Wednesday, 24 November, 2010

जीवन का सौंदर्य


जीवन का सौंदर्य मौलिक सर्जन कि इंसानी सामर्थ्य में है |
मानव जति अब सर्जन नहीं करती वह पुनरुत्पादन करती है
विचारो का ,विज्ञानं का,वस्तुओं का |
यह पुनरुत्पादन नए रूप लेकर आता है पर इसमे सृजन का सौरभ गायब है
नूतनता है पर नवोन्मेष नहीं है |
आप आकाश से वंचित है ,नदियों का प्रवाह और फूलो का रंग
आप के जीवन से परे की प्रकृति है
हम प्रकृति से ,प्रेरणा से रहित है |

No comments:

Post a Comment