोग भी माथा पीटते नाटक करते इन्हीं मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करते नजर आते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम जैसे देश के बड़े घोटाले ने संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जड़े हिला कर रख दी हैं। इस मुद्दे पर संसद को बन्धक बनाने वाली भाजपा जिसका समग्र राजनैतिक चिन्तन ही गाँधी की हत्या की गंगोत्री से निकलता है, अयोध्या, गोधरा, रक्षा सौदा घोटाला, बंगारू लक्ष्मण के रिश्वत सने हाँथ, कबूतर बाजी करते रंगे हाँथ पकड़े गये उनके सांसद आखिर कौन सा आदर्श पेश कर रही है। जबकि भाजपा स्वयं कर्नाटक के भ्रष्ट मुख्यमंत्री के बचाव में खड़ी है। बेशक 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का विरोध होना चाहिये और दोषी लोगांें को सजाये भी होनी चाहिये पर दोहरा चरित्र और राजनीति के लिये राजनीति सर्वथा देश के विरूद्ध है और निन्दनीय भी। हमारे प्रधानमंत्री इतने विद्वान और ईमानदार कि आँखों के सामने हो रही बेइमानी को रोक नहीं पाते हैं। बेइमानी होते देना या करने देना भी कम बड़ी बेइमानी नहीं है। आजादी के बाद से राजनीति, समाज और जीवन के रोजमर्रा के मूल्यों में लगातार गिरावट आई है और वह अभी भी जारी है। इसके रूकने की दूर-दूर तक न तो कोई उम्मीद दिखती है और न ही किसी को इसकी चिन्ता ही है। अब तो राजनीति भ्रष्ट नौकरसाही और अपराधी तत्वों का ऐसा गठजोड़ बन गया है जो अपने स्वार्थों के लिये देश को डुबो देने में कोई संकोच नहीं है। हम दुनिया की महान आर्थिक शक्ति होने की दावेदारी तो करते हैं पर शिक्षा, भोजन आवास औरा रोजगार जैसी मूलभूत जरूरतें अभी तक पूरी नहीं कर सकें। भ्रष्टाचार में हमारा देश शिरोमणि है जो हर भारतीय को शर्मशार करता है।
इन सारे सन्दर्भों में एक बात उभर कर आती है कि हमारा देश और हमारे राजनेता सामाजिक सरोकारों की राजनीति से भटक कर स्वार्थों की राजनीति में इस तरह डूब गये हैं कि राजनीति अब समाजसेवा या राष्ट्रसेवा के बजाय एक उद्योग बन गया है। यही वजह है कि राजनीति में आने वाले लोगों में अधिकांश पूंजीपति और अपराधी हैं। यह सब क्यों हो रहा है। क्या हमारा संविधान यह सब रोक पाने में अक्षम है? न्यायपालिका और मीडिया का जो नया चेहरा उभरकर सामने आया है उसमें तो देश की जनता को और भी निराश किया है। राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले सभी राजनैतिक दल देश की इस राजनैतिक संकट के बारे में न तो सोंच रहे हैं और न ही इस पर सोंचना चाहते हैं। बल्कि उनका मानना है कि यह तो हमेशा से होता आया है और होता रहेगा। आइये फिर विचार करें कि आखिर नई राजनैतिक व्यवस्था और आदर्श के क्या विकल्प हो सकते हैं। भ्रष्टाचार रोकने में यदि भारतीय संविधान और भारतीय कानून सक्षम नहीं है तो सम्पत्ति के उत्तराधिकार को निरस्त करते हुये या उसे सीमित करते हुये भ्रष्टाचार नियंत्रण का प्रभावी कानून बनाया जाना चाहिये। अनिवार्य मतदान तथा जीतने वाले जनप्रतिनिधि के लिये डाले गये मतों का 50 प्रतिशत की अनिवार्यता, सामूहिक जिम्मेदारी कानून (पब्लिक एकाउन्टबिलटी लॉ), देश की जमीन का राष्ट्रीयकरण तथा समान और निःशुल्क शिक्षा के लिये शिक्षा का राष्ट्रीयकरण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को मूर्त रूप देने की आवश्यकता है। सरकारों को ऐसी राजनैतिक इच्छाशक्ति सृजित करनी होगी कि वे इस तरह के जनसरोकारों से सम्बन्धित मुद्दों को राजनैतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्रहित तथा जनहित में लागू कर सकें। सूचना और शिक्षा के अधिकार की तरह हमें देश मंे रोजगार के अधिकार की भी आवश्यकता है ताकि चीन की तरह हम देश की वृहद जनसंख्या को उत्पादन में लगाकर देश की उत्पादकता बढ़ा सकें। स्विस बैंक में जमा देश के काले धन को वापस लाना केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। जिसके लिये केन्द्र सरकार ने संसद और संसद के बाहर देश की जनता से वादा किया है और उसे निभाना चाहिये। इससे एक ओर देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी वहीं वह चेहरे भी बेनकाब होंगे जिन्होंने देश को खोखला करने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी है। बेहतर तो यह होगा कि केन्द्र सरकार काले धन की वापसी के बाद काले धन के अपराधियों को दण्डित भी करें ताकि आर्थिक अपराध का बढ़ता सिलसिला खत्म किया जा सके। पर चिन्ता इस बात की है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल ने राजनैतिक इच्छाशक्ति की इतनी कमी है कि वे इतने कठोर निर्णय लेने से डरते हैं। जबकि पूरा देश चाहता है कि कोई भी राजनैतिक दल इन सारे कामों को मूर्त रूप देने के लिये आगे आये, जनता उनका पूरा साथ देगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पुनः सत्ता में आना इस बात का द्योतक है।
इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में जो कुछ हो रहा है, क्या उससे मानव सभ्यता में कुछ मौलिक परिवर्तन के लक्षण उभर रहे हैं, या फिर फुकोयामा की यह घोषणा सही है कि अब इतिहास और विचार का अन्त हो चुका है। यानि उदारवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था अर्थात बाजार की शक्तियाँ ही समाज का संचालन करेंगी। न किसी नई व्यवस्था की जरूरत है और न ही उसके उभरने की उम्मीद। भारत की वर्तमान आधुनिक व्यवस्था की नींव तीन महत्वपूर्ण संस्थाओं पर टिकी है। ये तीनों संस्थायें भारत में उपनिवेशवाद की देन हैं। ये तीन संस्थायें हैं: पार्टी, प्रौपर्टी और पार्लियामेण्ट। क्या इन संस्थाओं की सीमायें भारत और शायद अन्य देशों में भी स्पष्ट होने लगी हैं। शाश्वत प्रश्न यह है कि मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करे कि उससे सर्वाधिक उत्पादन हो और अधिक से अधिक वस्तुओं की उपलब्धता हो सके। इस बात पर सबसे पहले इंग्लैण्ड के चिंतक जॉन लॉक ने सत्रहवीं शताब्दी में विचार किया। लॉक के तर्कों ने यह साबित कर दिया कि अगर प्राकृतिक सम्पदा को निजी सम्पत्ति में बदल दे ंतो मनुष्य मनोयोग पूर्वक उत्पादन में लगेगा और समाज के लिये उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होगी। इसकी विपरीत कार्ल मार्क्स ने भी अपने विचार दिये। उन्होंने कहा कि निजी सम्पत्ति के संस्थान से उत्पादन तो जरूर अधिक हो गया किन्तु शोषक और शोषित दो वर्ग समाज में बन गये और शोषक लगातार शोषितों का शोषण कर अपनी पूँजी बढ़ाता रहा जिसकी भारी कीमत समाज को चुकानी पड़ी। उत्पादन का सार्वजनिक वितरण भी न्यायोचित ढंग से नहीं हो सका। यह बात सच है कि मार्क्स के विचारों पर चलकर सोवियत संघ भी वह सामाजिक व्यवस्था नहीं दे सका जो टिकाऊ विकास और जन कल्याणकारी समाज का रूप ले सके। अब तो निर्वाद गति से पूँजीवादी व्यवस्था का गाँव-गाँव और शहर में विस्तार हो रहा है। हर उपयोगी वस्तु को निजी सम्पत्ति में बदला जा रहा है। यहाँ तक की शरीर के अंगो और विचारों को भी पूँजी या सम्पत्ति के रूप में देखा या समझा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि आतंकवाद और हिंसात्मक प्रतिक्रियायें तथा धार्मिक कट्टरता या फिर नक्सलवाद यह सब निजी सम्पत्ति की व्यवस्था के संकट को दर्शाते हैं। यह सभी आंदोलन यह इंगित कर रहे हैं कि उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं के बंटवारे का जो मॉडल हमारे समाज में प्रभावकारी है उससे ही यह सारी विसंगतियाँ, विषमतायें और र्दुव्यवस्थायें उपजी हैं।
पड़ोसी देश पाकिस्तान को ही ले लें वहाँ भू सम्पत्ति कुछ ही परिवारों के हाँथों में सीमित हैं। शहरी सम्पत्ति का 70 प्रतिशत हिस्सा फौजी फाउण्डेशन के पास है जिनकी संख्या पूरी जनसंख्या का केवल 7 प्रतिशत है। इसलिये वहाँ चल रहे आतंकवाद को समझने के लिये इस विसंगति को भी समझना होगा। उत्पादन का यह मॉडल अब अवांछित तो है पर इसने लोगों के विचारों को ऐसा जकड़ रक्खा है कि मूलभूत विकल्प की खोज की जगह ज्यादातर लोग इसमें कुछ संशोधन की बात भी सोंच रहे हैं। जबकि इसका वास्तविक हल या समाधान संपत्ति के समाजीकरण और देश की जनता को अधिक से अधिक रोजगार और उत्पादन में लगाने का है। अब दूसरी संस्था यानि पार्लियामेण्ट उन तमाम संस्थाओं की प्रतीक है जिनका निर्माण राजनीतिक प्रक्रिया को चलाने और नागरिकांे इसमें प्रतिनिधित्व देने के लिये किया गया है। साठ-सत्तर के दशक तक के चुनाव और जनप्रतिनिधियों को याद करें तो याद आता है कि चुनाव में बहुत कम धन खर्च होता था। लोगों के मन में जनप्रतिनिधियों के प्रति सम्मान था और उनसे निरन्तर सम्पर्क रहता था। धीरे-धीरे जनप्रतिनिधित्व का सीधा सम्बन्ध धन बल और बाहुबल से जुड़ गया। लोग अब इन संस्थानों की क्षमता और इमानदारी पर शक कर रहे हैं। देश में बढ़ते जनआन्दोलन, उनका उग्र रूप तथा आन्दोलनों के खिलाफ सेना का उपयोग, यह सब लक्षण इस बात के हैं कि संस्थायें संकट में है और समाज के लिये संकट उत्पन्न कर रहे हैं। राजनैतिक दलों की कल्पना भी आधुनिक युग में जनता और सत्ता के बीच प्रतिनिधित्व के लिये की गई थी। ऐसा सोंचा गया कि समाज के अलग-अलग हितों को प्रतिनिधित्व देने के लिये लोग अपना-अपना दल बनाये। इन दलों का कार्यालय हो ताकि जनहित को व्यवस्था में प्रतिनिधित्व मिल सके। पर ऐसा नहीं हो सका पार्टी के अन्तदर एक खास गुरूप या कुछ लोगों का प्रमुख होना पार्टी का जनता से कटना तथा आपसी प्रतियोगिता में जनहित को ताक पर रखना जैसी खामियाँ राजनैतिक दलों में विकसित हो गयीं। इन परिस्थियों के बीच दलविहीन लोगों की एक ऐसी धारणा है कि जिसके जरिये संसदीय लोकतंत्र को बचाया जा सकता है। सोंचना यह है कि दल विहीन लोकतन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधि को उसकी कार्यनिष्ठा, सद्चरित्र तथा क्षेत्र में विकास कार्यक्रमों को पूरा करने आधार पर चुने। यही वे विकल्प हैं जो उम्मीदे देते हैं और संसदीय लोकतन्त्र के संकट को खत्म करने की राह दिखाते हैं।

Wednesday 5 January 2011

विनायक सेन की सजा पर उठते सवाल



- भगवान स्वरूप कटियार

किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब सरकारों द्वारा लूट और दमन बढ़ता है तो उसी अनुपात में जन आक्रोश का उभरना स्वाभाविक है। उस जनआक्रोश की भाषा और भावना को समझना लोकतान्त्रित सरकारों का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है ताकि समस्याओं का समाधान निकाला जा सकें। पर जब जनाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मानवाधिकार के प्रति समर्पित समाजिक कार्यकर्ताओं के विरूद्ध न्यायपालिका का इस्तेमाल कर कानून का दुरूपयोग कर और गलत सजाये सुनाकर जनता की आवाज को दबाने की कोशिश की जाती है तब लोकतन्त्र को खतरा उपस्थित हो जाता है | माओवाद और नक्सलवाद जैसे शब्दों या विचारधाराओं से भड़कने के बजाय सरकारों को यह समझने की जरूरत है कि आखिर यह विचारधारायें क्या कहती हैं और उनके प्रति निष्ठावान लोग कैसे समाज का सपना बुन रहे हैं। मार्क्स, अम्बेदकर और भगत सिंह का साहित्य यदि इनकी प्रेरणा की ताकत है तो निःसन्देह यह गलत लोग नहीं हो सकते और ही यह साहित्य प्रतिबन्धित साहित्य कहा जा सकता है। गत दिनों वैश्विक मन्दी के दौरान वैज्ञानिक समाजवाद के महान विचारक कार्ल मार्क्स की बहुचर्चित पुस्तक पूँजी का पूर्नप्रकाशन वृहद संख्या में हुआ और उसकी बिक्री अमेरिका और यूरोप के देशों में हुयी। समाज में लगातार धन के प्रति बढ़ता सम्मान और श्रम की उपेक्षा मेहनतकशों को संघठित करने पर मजबूर करती है। इस दुनिया का आधुनिक चमक भरा चेहरा जो हम देख रहे हैं उसके पीछे सिर्फ श्रम है और पूँजी भी जो वर्चस्व का दाव करती है श्रम की ही उत्पत्ति है। मार्क्स की विचारधारा के अनुयायी कोई भी हों उनका आशय सिर्फ ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ अन्याय और भूख हो तथा समाजिक और आर्थिक विषमतायें सर उठाती हों।
डा0 विनायक सेन को छत्तीसगढ़ के जिला रायपुर में जिला और सत्र न्यायालय ने उम्र कैद की जो सजा सुनायी उसपर जनता की तीखी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। तमाम लेखों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने इस फैसले पर दुःख और प्रतिरोध प्रकट किया है। इस दुःख और प्रतिरोध प्रकट करने वालों में भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डा0 अर्मत्यसेन, अमेरिका के विश्वविख्यात चिन्तक नोमचोमस्की भी शामिल हैं। विचारणीय बात यह है कि आखिर क्यों एक आदालती फैसला देश की जनता के लिये इतनी बड़ी बेचैनी बन जाता है। विनायक सेन को देशद्रोह के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनायी गयी है जबकि आश्चर्य की बात यह है कि अदालत के पास ऐसा एक भी ठोस सबूत नहीं है जो विनायक सेन पर लगाये गये देशद्रोह को साबित कर सके। डा0 विनायक सेन किसी की हत्या करने, हथियार उठाने या हिंसा की किसी साजिश में होने का कोई आरोप नहीं है। उनके खिलाफ अभियोग बस यह था कि वे जेल में बन्द नक्सली नेता नारायण सान्याल से कई बार मिले थे और उनकी कुछ चिठ्ठियाँ किसी और तक पहुँचाई थीं। डा0 सेन ने यह मुलाकातें मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर की थीं और वह भी जेल अधिकारियों की निगरानी में। इसलिये इस दौरान कोई साजिश रचे जाने का सवाल ही नहीं उठता। अगर यह मान भी लें कि वे सान्याल के पत्रवाहक बने थे तो क्या यह उम्रकैद का मामला बनता है? विडम्बना तो यह है कि इण्डियन सोशल इन्स्टीट्यूट के संक्षिप्त रूप आई.एस.आई के आधार पर अभियोग पक्ष ने डा0 सेन का सम्बन्ध पाकिस्तानी खुफिया ऐजेन्सी से जोड़ दिया और अदालत ने उस पर कोई सवाल नहीं उठाये। लिहाजा यह फैसला किसी भी द्रष्टि से न्यायसंगत तो है ही नहीं बल्कि मानवाधिकारों के लिये संघर्ष करने वाले डा0 सेन का खुल्लमखुल्ला दमन और उत्पीड़न है जिसकी कोई भी लोकतन्त्र अनुमति नहीं देता। यह सरासर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का मखौल है।
लेकिन दुःखद बात यह है कि देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियाँ कांग्रेस और भाजपा इस फैसलें में कोई चिन्ता नहीं करती। इससे नागरिक अधिकारों के प्रति इन पार्टियों की संवेदनहीनता जाहिर होती है। भाजपा तो फैसले को जायज ठहराने और विनायक सेन के खिलाफ फिर से दुष्प्रचार में जुट गयी है। कांग्रेस ने बस यह कहकर चुप्पी साध ली कि डा0 सेन उच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। अलबत्ता कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह यह जरूर कहा कि डा0 सेन भले आदमी हैं और उनके विरूद्ध न्यायालय की इस फैसले की समीक्षा होनी चाहिये। यह सही है कि डा0 सेन के लिये ऊपरी अदालत में अपील करने का विकल्प खुला है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जिला अदालत में जो फैसला दिया है उसकी आलोचना हो। भोपाल गैस काण्ड में भी जिला अदालत के निर्णय की चौतरफा निन्दा की गयी थी और कानून मंत्री तक ने दुःख व्यक्त किया था। मामला विनायक सेन तक ही सीमित नहीं है। सवाल यह है कि अदालतें अगर इसी तरह फैसला सुनाएगी तो इन्साफ के उसूलों और हमारी लोकतान्त्रित व्यवस्था का क्या होगा। लेकिन यह दोनों पार्टियाँ इस बात से तनिक भी विचलित नहीं दिखायी देती कि डा0 सेन के मामले पर पूरी दुनिया की निगाह है और इसे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली के एक इन्तहान के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस ने इमरजेन्सी के 35 साल बाद जाकर एक हद तक अपनी ज्यादतियों को स्वीकारा था। हलांकि इसके लिये इन्दिरा गांधी की तानाशाही को नहीं बल्कि संजय गांधी को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन अब भी कांग्रेस ने इमरजेन्सी से कोई सबक नहीं लिया है। वरना डा0 विनायक सेन को हुयी उम्रकैद की सजा पर उसका रूख कुछ और होता। भाजपा हमेशा इमरजेन्सी को लेकर कांग्रेस को कोसती रही है। मगर लोकतान्त्रिक मूल्यांे और नागरिक अधिकारों को लेकर उसका रवैया भी बेहद चिन्ताजनक रहा है। लोकतन्त्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं होता है। अगर असहमती जताने का अधिकार हो तो लोकतन्त्र केवल राजनैतिक उद्योग बनकर रह जाता है।
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में राज्य और सरकार दोनों को एक ही माना जा सकता है। राज्य तो स्थायी व्यवस्था है लेकिन सरकारें देश काल और परिस्थितियों के अनुरूप आती जाती रहती हैं। व्यवस्था चलाने के लिये इन सरकारों का विधायी अंग कानून ही बनाता है। जिसके अनुरक्षण का दायित्व कार्यपालिका के पास होता है। न्यायपालिका को भी राज्य का ही अंग माना जाता है क्योंकि उसकी कोई अलग से सत्ता नहीं होती है। भारतीय संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार दिये गये हैं। उसी के अनुच्छेद 19 (1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही राजनीतिक संगठनों के बनाने और उसके चलाने का भी अधिकार है। अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी भारतीय दण्ड विधान की धारा 124 में राजद्रोह को यों प्रभाषित किया गया है- ‘जो कोई व्यक्ति लिखित या मौखिक शब्दों, चिह्नों या दृष्टिगत निरूपण या किसी भी तरह से नफरत या घ्रणा फैलाता है या फैलाने की कोशिश करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काता है या भड़काने की कोशिश करता है इसके साथ ही तीन व्याख्यायें भी दी गयी हैं, पहला विद्रोह की अभिव्यक्ति में शत्रुता की भावनायें और अनिष्ठा, दूसरे बिना नफरत फैलाये या नफरत फैलाने की कोशिश किये सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना यह इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं माना जायेगा और तीसरे बिना नफरत फैलाये अवग्या या विद्रोह फैलाये बिना ही प्रशासन या सरकार के किसी अन्य विभाग की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। लोकतान्त्रिक देश में शान्त पूर्ण आन्दोलन को राजद्रोह की परिभाषा में नहीं रक्खा जा सकता। लोकतान्तित्र निर्वाचित सरकारों के खिलाफ आन्दोलन या अभिव्यक्ति को यदि राजद्रोह का कारण मान लिया जाय तो सरकारों की निरंकुशता बढ़ेगी। बारीक धारा यही है कि प्रतिरोध हिंसक नहं होना चाहिये इसलिये 124 की परिभाषायें की गयी हैं और कहा गया है कि कानून द्वारा स्थापित सरकारों को उन लोगों से अलग होकर देखना चाहिये जो कुछ समय के लिये कार्य कर रहे हैं। इसलिये यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति और उसकी सजा तक ही सीमित नहीं है बल्कि लोकतान्त्रित व्यवस्था में राजद्रोह की सीमायें निर्धारित करता है कि इसका प्रयोग जनता के मूल अधिकारों को समाप्त करने के लिये नहीं हो सकता है। सरकार का काम विचारों पर प्रतिबन्ध लगाना नहीं है। इसलिये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता समाज के विभिन्न अंगों समुदायों को प्रदान की गयी हैं। अभिव्यक्ति की सुन्दरता के तहत ही संगठन बनाने और चलाने की आजादी को भी देखा जाना चाहिये। उन संगठनों और संगठनों के संचालकों की निष्ठा सरकार के प्रति हो ऐसा आवश्यक नहीं इसलिये डा0 विनायक सेन पर हुआ यह अदालत का फैसला केवल कल्पित परिणामों पर आधारित है बल्कि व्यवस्था को साधारण परिभाषा में ही मूल अधिकारों से अलग करके लिया गया है।
राज्य सत्ता के सबसे बड़े प्रतिनिधि की अगर यह समझ है तो क्या यह अपेक्षा करना उचित है और न्यायपूर्ण हो सकता है कि देश के व्यापक लोकतान्त्रिक दायरें में सभी लोग माउवादियो को उसी तरह अपराधी और आतंकवादी मानें जैसा कि देश के शासक वर्ग या दक्षिण पन्थी समूहों की मान्यता है। और इस परिप्रेक्ष्य में विनायक सेन अगर नारायण सान्याल से मिलते थे और जैसा कि अदालत नतीजे पर पहुँची है कि उन्होंने सान्याल की चिठ्ठी उनके किसी सहयोगी तक पहुँचा दी तो क्या उसके लिये डा0 सेन को उम्रकैद जैसी कठोरतम सजा राजद्रोह का अपराध घोषित करके सुना दी जानी चाहिये। चूँकि यह फैसला अगर अपर्याप्त नहीं है तो कम से कम अधूरे और महज परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर सुनाया गया लगता है। इसलिये समाज के एक बड़े हिस्से का इस फैसले के पीछे एक किसी राजनैतिक भूमिका की सम्भावना लगती है। इस क्रम में इस फैसले के सन्दर्भ में भी वही सवाल उठते हैं जो अयोध्या विवाद पर सितम्बर मंे आये इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से उठे थे। यह प्रश्न एक बार फिर प्रसांगिक हो गया है कि न्यायिक फैसले ठोस सबूतों और उसके वास्तविक सन्दर्भ के आधार पर होने चाहिये कि आस्था या राजनैतिक दुर्भावना के प्रभाव या किसी न्यायेत्तर उद्वेश्य की पूर्ति के लिये।
इसलिये यहाँ सवाल यह है कि मानवाधिकार कार्यकर्ता कानून से ऊपर है? बहुत से लोगों की इस शिकायत में दम हो सकती है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं या संगठनों का एक हिस्सा एकांगी सोंच से चलता है और भारतीय राजसत्ता के स्वरूप और भूमिका के प्रति बेहद नकारात्मक रवैया रखता है। यह बात निर्विवाद है कि अगर कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता काम का उल्लंघन करता है तो उसे जरूर सजा होनी चाहिये। लेकिन विनायक सेन के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण बात या सवाल या शिकायत नहीं है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक जनतान्त्रिक लेकिन वर्गों में बंटे समाज में न्यायपालिका की क्या भूमिका है और उससे कैसे उम्मीदे रखी जानी चाहिये। इस सन्दर्भ में यह सामान्य अपेक्षा है कि सिर्फ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से सम्बन्धित मामलों बल्कि हर न्याययिक मामले में इस निष्कर्ष तक पहुँचने और सजा की मात्रा तय करने इन्साफ हुआ जरूर दिखना चाहिये। चूंकि विनायक सेन के मामले में इन दोनों ही पहलुओं पर तार्किकता और न्याय के सिद्धान्तों का पालन हुआ नहीं दिखता इसलिये देश के व्यापक जनतान्त्रिक दायरें में इतनी बेचैनी है।