Saturday 27 November 2010

मनुष्य के बारे में सोचते हुए


इतिहास यह भी नहीं जनता कि आदिम मनुष्य धरती कब और कैसे पैदा हुआ |मनुष्य वस्तुतः वानर का सर्वोत्तम
विकसित रूप है |वानर का इतना परिष्कार हुआ कि वह अपनी कोटि से बहार निकल कर दूसरी कोटि में चला गया |
यद्यपि मूल ढांचा वाही है पर शरीर की बाहरी रुपरेखा और मस्तिष्क की रचना में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुआ |
मनुष्य की विशेषताएं इतनी अधिक और महत्वपूर्ण है कि मनुष्य बनाने कि कल्पना पर आश्चर्य होता है |अनुमान है
कि मनुष्य कि उत्पत्ति अफ्रीका में हुई ||मेकिंस इसकी उतपत्ति युगांडा और केन्या को निर्धारित किया है, क्यों कि अज भी वहा बगैर पूंछ के वानर मिलते है |सवा करोड़ वर्ष पूर्व अफ्रीका और भारत परस्पर मिलेहुये थे क्यों कि उस
समय लाल सागर नहीं था |अतः अफ्रीका से एशिया और वहा से यूरोपे जाना आसान था |दक्षिण भारत के द्रविनो कि रुपरेखा दक्षिण अफ्रीका के हेमेटिक लोगो से मिलती जुलती है |अफ्रीका में पैदा हुआ आदिम मनुष्य पूरी दुनिया में छा गया और इस घटना में हजारो साल लगे|

Friday 26 November 2010

खरगोश बनाम बिल्ली

सरलता और कोमलता में सौन्दर्य है आकर्षण है
जैसे खरगोश में |
किन्तु हम पसंद करते है
बिल्ली होना |
सरलता और कोमलते के जो खतरे है
खरगोश जिनसे रहता है सदैव भयभीत
वे बिल्ली होने में नहीं है |
अब हमें तय यह करना है कि यह दुनिया
बिल्लियों कि होनी चाहिए या खरगोशों कि |

Thursday 25 November 2010

धर्म की अवधारणा का नीतिशास्त्र

-भगवान स्वरूप कटियार

वर्तमान समय में धर्म मानव सभ्यता के विकास और प्रगति के मार्ग में एक बाधा की तरह दिख रहा है। धर्म जितना जोडता नहीं उतना तोड़ता है। बकौल कार्ल मार्क्स धर्म हृदय हीनों का हदय और आत्माहीनों की आत्मा था जो जनसाधारण के लिए अफीम साबित हुआ। धर्म का नैासर्गिक विकास हुआ है और उसकी व्यक्ति और समाज के जीवन में एक जगह बनी है जिसे नकारा नहीं जा सकता। गौतम बुद्ध और कबीर तक ने कई बार सनातन धर्म पर प्रश्न उठाये पर अंततः उनका भी दैवीकरण कर दिया गया और उनके विचार भी कर्मकाण्ड में खो गये इसलिए धर्म को एक गंभीर परिघटना की तरह समझने की जरूरत है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है यह सूत्र धर्म और ईश्वर पर भी लागू होता है। अपनी असमर्थता और आवश्यकताओं से निपटने के लिए धर्म का आर्विभाव हुआ। मार्क्स द्वारा धर्म की व्याख्या सबसे समीचीन लगती है, जिसके अनुसार धर्म भौतिकता और अध्यात्म दोनो का आधार है। मनुष्य धर्म का सृजन करता है, धर्म मनुष्य का नहीं। धर्म वस्तुत उस आदमी की आत्मचेतना है जो या तो अपने आप तक पहुंच नहीं पाया या जिसने अपने आप को खो दिया। यहां आदमी का अर्थ है आदमी की दुनिया राज्य और समाज। इसलिए धर्म के विरुद्ध संघर्ष परोक्षतः उस दुनिया के विरुद्ध है जिसकी अध्यात्मिक सुगंध धर्म है। निश्चित ही धर्म का एक भौतिक पक्ष है और एक आध्यात्मिक, एक सैद्धांतिक और एक व्यवहारिक। एक सार्वभौमिक और एक स्थानीय, एक शाश्वत और एक परिवर्तनशील। एक शोषक और एक पोषक, अंततः एक सकारात्मक और एक नकरात्मक।
सभी धर्मो में एक निर्माता, पोषक और विध्वंसक की धारणा है। एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञता और सर्वव्यापी ईश्वर को धर्म का आधार माना ही जाता है। यह अलग बात है कि ईश्वर को सभी धर्मो में अपने-अपने ढंग से रचा और संजोया गया है। बौद्ध धर्म की एक शाखा में बुद्ध की मूर्तियां नही हैं तो एक में हैं। ईसाई धर्म में भी कैथोलिक चर्च में ईसा, मरियम, संतों की मूर्तियां होती हैं पर प्रोटेस्टेन्टों में नहीं। इस्लाम में तो खुदा पूरी तरह से अमूर्त है। हिन्दू धर्म में निर्गुण और सगुण दो श्रेणियां हैं और ईश्वर के कई-कई अवतार हैं। पर हिन्दू ही वह धर्म है जिसमें निरीश्वरवाद की गुंजाइश है। बुद्ध ने कभी ईश्वर की बात नहीं की पर जब बौद्ध धर्म का स्वरूप उभरा तब बुद्ध को भी भगवान कहते हुए अन्य धर्मो की तरह शरणदाता माना गया, और बुद्धम, शरणम् गच्छामि आधार बना। इस तरह हम देखते हैं कि भारतीय समाज में धर्म में ईश्वर की अनिवार्यता नहीं रही। भारतीय समाज में तो नास्तिक भी धार्मिक बन कर रहा सकता हैं। भारतीय दर्शन में भी भौतिकवादी चिंतन प्रचलित रहा है। कपिल मुनि और कड़ाद मुनि आदि निरीश्वरवादी ही थे। भौतिकवादी चिंतन बिचौलियों के लिए कोई जगह नहीं छोडता। इसीलिए रेशनलिज्म अर्थात तर्कशास्त्र का जोर बढ़ा तो यूरोप में भी चर्च पर सवाल उठाये गये और वोल्टेयर ने तो यहां तक कह दिया था कि ईसाई तो एक ही था ईसा मसीह, पर उसे भी सलीब पर चढ़ा दिया गया। फ्रांसीसी क्रांति हुई तो उसमें भी चर्च का विरोध हुआ। फ्रांसीसी क्रांति के अधिकांश नेता तार्किक थे और खुलेआम चर्च का विरोध करते हुए ईश्वर के भी विरोधी थे। ईश्वर की अवधारणा का óोत अगर कबीलाई सरकार, समाज का मुखिया या राजा था तो राज्य की तरह धर्म में भी पूरा आडम्बर प्रदर्शन, कर्मकाण्ड का आ जाना स्वाभाविक था। धर्म का एक पूरा कार्य व्यापार विकसित हो गया। देशकाल की जरूरतों के अनुसार बनते-बिगड़ते रहे और बाद में पूरी एक देवश्रंखला तैयार हो गई और जितने आदमी नहीं थे उतने देवताओं की कल्पना कर ली गई। आज भी गाडमैन बनने की प्रक्रिया थमी नही है। रजनीश जैसे तर्कशील व्यक्ति का भगवान रजनीश और ओशो बनने का प्रयास इसी परिणाम की परिघटना है।
मानव सभ्यता के विकास में संस्थानीकरण की बड़ी अर्थवत्ता है। कोई भी विचार बिना संस्था निर्माण के पूरी तरह चरितार्थ नहीं होता है। संस्थाओं ने एक ओर तो विचारों को संगठित और विस्तारित किया है तो दूसरी ओर उन्हें विकृत और कुंठित भी किया है। इसका कारण है विचारों की ठेकेदारी और बिचौलियागिरी। राजनीति के उद्भव में राजनैतिक दलों और नेताओं के सकारात्मक और नकारात्मक भूमिका जगजाहिर है। सभी धर्माे में पुरोहित, पादरी, मुल्ला और धर्मगुरू जैसे लोग पैदा होते गये हैं और उन्होने मनुष्य और ईश्वर के बीच बिचौलिचों को अनिवार्य बनाया है जिसके लिए उन्होने कर्मकाण्ड के हथकण्डें अपनाये जो वास्तव में निरर्थक और भ्रामक होते हैं तथा धार्मिक धंधागिरी को आगे बढ़ाते हैं। ऐसा हमेशा से होता रहा है। पर आज इस बिचौलियागिरी के वर्चस्व के जमाने में धर्म की दुर्दशा के लिए ये बिचौलिए ही जिम्मेदार हैं। हम गौर करें कि बुद्ध का सिर्फ भगवानीकरण ही नहंी हुआ, बल्कि तंत्रीकरण भी हुआ और कर्मकाण्डी भी बनाया गया। कर्मकाण्डी की जटिलता और कठोरता ने बौद्ध धर्म की तार्किकता और वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह् लगाया। यूरोप में कैथोलिक चर्च में पादरियों ने चमत्कार को स्थापित किया। अंततः क्षमापत्रों के रूप में स्वर्ग के टिकट बिकने लगे। ऐसी स्थिति में प्रोटेस्टेंट समुदाय का आर्विभाव अनिवार्य हो गया। पर सभी ईसाई सम्प्रदायों में अनुष्ठान और अंधविश्वास बरकार रहे। इस्लाम में भी शुरूआती सादग्री के बाद खलीफाओं और मुल्लाओं को आगे बढ़ाने वाला वर्चस्व कायम हो गया। यह हाल दुनिया के सबसे बड़े धर्मो का है।
आज धर्म का कारोबार इतना व्यापक और सर्वव्यापी हो चला है कि उसके बिना समाज की कल्पना करना मुश्किल हो गया है। नितान्त वैयक्तिक पूजा का भी व्यवसायीकरण हो चुका है और कोई भी पूरा बिना पुरोहित, पुजारी, पंडा आदि के नहीं हो सकती है। त्योहारों का एक पक्ष धार्मिक और दूसरा सामाजिक होता था। पर अब वह मूलतः धार्मिक तथा आर्थिक होते जा रहे हैं। हर त्योहार बाजार के लिए नये-नये अवसर प्रदान करता है। धर्म का आर्विभाव जीवन की असुरक्षा और अनिश्चय के कारण हुआ होगा, और वह सारे विकासों के बावजूद समाप्त नही हो पाया। इसलिए धर्म की जगह समाज में यथावत बनी रही। धर्म के विकास को अवसर मिला और पुरोहितों-पुजारियों ने दो बड़े ही कारगर उपकरणों का अविष्कार किया। ये अविष्कार थे- पुरस्कार और दण्ड तथा शुद्धता और अशुद्धता। पुरस्कार और दण्ड का सबसे कौशलपूर्ण प्रयोग स्वर्ग और नरक की अवधारणा के रूप में किया गया। अर्थात् अच्छे कर्मों का पुरस्कार स्वर्ग और बुरे कर्मों का दण्ड नर्क है। मनुस्मृति में इनमें से एक ही सबसे कुख्यात है। शुद्धता को श्रेष्ठता का मानक बनाया गया। इस हथकण्डे से ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और वैश्य की श्रेणीबद्धता कर्म से नहीं जन्म से तय कर दी गयी और सभी शूद्रों को हमेशा के लिए अशुद्ध करार देकर इसे धार्मिक जामा पहना दिया गया। भारतीय समाज के सबसे दो घातक शत्रु ब्राह्मण से श्रेष्ठता और पितृसत्ता है। एक बार यह मान्य हो गया तो शूद्रों और नारियों को धार्मिक कर्म से वंचित कर दिया गया। यह श्रेष्ठता बोध इतना व्याप्त है कि नीचे से नीचे वाला भी अपने को किसी न किसी रूप में ऊपर समझता है। तभी तो दलित प्रताड़ित भी अपनी पत्नियों से अपने को श्रेष्ठ समझते हैं और उनका हर तरह से शोषण और दमन करते हैं। महिला भी जब सत्ता पा जाती है तो उसका व्यवहार भी पितृसत्तात्मक हो जाता है।
धर्म और विज्ञान दोनों का चमत्कार से निकट का सम्बन्ध है। फर्क सिर्फ इतना है कि धर्म को चमत्कार के तत्व को संजोकर रखा गया है, जिसे चमत्कार के रूप में विकसित किया गया है, जबकि विज्ञान जादू को नकारता हुआ धर्म के विपरीत चलता है। इस दौरान विज्ञान का आधार विश्वास और धर्म का आधार अंधविश्वास होता गया। इसलिए कुछ वर्षों से धर्म के हिमायती धर्म के वैज्ञानिक आधार और धर्म तथा विज्ञान में अन्तर्निहित समानता की बात करने लगे हैं। इसके लिए रिलेटिविटी और प्रोबेबिलिटी के सिद्धान्तों का सरलीकरण उनकी धर्म से भ्रामक समानता बतायी जाने लगी है। यह तो गलत है पर दूसरी ओर कुछ लोग जैसे एलन वुड्स अपनी किताब ‘रीजन एवं रिवोल्ट’ में इस बात पर जोर देते रहे कि वैज्ञानिकों में तनिक भी अनिश्चितता और ईश्वर में विश्वास वैज्ञानिकता का हनन है। पर ये भी सच्चाई है कि बहुत से वैज्ञानिक धार्मिक होते रहे तथा ईश्वर को पूरी तरह नकारने वाले वैज्ञानिक संख्या में बहुत ज्यादा नहीं हैं। विज्ञान और धर्म में अनिवार्य अन्तर्विरोध का प्रश्न राजनीतिक अधिक है। दोनों के बीच अनिवार्य अस्तित्वगत टकराहट नहीं है। दोनों की प्रकृति परस्पर विरोधी है पर धर्म मूलतः वैयक्तिक है तो विज्ञान सामुदायिक। फिलहाल वे एक-दूसरे की राह नहीं रोकते हैं।
क्रान्ति और धर्म के बीच असहज रिश्ता रहा है। फ्रांस की क्रान्ति में वह पूरी तरह उजागर हो गया था। क्रान्ति के पहले का जो भौतिक वातावरण था उसमें वाल्टेयर द्वारा चर्च की आलोचना का निश्चित प्रभाव था। अट्ठारहवीं शती में जो इनलाइटिनमेंट हुआ उसमें रैशनल का जोर था और तर्क बुद्धि तथा धर्म सहगामी नहीं थे। क्रान्ति हुई तो जितना राजतंत्र विरोध में नहीं था उससे अधिक चर्च विरोध में था। क्रान्ति के पहले कुछ कामों में चर्च विरोधी नीति का प्रतिपादन हुआ। एक कानून बना कि गिरिजाघरों की सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और पादरियों को सरकारी मुलाजिम बना लिया जाय। कुछ पादरियों ने इसका समर्थन नहीं किया। क्रान्ति की जड़ों के मजबूत न होने के कारण उसकी धर्म विरोधी छवि थी। रूसी क्रान्ति में भी धर्म के प्रतिगामी शक्ति होने के सिद्धान्त की स्थापना क्रान्तिकारियों के बीच सर्वमान्य थी। क्रान्ति का विरोध करने वालों में जार्जशाही का समर्थक रूस का आर्थोडाक्स चर्च प्रमुख था। क्रान्ति के बाद चर्च की सत्ता समाप्त कर दी गयी और सारी सम्पत्ति जब्त कर गिरिजाघरों और दूसरे धर्मस्थलों को सार्वजनिक सांस्कृतिक केन्द्रों की तरह विकसित किया गया। पर धर्म की न तो आदेश द्वारा स्थापना हुई थी और इसलिए उसका किसी एक आदेश द्वारा अन्त भी नहीं हो सकता था। धर्म का एक लम्बी प्रक्रिया के दौरान एक नैसर्गिक स्पेस बना है इसलिए सोवियत यूनियन उसे समाप्त नहीं कर सका। धर्म की सोवियत रूस में स्थिति तब उजागर हुई जब उसका विघटन हुआ। सारे धार्मिक स्थल अचानक गुलजार हो गये। इससे साफ जाहिर है कि धर्म विरोध क्रान्ति के बाद आरोपित किया गया था। धर्म के सार्वजनिक प्रदर्शन भले ही न होते हों पर अन्दर ही अन्दर धर्मपरायणता बरकरार थी। धर्म और क्रान्ति का एक रिश्ता ईरान में उजागर हुआ जब पूँजीवादी साम्राज्य समर्थक ईरान के भ्रष्ट शासक प्रजाशाह पहलवी के विरुद्ध धर्मगुरु खुमैनी के नेतृत्व में क्रान्ति हुई थी और शाह की सत्ता को अमेरिका भी नहीं बचा पाया था। तब से वहाँ धर्म केन्द्रित शासन ही बरकरार है और उसका अमेरिका विरोध भी जग जाहिर है। पर धर्म केन्द्रित रहते हुए कोई भी शासक कितना जन-पक्षधर हो सकता है, यह विचारणीय है। इसकी सीमा स्पष्ट है। धर्म का एक नैतिक पक्ष भी होता है। वह भगवान के साथ शैतान को भी या यूँ कहें शैतान के नाते भगवान के अस्तित्व को स्वीकार करता है। एक संवेदनशील और न्यायप्रिय व्यक्ति धर्मपरायण भी हो सकता है। इसके अलावा विज्ञान और टेक्नोलॉजी की निर्णायकता इस तरह बढ़ी है, धर्म के नाम पर इतने अनाचार और भ्रष्टाचार होने लगे हैं उससे कुछ धार्मिक लोग भी धार्मिक जड़ता के विरुद्ध हो रहे हैं जो बिल्कुल स्वाभाविक है।



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इतिहास से सबक

इतिहास सेसबक
- भगवान स्वरूप कटियार

इतिहास ने इन्सान को गढ़ा और इन्सान ने इतिहास का निर्माण किया। इतहास सिर्फ तारीखांें का सिलसिला ही नहीं है बल्कि हमारे वजूद की हर कड़ी इतिहास से जुड़ी है। मनुष्य की सभ्यता, संस्कृति, इतिहास कुछ भी उसके पर्यावरण और परिवेश के साथ बिना जोड़े सही ढंग से अपनी समग्रता में भला कैसे समझा जा सकता है। सवाल उठता है कि आखिर धरती, जल, अग्नि, आकाश पर हवा का इतिहास से क्या लेना। पता नहीं किसने और कब हमारे भारत को आध्यात्मिक कहना शुरू कर दिया और मजे की बात यह है कि सारी भौतिक सुख-सुविधायें भोगते हुये हम आध्यात्मिक होेने के गौरव को भी ओढ़े हुये हैं। वेद भौतक शक्तियों की रचना और उपासना ही तो हैं। हमारे सारे शास्त्र महाभारत, रामायण और वेद भौतिकता से भरे पड़े हैं। जब प्रयोगशालायें नहीं थीं, तब चीर-फाड़, मन-मस्तिष्क में ही होता था और तभी हमारे मनीशियों ने देख समझ कर और अर्न्तभाव से जान लिया था कि यह शरीर भौतिक तत्वों से ही बना है। मनुष्य का जीवन इन्हीं तत्वों से बना और इन्हीं से संचालित होता है। अब तो विज्ञान ने भी प्रमाणित कर दिया है कि जीवन का सारा खेल रसायन का है। हमारी हर गतिविधि यहाँ तक की सोंचना, प्यार या घृणा करना तक रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम होता है। अमीबा से आदमी और फिर चिन्तनशील सांस्कृतिक प्राणी बनने की यात्रा बहुत दिलचस्प है। वह प्रक्रिया आज भी जारी है और विकास यात्रा रूकी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम यह समझें कि आदमी के जीवन और उसके भौतिक आधारों के बीच क्रिया-प्रक्रिया से इतिहास कैसे आगे बढ़ा। आदमी के लिये अग्नि की उपयोगिता और विध्वांसिकता और आकाश की विराटता समझना आसान रहा होगा और इसीलिये उन्हें देवता बनाने मंे उन्होंने देर नहीं की। आग ने तो मनुष्य को हिंसक जानवरों से सुरक्षा भोजन और पर्की इंटों तथा बर्तनों के माध्यम से बेहतर जीवन दिया। आग को घर-परिवार का अंग बना लिया गया। और यही वजह थीं कि आग को हर व्यक्ति घर में सुरक्षित रखता था। आज भी कई आदिवासी परिवारों में यह प्रथा जारी है। सभी धर्मों में अग्नि को वाहक और सहारा की तरह स्थापना मिली। दुनिया में एक धर्म (हिन्दू) तो मुख्यतः अग्नि पूजक ही है। ऋग्वेद में अग्नि के रोमांचकारी रूप का काव्यात्मक वर्णन है- जैसे ‘धर्नुधर का बाण अथवा सेना का आगे बढ़ते जाना कर देता है भयभीत वैसे ही तू दौड़ती है गतिशील होकर नित्य नये रूपों को धारण करती हुई खेतों और जंगलों में’।
पर धीरे-धीरे अग्नि का स्वेच्छाचारी इस्तेमाल हुआ। अग्नि के विध्वंसक रूप को प्रमुखता देने के लिये ही बारूद का इस्तेमाल शुरू हुआ और इस प्रकार अग्नि रक्षक से भक्षक बन गयी। और इतिहास साक्षी है कि यह सब सत्ता के लोलुपता के कारण हुआ। गगन एक अज्ञेय विराट था। आकाश में ही सूरज चाँद उगते डूबते थे। बादल गिरते गरजते बरसते थे और आँधियाँ चलती थीं। आकाश का निरीक्षण करते हुये मनुष्य ने ज्योतिष का विकास कर लिया। मनुष्य ने आकाश को ही पुण्य आत्माओं और देवताओं का निवास मान लिया। आकाश में सिर्फ आत्मा ही नहीं परमात्मा भी रहता था। फिर आकाश को मुट्ठी में करने के लिये वायुयान बने और वहाँ भी विध्वंस लीला शुरू हुयी और स्टारवार्स तक की बात सोंच ली गयी। आज अंतरिक्ष में इतनी आवाजाही है कि एक ओर मनुष्य का ब्रह्माण्ड विषयक ज्ञान बढ़ता जा रहा है और दूसरी ओर आकाश भी प्रदूषित हो रहा है। सवाल उठता है कि इतिहास ऐसे प्रगति करार दे या अवसान? क्योंकि यह प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन परत में छेद के नाते आत्मघात की ओर संकेत कर रहा है। अब थोड़े विस्तार में धरती, हवा और पानी को इतिहास में देखा गया है। मनुष्य ने स्त्री को, प्रकृति को और नदी को माँ कहा और सबसे पहले उसने धरती को माँ कहा, धरती ने ही तो उसे जन्म दिया था। उसी में उगती थीं नदियाँ, वनस्पतियाँ, अनाज, फूल-फल और वह सब जो प्राणियों का पोषण करता था, जीवन को बनाये और बचाये रखता था। उसी धरती पर जंगल थे जिन्हें काट-काट कर मनुष्य ने बस्तियाँ बसाईं। अर्जुन द्वारा खांडव वन जलाकर राजधानी के लिये भूमि तैयार करना यथार्थ का मिथकीय रूप ही तो है। धरती, खेत, बस्तियाँ साथ में बनती गयीं पर चलो इससे कोई फर्क नहीं था। फिर आदमी धरती को अन्दर तक खोदने लगा। ताँबा, लोहा, कोयला, चाँदी, सोना खोदते-खोदते वह बॉक्साइट, यूरेनियम और थोरियम तक पहुँच गया। इन धातुओं का बहुविधि उपयोग करने लगा। धरती खोदकर परमाणु बम बनाने के लिये खनिज निकाले और फिर बम बनाकर धरती के नीचे ही परीक्षण करने लगा। अपने घर, अपने खेत, अपने गाँव के लिये धरती पर्याप्त थी फिर अपने कबीले अपने राज्य के लिये धरती कम पड़ने लगी। फिर दूसरों की धरती हड़पन के लालच ने जोर मारा तो उपनिवेश वाद तथा साम्राज्यवाद जैसे धरती विरोधी हथकंडे अपनाये गये।
जब लालच ही नीति बन गयी- व्यक्ति लालची हो गया, राज्य लालची हो गया तो धरती को बेहाल होना ही था जैसा कि मनुष्य का स्वभाव है कि जो बात समझ में नहीं आती या जानबूझ कर टालनी होती है तो सम्मेलन बुला लेता है या कमेटी बना लेता है। रियो डि जेनेरियो, टोकियो तथा कोपेनहेगेन में दुनिया के देश सम्मेलन करते रहे और चिल्लाते रहे कि धरती खतरे में है। पर सवाल तो धरती से सम्बन्ध सुधारने का है, तथा इतिहास से सबक लेने का है। देश-देश रटने और चिल्लाने से समस्यायें बढ़ती ही गयीं। सारी धरती, सारी प्रकृति, सारा प्राणी जगत और प्राणियों को एक माने बिना अब इतिहास आगे नहीं जा सकेगा। आदमी को आक्सीजन का पता तो बहुत बाद में चला पर हवा चलती दौड़ती और तूफान मचाती दिखायी दी और फिर अपने अन्दर भी आते-जाते दिखने लगी। साँस चलने से जीवन के सम्बन्ध का एहसास तो होने लगा था और इसीलिये एक ओर वायु को देवता और मिथकों में पवनपुत्र को सर्वशक्तिमान और कृपालु बना डाला तो दूसरी ओर श्वास को साधते हुये योग प्राणायाम तक पहुँच गया जिसकी आज वैज्ञानिक पुष्टि तक होती जा रही है। विज्ञान का युग शुरू हुआ तो पता चला कि वायु भी कई तत्वों का मिश्रण है। उसमें सभी के जीवन का आधार कार्बन भी है और आक्सीजन भी है। प्रकृति का क्या जादुई संतुलन है- एक ओर वनस्पितियाँ कार्बन डाई आक्साइड सोंख कर आक्सीजन छोड़ती हैं और मानव जाति आक्सीजन सोंखकर कार्बन डाई आक्साइड छोड़ती हैं। बाद में यह भी पता चला है कि आक्सीजन के बगैर आग नहीं जलती। फिर लालची मनुष्य ने कार्बन और आक्सीजन दोनों का व्यापार करना शुरू किया। सृजनात्मक हुआ तो आक्सीजन के सिलेण्डर बना लिया और विध्वंसक हुआ तो तरह-तरह के जहरीली गैस बनाने लगा। युद्ध में तरह-तरह की गैस का इस्तेमाल होने लगा। हवा सबसे बड़ी वाहक है जीवन और मरण दोनों की। सामान्य औद्योगिक प्रक्रिया में भी तरह-तरह की मारक गैसें निकलने लगी और पर्यावरण प्रदूषित होता गया। मानव इतिहास रचा ही गया बहते जल यानि नदियों के किनारे। भूख से ज्यादा प्यास ने आदमी को गढ़ा है। भूख भी तृप्ति भी जल के संयोग से ही होती है। तभी तो ‘जल ही जीवन है’ तक पहुँच गया था आदमी। जब आदमी ने सोंचना शुरू किया तोजल की सबसे अधिक उपमा रूपक मुहावरे बनकर मन-मस्तिष्क में प्रवाहित होता रहा। मनुष्य ‘बिन पानी सब सून’ के नतीजे तक पहुँच गया। जीवन में प्रवाह और उसकी शुद्धता जल पर निर्भर होने लगी। जहाँ जल को शुद्धता से जोड़ा गया। वहीं जल-जल में फर्क होने लगा। ठाकुर का कुआँ अलग हो गया। अम्बेदकर को महाड़ में जल के लिये आन्दोलन करना पड़ा क्योंकि वहाँ जल सबके लिये उपलब्ध नहीं था। जल ही शुद्धकर्ता था पर जल को ही अशुद्ध किया जाने लगा और उसे अपेय बना दिया गया। सारी दुनिया ही नहीं मनुष्य के शरीर तक में अधिकांश जल ही तो है। पर धीरे-धीरे धरती के ऊपर और धरती के नीचे आदमी की आँखों में जल इतना कम होता गया कि उसकी पर्याप्ता संकट में पड़ गयी। गर्मी आई नहीं कि शहरों में सबके लिये पानी का संकट खड़ा हो गया। यहाँ तक कहा जाने लगा कि तीसरा विश्वयुद्ध जल के लिये ही हो सकता है। आज नदियाँ बेची जा रही हैं। समर्थ लोग बोतल का पानी पी रहे हैं। और असमर्थ लोग राजधानी में भी जहरीली हो चुकी जमुना को चूस रहे हैं। भौतिक से सांस्कृतिक तक की यात्रा की कथा ही इतिहास है। उसमें खुदी को बुलन्द करने के किस्से हैं। तो सर्वनाश की ओर बढ़ते कदमों के निशान भी।
यह सब मनुष्य के अहंकार और लालच का फल है कि सम्पूर्ण धरती और सम्पूर्ण सृष्टि विनाश की कगार पर खड़ी है। मनुष्य यह भूल जाता है कि वह कितनी भी ताकत हासिल कर ले पर पकृति से ताकतवर नहीं हो सकता क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि और मनुष्य स्वयं भी प्रकृति की ही उत्पत्ति है। अहंकार और महत्वकांक्षा को नष्ट करने के उपदेश शास्त्रों और पुराणों में बराबर दिये गये। पर न तो अहंकार नष्ट हुआ और न ही मनुष्य के लालच और महत्वकांक्षी होने की प्रवृत्ति को ही खत्म किया जा सका। सच्चाई यह है कि मनुष्य की कोई भी प्रवृत्ति उपदेश या शिक्षा से नष्ट नहीं की जा सकतीं उन्हें कुछ समय के लिये सुसुप्त तो किया जा सकता हैं पर अनुकूल परिस्थितियों में वह पुनः प्रकट हो जायेंगी। दरअसल अहंकार और महत्वकांक्षा को जीतने की भावना भी एक तरह का अहंकार और महत्वकांक्षा ही है। मनुष्य अपनी समस्त वृत्तियों के साथ ही मनुष्य है और यही उसकी शक्ति भी है। अगर यह वृत्तियां न होती तो सभ्यता और संस्कृति की महानतम उपलब्धियाँ तो दूर मानव जाति का अस्तित्व भी खत्म हो गया होता। सवाल अहंकार और महत्वकांक्षा को जीतने का नहीं है और न ही उन्हें नष्ट करने का बल्कि उनके उद्ातीकरण का है। यही वजह है कि धर्म और संत विफल हो जाते हैं, इसलिये नहीं कि मनुष्य गलत है बल्कि उनकी मनुष्य के प्रति समझ गलत है। उदाहरण के लिये मैं सारी पृथ्वी को नाप लूँ ताकि यह पृथ्वी मेरी हो जाये। यह एक महत्वकांक्षा है। दूसरी महत्वकांक्षा यह भी हो सकती है कि पूरी दुनिया में प्रेम और बन्धुत्व फैलाया जाय ताकि युद्ध की कल्पना ही खत्म हो जाये। द्वितीय विश्वयुद्ध में कुछ देशों को नष्ट करने की महत्वकांक्षा मानव विरोधी है तो दूसरी ओर युद्ध को समाप्त कर दुनिया में शांति फैलाने की महत्वकांक्षा मानव हित मंे है। महत्वकांक्षा के बल पर ही लोग एवरेस्ट पर जाते हैं, मदर टेरेसा गरीबों की सेवा के लिये दुनिया मंे एक मिथक बन जाते हैं। यदि महत्वकांक्षाओं के पक्ष सकारात्मक हैं और इन सकारात्मक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिये हम अहंकारी भी हो जायंे तो उससे दुनिया की शक्ल बदल सकती है। जैसे- दुनिया के तमाम देश यह तय कर लें कि हम भले ही मिट जायें किन्तु दुनिया के किसी कोने में भूख और आतंकवाद को नहीं पनपते देंगे। तो परिवर्तन की एक अच्छी शुरूआत हो सकती है। अगर मुट्ठी भर सिरफिरे आतंकवादी दुनिया को डरा सकते हैं तो दुनिया के परस्पर प्रेम करने वाले लोग और देश मिलकर इन मुट्ठीभर आतंकवादियों को मिटा भी सकते हैं। बस जरूरत इस बात की है कि महत्वकांक्षाओं और अहंकार का रूप सकारात्मक हो।

भूख का भविष्य -

भूख का भविष्य
- भगवान स्वरूप कटियार

दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा संकट उपजाऊ भूमि का लगातार रेगिस्तान में तब्दील होने का है। भारत जैसे विकासशील देश में सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हित में प्राकृतिक सम्पदा का अनाप-शनाप दोहन तथा कौढ़ियों के मोल उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण है। धरती के रेगिस्तान में तब्दील होने की इस प्रक्रिया ने बड़ी तेजी से और बड़े पैमाने पर चीन, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा भूमध्य सागर के अधिकांश देशों में, पश्चिम ऐशिया और उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के सभी देशों सहित भारत में भी चल रही है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई साम्राज्यों का अंत उनके रेगिस्तान में बदल जाने के कारण ही हुआ है। एक समय था जब मोरक्को, ट्यूनिशिया और अल्जीरिया जो आज वृक्षविहीन रेगिस्तान है रोमन साम्राज्य के गेहूँ उत्पादन के उपजाऊ क्षेत्र हुआ करते थे। किसी समय ईरान एक बड़ा साम्राज्य था। और आज उसका अधिकांश भाग रेगिस्तान है। सिकन्दर के अधीन ईरान एक विशाल साम्राज्य था। एशिया, अफ्रीका, ऑस्टेªलिया, न्यूजीलैण्ड और उत्तरी अमेरिका की धरती का सत् चूसने और खनिज सम्पदा के दोहन में ब्रिटिश, फ्रेंच और अन्य आधुनिक साम्राज्यों का बड़ा हाँथ रहा है। कीनिया, यूगाण्डा और यूथोपिया में ईमारती लकड़ी की कटाई से नील नदी का विशाल प्रवाह नष्ट हो गया है। पूरी दुनिया में उष्ण कटिबन्धीय जंगल 2 करोड़ हेक्टेयर प्रति वर्ष कट रहे हैं। अगर सिलसिला थमा नही ंतो 20-25 साल में उष्ण कटिबन्धीय जंगल समाप्त हो जायेंगे। जिससे पूरी दुनिया में खाद्यान्न, ऑक्सीजन और पानी का संकट गहरा जायेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन के अनुमानों के अनुसार दुनिया में प्रतिदिन भूखे रहने वाले लोगों की संख्या पिछले वर्ष एक अरब से बढ़कर सवा अरब हो गयी है। सन् 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ज्यादा हो जायेगी। ‘हमारी लुटी हुयी धरती’ (अवर प्लण्डर्ड प्लेनिट) नामक अपनी पुस्तक में फेयर फील्ड आस्बर्न ये अनुमान लगाते हैं कि सारे विश्व में चार अरब एकड़ भूमि खेती योग्य है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार पूरी दुनिया में कुल भूमि 33 अरब 17 करोड़ 60 लाख एकड़ है जिसमें कृषि योग्य 3 अरब 70 करोड़ भूमि है। एक अन्य आंकड़े जो पियरसन और होरिजन ने तैयार किये हैं के अनुसार पृथ्वी का कुल क्षेत्रफल 35 अरब 70 करोड़ एकड़ है जिसका 34 प्रतिशत भूभाग कृषि योग्य है जहाँ पर्याप्त वर्षा और गरमी होती है। इस प्रकार संसार भर में कुल 2.5 अरब से लेकर 4 अरब के बीच भूमि कृषि योग्य है। मनुष्य जलवायु तो बदल सकता है पर किसी भी सूरत में इससे अधिक खेती योग्य भूमि बनाना नामुमकिन है। इस उपजाऊ जमीन में 10-15 प्रतिशत भाग पटसन और तम्बाकू के उत्पादन के लिये प्रयोग किया जाता है। इन आंकड़ों से जाहिर है कि यदि वाणिज्य और व्यापार पूरी तरह आदर्श बन जाये जो मुमकिन दिखायी नहीं देता, खाद्यान्न ले जाने-लाने की ढुलाई और आयात-निर्यात पर प्रतिबन्ध न रहे तो पूरे संसार को बड़ी मुश्किल से भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है। जलवायु संकट को लेकर अर्न्तराष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं पर धरती के कटाव रोकने और उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगाने जैसे उपायों पर कारगर उपाय खोजने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रिपोर्ट का तकाजा है कि हम भविष्य के साधनों को नष्ट किये बिना वर्तमान की बुनियादी जरूरतों को पूरा करें। अगर कुछ करना है तो अभी करें वरना भविष्य बचेगा ही नहीं।
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने खाद्य सुरक्षा और जलवायु संकट को वर्तमान विश्व की बड़ी समस्यायें बताते हुये उन्हें परस्पर अन्तर सम्बन्धित बताया है। उन्होंने कहा कि दुनिया मंे आवश्यकता से अधिक भोजन है। इसके बावजूद एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं। सन् 2050 तक विश्व की आबादी नौ अरब से ज्यादा हो जायेगी अर्थात् आज से 2 अरब ज्यादा। प्रत्येक वर्ष 60 लाख बच्चे भुखमरी के शिकार होते हैं। खाद्य सुरक्षा जलवायु सुरक्षा के बिना सम्भव नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के भूमि रक्षा विभाग की ओर से प्रकाशित 7 हजार वर्षों में ‘भूमि की विजय’ नामक पुस्तक में लेखक डब्ल्यू सी लाडर मिल्क कहते हैं कि आधुनिक सभ्यता को उस तरह के लम्बे पतन और बरबादी से बचाना है तो समाज को शोषण की अर्थव्यवस्था से बाहर निकालकर संरक्षण की अर्थव्यवस्था को फिर से अपनाना होगा। यह सच है कि रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग और मशीनों की मदद से एक ही फसल की खेती करते रहने से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका और यूरोप में खाद्य पदार्थों का उत्पादन आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ाया गया है। मगर मूल नियन्त्रण, निर्यात नियन्त्रण और दूसरे सरकारी और आर्थिक हस्तक्षेपों के कारण यह अतिरिक्त उत्पादन आमतौर पर भूखी जनता तक नहीं पहुँचने दिया गया। जो लोग संसार की खाद्यान्न समस्य को हल करने के लिये विज्ञान पर निभर रहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि विज्ञान मानव के लोग, अहंकार, कल्पनाहीनता, मानसिक आलस्य, जड़ता या रूपये-पैसे और आर्थिक प्रक्रियाओं का अत्यधिक मूल्य आंकने की बुराई का इलाज नहीं कर सकता। जितनी तेजी से मानव जाति का मन और आदतें बदल रही हैं उतनी ही तेजी से या उससे भी ज्यादा तेजी से होने वाले धरती के कटाव के कारण हमारे अन्य उत्पादन के स्रोत भी नष्ट हो रहे हैं।
जलवायु का संतुलन बिगड़ने और प्राकृतिक संसाधनों के अकूत खजाने की तबाही के निकट आ जाने से अगर कुदरत ही खुदकुशी के लिये विवश कर दी जाती है, तो उसकी श्रेष्ठ रचना के रूप मंे मौजूद मनुष्य का बचना कैसे मुमकिन है? पर शायद यह सवाल एकतरफा है। हम ऐसे सवाल इसलिए पूछते हैं क्योंकि हमें कुदरत का अन्दाजा नहीं है। दरअसल यह आत्मआलोचना का समय है। वक्त रहते यदि हमनें अपने विकास मॉडलों को नई शक्ल नहीं दी तो बहुत कुछ भुगतना पड़ सकता है। दरअसल जो बात देखने-समझने लायक है, वह यह है कि हमारे दौर का पूँजीवादी तथा उत्तर पूँजीवादी विकास जिस अनुपात में कुदरत को खुदकुशी करने की ओर ढकेल रहा है उसी अनुपात में कुदरत भी मानव समाजों को आत्मघाती प्रवृत्तियों का शिकार बनाती है। इसके लिये कुदरत कसूरवार नहीं है। सारी जिम्मेदारी हमारी है। हम जो बोते हैं वही काटते हैं। हमारी विवशतायें, हमारी संस्कृतियाँ, हमारी चेतनायें हमारी कुदरत के साथ निरन्तर अर्न्तक्रिया करती हैं और जो कुछ कुदरत में घट रहा होता है, वह हमारे व्यवहारों-आचरणों में उतरता हुआ हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करता हुआ चलता है। इसे थोड़ा ठोस रूप में समझने के लिये हमें ध्यान देना होगा कि इस वक्त दुनिया भर में जो असंख्य वाहन लाखों सालों के जीवन रूपों के अवशेषों को डीजल-पेट्रोल के रूप में फूंकते हैं तथा हमारे रफ्तार से चलने की सुविधा बन रहे हैं, उनकी वहज से मानव जाति कुदरत की कितने बड़े पैमाने पर कर्जदार हो रही है। लाखों वर्षों में पैदा होते आये असंख्य प्राणियों के अवशेष हमारे काम आ रहे हैं। इ वजह से हम अपने पूर्वजों के प्रति कर्जदार हो रहे हैं, मगर उस अनुपात में हम उन्हें कुछ भी नहीं लौटा रहे हैं। इस वजह से हमारी संस्कृति हमें जीवनरूपों के प्रति और संवेदनशील और जिम्मेदार होने के मूल्य प्रदान नहीं कर रही है। हम न उतने पेड़ लगा रहे हैं और न ही उतने समुद्री जीवों को पनपने के हालात पैदा कर रहे हैं। और न ही हम अपने इतिहास और परम्पराओं के प्रति विनम्र और आभारी ही हैं जिसके कारण नया मूल्य रचने की हम शक्ति भी खोते जा रहे हैं। आज हालात यह है कि हम अपने खाते ही नहीं बल्कि उधारी तक की सम्भावनायें भी खर्च करते जा रहे हैं।
आत्मघाती विकास का यह मॉडल परजीवी विकास का मॉडल है। परजीवियों के लिये युद्ध और हिंसा एक सहज स्वीकृति मनोवृत्ति है। इसलिये कुदरत को तबाह करने वाली सभ्यता के पक्षधर, युद्धों में मानव जाति की सामुहिक बल लेने से कैसे हिचकिचा सकते हैं। परिजीवी विकास के इस मॉडल में मनुष्यों के कामयाब होने की शर्त भी वहीं है- दूसरों की कीमत पर अपना हित साधना। इसी का नाम प्रतिस्पर्धा है। सभी को एक-दूसरे के साथ तुलना की मनःस्थति में लाकर खड़ा कर दिया है। ‘आत्म सभ्य’ का अर्थ खो गया है। कुदरत खो जायगी तो मनुष्य आत्मा को भी खो देगा। परजीवी होने का यही मतलब है आत्मघाती जीवन शैली को जीवन का लक्षण समझ लेना क्या यह संयोगवश है कि मध्य एशिया के जो मूल अपनी उस कुदरत द्वारा संरक्षित तैल सम्पदा को बेंच-बेंच कर ही समृद्ध हुये हैं और जिन्होंने उस समृद्धि को आधार बनाकर इसी श्रम मूलक उत्पादन तंत्र का विकास कर अपने समाजों को रचनात्मक हो सकने की कोई नई सम्भावना नहीं दी है- उन्हीं देशों में मजहबी कट्टरतायें, आत्मघाती आतंकवाद की ओर ज्यादा रूख करती नजर आती हैं। सऊदी अरब के ओसामा और मिस्त्र के सईद कतुब या अल जवाहिरी जैसे लोगों की सोंच में क्या हमें वैसी ही अतीत जीवी भूगर्भीय आग और तादीकी दिखाई नहीं देती जिसमें लाखों वर्षों से तपते-तपते प्राणियों की देह सम्पदायें तैलीय जीवाश्मों में बदल जाती हैं। वह स्मृति-संपदा, अन्तःरूपांतर की कुंजी समेटे हुये हैं, इसलिए कुदरत उन्हें लाखों वर्षों तक महफूज रखती है। पर वह मृतकों की दुनिया का सच है। उसे जीवन और उसके भविष्य की कसौटी नहीं बनाया जा सकता।
कुदरती संसाधनों का समग्र खनन-दोहन मानव जाति के लिये बेहद खतरनाक है। मनुष्य कुदरत के निजाम को अपने हाँथों में ले सकने लायक कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह खुद प्रकृति पुत्र है। प्रकृति अपने खनिजों-जीवाष्मों को जीवन-चक्र चलाये रखने के लिये सम्भालती है। उनका जिस अनुपात में दोहन होगा, उसी अनुपात में जीवन-चक्र भी डगमगायेगा। खास बात यह है कि कुदरती संसाधनों की तबाही का मतलब है मनुष्य से उसके मनुष्य हो सकने की संभावना को छीन लेना। अभी हमने इस दिशा में गहराई से सोंचना नहीं किया है, लेकिन जल्द ही ये चिन्तायें हमें चारो ओर से घेरकर हमसे बहुत से नये और बड़े सवाल पूछने वाली हैं। बेलगाम बहुराष्ट्रीय पूँजीगत विकास और पहले से भी ज्यादा भयावह होता जाता आतंकवाद ये दोनों स्थानीय निवासियों की अपने कुदरती संसाधनों पर असल मिलकियत को खतरे में डाल रही हैं। हालांकि अभी दुनिया में संसाधनों के स्थानीय स्वामित्व वाले विचार को भावी इंकलाब का आधार नहीं बनाया गया है मगर इसका कोई विकल्प भी नहीं बचा है। पूँजीवाद, अचल सम्पत्ति पर निजी मिल्कियत को कानूनी अधिकार बनाने से जुड़कर विकास कर पाया था, नही ंतो लोग पूँजी के विकल्प में अपने आप को किसलिये झोंकते हैं? इसी का अगला चरण है स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय निवासियों के स्वामित्व का कानूनी अधिकार जो दुनिया को वास्तविक जन इंकलाब में ले जायेगा।

Wednesday 24 November 2010

जीवन का सौंदर्य


जीवन का सौंदर्य मौलिक सर्जन कि इंसानी सामर्थ्य में है |
मानव जति अब सर्जन नहीं करती वह पुनरुत्पादन करती है
विचारो का ,विज्ञानं का,वस्तुओं का |
यह पुनरुत्पादन नए रूप लेकर आता है पर इसमे सृजन का सौरभ गायब है
नूतनता है पर नवोन्मेष नहीं है |
आप आकाश से वंचित है ,नदियों का प्रवाह और फूलो का रंग
आप के जीवन से परे की प्रकृति है
हम प्रकृति से ,प्रेरणा से रहित है |

Sunday 21 November 2010

हवा का रुख

तूफान वहीँ उठते है जहाँ होती है तपिश उमस और घुटन
हवा का रुख आने वाले तूफान का संकेत होता है
और परवर्तन का भी |
इसलिए दुनिया रोज बदलती है
और जन्म लेती रोज एक नयी उम्मीद
नयी सुबह |

मेरी मोक्ष


मेरा बोलना सदियों से कैद
किसी आवाज का मुक्त होना है |
मेरा लिखना धरती में दबे
सदियों पुराने यथार्थ के कंकाल को खोद कर
ज़मीं पर रख देने जैसा है
जो डरावना है और घिनौना भी |
किन्तु मैं समझ गया हूँ कि अब मेरा बोलना और लिखना ही मेरी मोक्ष है|

कलम के जरिये

कलम का इस्तेमाल करो
बतौर हथियार और बताओ
कि तुम लड़ रहे हो एक जंग
एक बदलाव कि जंग |
बतलाओ लोगों को
जीवन के प्रति निष्ठां रखना |
जो तुम्हे पढ़े वे भी लादे तुम्हारे साथ वह लड़ाई
जो लड़ी जा रही है पुश्तों से
अन्याय और गुलामी के विरुद्ध |

Saturday 20 November 2010

धूमिल कि कविता से

कविता भाषा में आदमी होने कि तमीज है है .

कोपेनहेगन के आइने में दुनिया का चेहरा

कोपेनहेगन के आइने में दुनिया का चेहरा
-भगवान स्वरूप कटियार
वरवर्तमान समय में धर्म मानव सभ्यता के विकास और प्रगति के मार्ग में एक बाधा की तरह दिख रहा है। धर्म जितना जोडता नहीं उतना तोड़ता है। बकौल कार्ल मार्क्स धर्म हृदय हीनों का हदय और आत्माहीनो की आत्मा था जो जनसाधारण के लिए अफीम साबित हुआ। धर्म का नैासर्गिक विकास हुआ है और उसकी व्यक्ति और समाज के जीवन में एक जगह बनी है जिसे नकारा नहीं जा सकता। गौतम बुद्ध और कबीर तक ने कई बार सनातन धर्म पर प्रश्न उठाये पर अंततः उनका भी दैवीकरण कर दिया गया और उनके विचार भी कर्मकाण्ड में खो गये इसलिए धर्म को एक गंभीर परिघटना की तरह समझने की जरूरत है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है यह सूत्र धर्म और ईश्वर पर भी लागू होता है। अपनी असमर्थता और आवश्यकताओं से निपटने के लिए धर्म का आर्विभाव हुआ। मार्क्स द्वारा धर्म की व्याख्या सबसे समीचीन लगती है, जिसके अनुसार धर्म भौतिकता और अध्यात्म दोनो का आधार है। मनुष्य धर्म का सृजन करता है, धर्म मनुष्य का नहीं। धर्म वस्तुत उस आदमी की चेतना है जो या तो अपने आप तक पहुंच नहीं पाया या जिसने अपने आप को खो दिया। यहां आदमी का अर्थ है आदमी की दुनिया राज्य और समाज। इसलिए धर्म के विरुद्ध संघर्ष परोक्षता उस दुनिया के विरुद्ध है जिसकी अध्यात्मिक सुगंध धर्म है। निश्चित ही धर्म का एक भौतिक पक्ष है और एक अध्यात्मिक, एक सैद्धांतिक और एक व्यवहारिक। एक सारभौमिक और एक स्थानीय, एक शाश्वत और एक परिवर्तनशील। एक शोषक और एक पोषक, अंततः एक सकारात्मक और एक नकरात्मक।
सभी धर्मो में एक निर्माता, पोषक और विध्वंसक की धारणा है। एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञता और सर्वव्यापी ईश्वर को धर्म का आधार माना ही जाता है। यह अलग बात है कि ईश्वर को सभी धर्मो में अपने-अपने ढंग से रचा और संजोया गया है। बौद्ध धर्म की एक शाखा में बुद्ध की मूर्तियां
-भगवान स्वरूप कटियार
अगर हम दुनिया को इस तरह समझें कि पूरी दुनिया एक बड़ी चादर के नीचे रहती है, जिसकी खींचतान के कारण उसके फटने से हर किसी को बगैर छत के होने का खतरा है। प्रकृत्ति के यही सारे संसाधन पूरी दुनिया के लोगों को एक होकर रहना सिखाते हैं और इसकी चेतावनी भी देते हैं कि जब भी हम प्रकृत्ति के साथ अपने निजी स्वार्थो को लेकर खिलवाड़ करेंगे तो हम सब नुकसान उठायेंगे। आज जलवायु और पर्यावरण संतुलन को लेकर जो पूरी दुनिया में कोहराम मचा है उसका मुख्य कारण यह है कि दुनिया के शक्तिशाली विकसित देश अपनी टेक्नोलोजी और उस टेक्नोलोजी के जरिए उत्सर्जित होने वाले कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों पर स्वयं नियंत्रण लगाने के बजाय भारत, चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं कि जनसंख्या में बड़े होने के नाते यही देश जलवायु और पर्यावरण बिगाड़ने में सबसे अधिक जिम्मेदार हैं और इसलिए इन देशों को ही गैसों और कार्बन के उत्सर्जनोे पर रोक लगानी चाहिए। जलवायु के बारे में अमेरिका का इरादा अच्छा नही है। उसने कह दिया है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय दायित्यों का निर्वाह करेगा, पर घरेलू कानून का रास्ता ही अपनायेगा। इससे साफ जाहिर है कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति उर्जा उपभोग का जो कानून है, उसमे वह किसी भी तरह की ढील देने को तैयार नही है। दुनिया की आबादी के पांच फीसदी लोग अमेरिका में रहते हैं, किन्तु अमेरिका वैश्विक हिस्से का 16 फीसदी कार्बन और गैसों का उत्सर्जन करता है, और वहां जितनी कटौती की बात की जा रही है वह नगण्य है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका अकेले ही वैश्विक उत्सर्जन के लिए 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार है और इसके बाद भी अमेरिका यदि यह सोचता है कि वह दुनिया के गरीबों पर जलवायु परिवर्तन के असर के बारे में सोच रहा है तो यह हास्यास्पद है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका अपने उत्सर्जन में जिस छोटी सी 17 प्रतिशत कटौती की बात कर रहा है, उसमें वह उत्सर्जन भी शामिल है जो विकासशील देशों से खरीदा जा रहा है। इसका लब्बोलुवाब यह है कि अमेरिका 2017 तक उत्सर्जन बढ़ाता रहेगा, जो एक निन्दनीय कदम है। इतनी भी कटौती अमेरिका तब करेगा जब चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे प्रदूषणकारी देश दुनिया के इस दरोगा को रियायत देने की इस योजना में इसका साथ देंगे। इसके अलावा सन् 2012 के बाद जलवायु व्यवस्था की कानूनी संरचना के लिए एक आस्ट्रेलियाई प्रस्ताव भी है। आस्ट्रेलिया एक ऐसा देश है जिसका कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन 1990 के बाद 40 प्रतिशत बढ़ा है। आस्ट्रेलिया- अमेरिका के साथ गठजोड़ का एक वफादार सैनिक है। इसलिए उसका कहना है कि सभी पक्षों को एकजुट करने वाले दायित्यों के आधार पर दुनिया को कोई समझौता करना चाहिए। आस्ट्रेलिया का यह प्रस्ताव एक तीर से दो शिकार करने वाला है। एक तरफ यह प्रस्ताव उसे क्योटा संधि से छुटकारा दिला देता है, जो पूरी दुनिया और अन्य देशों के बीच बेचैन करने वाला विभाजन पैदा करती है। क्योटा सन्धि के अनुसार औद्योगिक देश जो ऐतिहासिक और सामयिक तौर पर प्रदूषण का भारी उत्सर्जन करते हैं उन्हें पहले कार्यवाही करनी चाहिए। यह प्रस्ताव अमेरिका को भी साथ लेकर चलता है। ऐसे माहौल में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा कोपेनहेगन पहुंचकर जलवायु रक्षा के नायक बन सकते हैं। इसके लिए जी-77 को विभाजित कर एक और बड़े असहमत देश को साथ लाना है। जाहिर सी बात है वह देश भारत है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया हमारे भय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की पूरी ताकत लगा रहा है। यह भय अमीर देशों के बीच अलग-थलग पड़ने और हिकारत की नजर से देखने का है। एक ऐसी छवि बनायी जा रही है जैसे भारत जलवायु विरोधी हो, अथवा ऐसा समझा रहा है जैसे भारत जलवायु की सही व्याख्या ही न समझ पा रहा हो और इसीलिए शायद भारत हर बात पर न करता रहता है और समझौतों को होने से टालता रहता है।
भारत की आर्थिक गतिविधियों से कार्बन डाइआक्साइड और मीथेन जैसी गैसें सबसे अधिक मात्रा में उत्सर्जित होती हैं। यह गतिविधियां क्या हैं? कोयला और लकड़ी जलाना सबसे बड़ी गतिविधि है। कोयला हमारे औद्योगीकरण का मुख्य साधन ही नही, बल्कि हमारे बहुत से बिजली कारखानों का भी मुख्य चालक है। हमारे गांव में अब भी बिजली के अभाव में लकड़ी और घासफूस आदि ही उर्जा का òोत है। हमारी कुछ फसलों जैसे: धान से भी मीथेन हवा में चला जाता है। फिर हमारे जंगल लगातार कट रहे हैं और हमारे देश में वनों का आच्छादन पांच प्रतिशत से भी कम हो गया है। जंगल इन गैसों को सोखते हैं। इसलिए अमेरिका का आरोप है कि भारत और चीन सबसे अधिक पर्यावरण को बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। पलटकर देखें तो कहानी कुछ और है। भारत की आबादी अमेरिका से पांच गुने अधिक है, पर अमेरिका का क्षेत्रफल भारत से काफी अधिक है। हम जितनी कार्बन गैसें वातावरण में फेंकते हैं, उनका प्रति व्यक्ति अनुपात अमेरिका के प्रति व्यक्ति अनुपात का 20वां भाग है। अर्थात वातावरण को एक अमेरिकी एक भारतीय से बीस गुना अधिक प्रदूषित करता है। यही बात चीन पर भी लागू होती है। अमेरिका के मुकाबले पर्यावरण को प्रदूषित करने में चीन की भी जिम्मेदारी बहुत कम है। इस विसंगति का कारण अमेरिकी जीवन शैली है। उस जीवन शैली को बनाये रखने के लिए जो औद्येागिक और उर्जा तंत्र अमेरिका ने अपना रखा है उसमें गैसों का वायुमण्डल में फैलना आवश्यक है।
एक अमेरिकी एक भारतीय की तुलना में कई गुना बिजली खर्च करता है। भारत में तो अभी भी करोड़ों लोगों को बिजली का सुख नसीब ही नही है। अपनी जीवनशैली बदलने के लिए पश्चिमी दुनिया के विकसित देश तैयार नही हैं। वे कहते हैं कि इस पर कोई सौदा नही होगा। अब अमेरिका ने घोषणा की है कि वह सन् 2020 तक 17 प्रतिशत कटौती प्रदूषण उत्सर्जन में करेगा। इसमे भी पेंच है कि अमेरिका अपनी उर्जा की खपत में मामूली सी कटौती करेगा। लेकिन असल में वह कोयला और तेल आधारित उद्योगों में परमाणु उर्जा का इस्तेमाल बढ़ायेगा। इसके साथ ही वह रेफ्रिजेशन में नई टेक्नोलोजी का समावेश करेगा। सवाल यह है कि भारत यह सब क्यों नही कर सकता है? अगर हमें यही रास्ता अपनाना पड़े तो हमें कोयले और तेल आधारित गतिविधियेां को बदलने में खरबों डालर की लागत आयेगी। आखिर यह धन कहां से आये। इसीलिए भारत और अन्य विकासशील देश अमेरिका जैसे विकसित देशों से कह रहे हैं कि पश्चिम के देश हमें अपनी टेक्नोलोजी परिवर्तन के लिए आर्थिक सहायता करें या मुवावजा दें। वरना हमारा हò यह होगा कि हम महत्वपूर्ण विकास कार्यो को ठप कर चुपचाप बैठ जायें। कोपेनहेगेन सम्मेलन का मामला बस इतना ही है। यह सीधे-सीधे वर्चस्वशाली देश और विकासशील देशों के बीच एक वर्चस्व की मुठभेड़ है। एक सवाल और भी है कि यदि टेक्नोलोजी बदलने के लए पश्चिम के देश आश्वासन भी दे दें तो आर्थिक मदद देने के बाद भी टेक्नोलोजी कहां से आयेगी। मतलब साफ है कि उन्हीं पश्चिमी देशों से जहां से हमेशा विषाक्त करने वाली टेक्नोलोजी आती रही है।
यदि उसी आधुनिक और मंहगी टेक्नोलोजी का इस्तेमाल भारत भी करता है तो इस पर एक हजार खरब से अधिक का कारोबार होगा । अमेरिका से प्रस्तावित 10 अरब तथा यूरोपीय देशों से प्रस्तावित 100 अरब डालर की सहायता अगर मिल भी गयी तो उससे कई गुना पैसा पश्चिमी देशों के व्यापारियों की जेब में जायेगा, जो टेक्नोलोजी बेचते हैं। इसीलिए कोपेनहेगन में पश्चिमी देशें के व्यापारियों का जमावड़ा लगा हुआ है। कोपेनहेगन में आजकल वैसा ही माहौल है जैसे ओलम्पिक खेलों के दिनों में किसी महानगर में होता है। विश्व मीडिया, स्वयंसेवी संगठन, टेक्नोलोजी के खरीद-फरोख्त व्यापारी तथा तमाम देशों के प्रतिनिधि मण्डल कोपनेहेगन में जलवायु कान्फ्रेन्स को गरमाहट पहुंचा रहे हैं। पर्यावरण को बचाने और पृथ्वी के संरक्षण में सारी दुनिया का एक जैसा योगदान होना अपेक्षित है। यदि कोई देश यह कहे कि हमारा इससे कोई सरोकार नही है तो वह सम्पूर्ण मानव जीवन के प्रति अन्याय कर रहा है। भारत का कहना है कि सन् 2020 तक वह गैसों और कार्बन के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी लायेगा। पश्चिमी देश यदि चाहेंगे कि भारत के इस वादे को कानूनी जामा पहनाया जाये ताकि उस पर अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी रखी जा सके। चीन भी गैसों के उत्सर्जन को रोकने में लगातार प्रयास कर रहा है और उसने इसी उत्साह में अगले दस साल में 40 प्रतिशत उत्सर्जन की कटौती की घोषणा भी कर डाली है। भारत चाहता था कि चीन और भारत जनसंख्या की दृष्टि से जो दुनिया के दो बड़े देश हैं मिलकर गैसों और कार्बन के उत्सर्जन की कटौती की रणनीति तैयार कर संयुक्त घोषण करें। किन्तु चीन ने पहले घोषणा करके भारत को अकेला सोचने पर मजबूर कर दिया। कोपेनहेगन सम्मेलन में चीन का रुख क्या होगा, यह कहना आसान नही है। लेकिन भारत सहित सभी विकासशील देश यही चाहेंगे कि पश्चिमी देशों को यह अधिकार न मिले कि वे उनके विकास कार्यक्रमों की निगरानी रखें।
क्योटा समझौते के अनुसार गैसों और कार्बन के उत्सर्जन में अधिकांश कटौती पश्चिमी देशों को ही करने का प्राविधान था और यही वजह है कि अमेरिका सहित समस्त विकसित पश्चिमी देश क्योटा समझौते का विरोध कर रहे हैं। विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन नगण्य है, और वह भी उनकी आर्थिक स्थिति के कारण आधुनिक टेक्नोलोजी के अभाव में करना पड़ रहा है। जबकि पश्चिमी देश अपनी विलासितापूर्ण जिन्दगी जीने के लिए जिस मंहगी और आधुनिक टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, वही दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार है। इस सबके बावजूद भारत जैसे विकासशील देश अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों से मुकर नही सकते। ऐसा तो नही हो सकता कि सब कुछ दूसरे करें और फल हम खायें। इसलिए भारत जैसे देश को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा, क्योंकि समस्याएं हमारे यहां भी विकट हैं। शायद उन देशों से भी अधिक जहां तटवर्ती होने के कारण बढ़ते समुद्र तल से देशों को डूबने का खतरा है, वहीं भारत में सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों के कारण भारत के लिए जीवन-मरण का प्रश्न पैदा हो जायेगा। इसीलिए अमेरिकी मौसम परिवर्तन कार्यक्रम के अध्यक्ष भारतीय मूल के वीरभद्रन रामनाथन ने भारत को सलाह दी है कि भारत को जलवायु समस्या के हल के लिए एक महत्वपूर्ण कारक की भूमिका के लिए आगे आना चाहिए। इसी में उसकी भलाई है। अब देखना यह है कि दुनिया के तमाम देश मिलजुलकर बिगड़ते पर्यावरण और जलवायु संतुलन जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए कौन सी रणनीति अपनाते हैं? कोपेनहेगन, क्योटा समझौते से आगे निकलता है, यह सवाल भी अपनी जगह है?

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आदमी होने व्याकरण

जिंदगी जब जान जाती है तर्क करना
और समझ लेती है
आदमी होने का व्याकरण
तब इतिहास और राजनीत के पेचीदा
सवालो के जबाब मिलने लगते हैं खुद बा खुद
और जानने लगते हैं शहीदों कि शहादत का सही मतलब
वे जो ठहाका लगाकर हंस रहे हैं शायद उन तक खौफनाक हादसों की खबरें नहीं पहुची हैं
और

वो
जो बंद कमरों में चैन की नीद सो रहे हैं उन्हें भी नहीं पता है कि कल एक विस्फोट से उनकी दुनिया उजड़ जाये गी

Friday 19 November 2010

मेरी कवितायेँ


लिखे जाने से भले ही
कुछ फर्क न पड़ता हो
लेकिन न लिखे जाने से
सचमुच बहुत फर्क पड़ता है...