Thursday 25 November 2010

इतिहास से सबक

इतिहास सेसबक
- भगवान स्वरूप कटियार

इतिहास ने इन्सान को गढ़ा और इन्सान ने इतिहास का निर्माण किया। इतहास सिर्फ तारीखांें का सिलसिला ही नहीं है बल्कि हमारे वजूद की हर कड़ी इतिहास से जुड़ी है। मनुष्य की सभ्यता, संस्कृति, इतिहास कुछ भी उसके पर्यावरण और परिवेश के साथ बिना जोड़े सही ढंग से अपनी समग्रता में भला कैसे समझा जा सकता है। सवाल उठता है कि आखिर धरती, जल, अग्नि, आकाश पर हवा का इतिहास से क्या लेना। पता नहीं किसने और कब हमारे भारत को आध्यात्मिक कहना शुरू कर दिया और मजे की बात यह है कि सारी भौतिक सुख-सुविधायें भोगते हुये हम आध्यात्मिक होेने के गौरव को भी ओढ़े हुये हैं। वेद भौतक शक्तियों की रचना और उपासना ही तो हैं। हमारे सारे शास्त्र महाभारत, रामायण और वेद भौतिकता से भरे पड़े हैं। जब प्रयोगशालायें नहीं थीं, तब चीर-फाड़, मन-मस्तिष्क में ही होता था और तभी हमारे मनीशियों ने देख समझ कर और अर्न्तभाव से जान लिया था कि यह शरीर भौतिक तत्वों से ही बना है। मनुष्य का जीवन इन्हीं तत्वों से बना और इन्हीं से संचालित होता है। अब तो विज्ञान ने भी प्रमाणित कर दिया है कि जीवन का सारा खेल रसायन का है। हमारी हर गतिविधि यहाँ तक की सोंचना, प्यार या घृणा करना तक रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम होता है। अमीबा से आदमी और फिर चिन्तनशील सांस्कृतिक प्राणी बनने की यात्रा बहुत दिलचस्प है। वह प्रक्रिया आज भी जारी है और विकास यात्रा रूकी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम यह समझें कि आदमी के जीवन और उसके भौतिक आधारों के बीच क्रिया-प्रक्रिया से इतिहास कैसे आगे बढ़ा। आदमी के लिये अग्नि की उपयोगिता और विध्वांसिकता और आकाश की विराटता समझना आसान रहा होगा और इसीलिये उन्हें देवता बनाने मंे उन्होंने देर नहीं की। आग ने तो मनुष्य को हिंसक जानवरों से सुरक्षा भोजन और पर्की इंटों तथा बर्तनों के माध्यम से बेहतर जीवन दिया। आग को घर-परिवार का अंग बना लिया गया। और यही वजह थीं कि आग को हर व्यक्ति घर में सुरक्षित रखता था। आज भी कई आदिवासी परिवारों में यह प्रथा जारी है। सभी धर्मों में अग्नि को वाहक और सहारा की तरह स्थापना मिली। दुनिया में एक धर्म (हिन्दू) तो मुख्यतः अग्नि पूजक ही है। ऋग्वेद में अग्नि के रोमांचकारी रूप का काव्यात्मक वर्णन है- जैसे ‘धर्नुधर का बाण अथवा सेना का आगे बढ़ते जाना कर देता है भयभीत वैसे ही तू दौड़ती है गतिशील होकर नित्य नये रूपों को धारण करती हुई खेतों और जंगलों में’।
पर धीरे-धीरे अग्नि का स्वेच्छाचारी इस्तेमाल हुआ। अग्नि के विध्वंसक रूप को प्रमुखता देने के लिये ही बारूद का इस्तेमाल शुरू हुआ और इस प्रकार अग्नि रक्षक से भक्षक बन गयी। और इतिहास साक्षी है कि यह सब सत्ता के लोलुपता के कारण हुआ। गगन एक अज्ञेय विराट था। आकाश में ही सूरज चाँद उगते डूबते थे। बादल गिरते गरजते बरसते थे और आँधियाँ चलती थीं। आकाश का निरीक्षण करते हुये मनुष्य ने ज्योतिष का विकास कर लिया। मनुष्य ने आकाश को ही पुण्य आत्माओं और देवताओं का निवास मान लिया। आकाश में सिर्फ आत्मा ही नहीं परमात्मा भी रहता था। फिर आकाश को मुट्ठी में करने के लिये वायुयान बने और वहाँ भी विध्वंस लीला शुरू हुयी और स्टारवार्स तक की बात सोंच ली गयी। आज अंतरिक्ष में इतनी आवाजाही है कि एक ओर मनुष्य का ब्रह्माण्ड विषयक ज्ञान बढ़ता जा रहा है और दूसरी ओर आकाश भी प्रदूषित हो रहा है। सवाल उठता है कि इतिहास ऐसे प्रगति करार दे या अवसान? क्योंकि यह प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन परत में छेद के नाते आत्मघात की ओर संकेत कर रहा है। अब थोड़े विस्तार में धरती, हवा और पानी को इतिहास में देखा गया है। मनुष्य ने स्त्री को, प्रकृति को और नदी को माँ कहा और सबसे पहले उसने धरती को माँ कहा, धरती ने ही तो उसे जन्म दिया था। उसी में उगती थीं नदियाँ, वनस्पतियाँ, अनाज, फूल-फल और वह सब जो प्राणियों का पोषण करता था, जीवन को बनाये और बचाये रखता था। उसी धरती पर जंगल थे जिन्हें काट-काट कर मनुष्य ने बस्तियाँ बसाईं। अर्जुन द्वारा खांडव वन जलाकर राजधानी के लिये भूमि तैयार करना यथार्थ का मिथकीय रूप ही तो है। धरती, खेत, बस्तियाँ साथ में बनती गयीं पर चलो इससे कोई फर्क नहीं था। फिर आदमी धरती को अन्दर तक खोदने लगा। ताँबा, लोहा, कोयला, चाँदी, सोना खोदते-खोदते वह बॉक्साइट, यूरेनियम और थोरियम तक पहुँच गया। इन धातुओं का बहुविधि उपयोग करने लगा। धरती खोदकर परमाणु बम बनाने के लिये खनिज निकाले और फिर बम बनाकर धरती के नीचे ही परीक्षण करने लगा। अपने घर, अपने खेत, अपने गाँव के लिये धरती पर्याप्त थी फिर अपने कबीले अपने राज्य के लिये धरती कम पड़ने लगी। फिर दूसरों की धरती हड़पन के लालच ने जोर मारा तो उपनिवेश वाद तथा साम्राज्यवाद जैसे धरती विरोधी हथकंडे अपनाये गये।
जब लालच ही नीति बन गयी- व्यक्ति लालची हो गया, राज्य लालची हो गया तो धरती को बेहाल होना ही था जैसा कि मनुष्य का स्वभाव है कि जो बात समझ में नहीं आती या जानबूझ कर टालनी होती है तो सम्मेलन बुला लेता है या कमेटी बना लेता है। रियो डि जेनेरियो, टोकियो तथा कोपेनहेगेन में दुनिया के देश सम्मेलन करते रहे और चिल्लाते रहे कि धरती खतरे में है। पर सवाल तो धरती से सम्बन्ध सुधारने का है, तथा इतिहास से सबक लेने का है। देश-देश रटने और चिल्लाने से समस्यायें बढ़ती ही गयीं। सारी धरती, सारी प्रकृति, सारा प्राणी जगत और प्राणियों को एक माने बिना अब इतिहास आगे नहीं जा सकेगा। आदमी को आक्सीजन का पता तो बहुत बाद में चला पर हवा चलती दौड़ती और तूफान मचाती दिखायी दी और फिर अपने अन्दर भी आते-जाते दिखने लगी। साँस चलने से जीवन के सम्बन्ध का एहसास तो होने लगा था और इसीलिये एक ओर वायु को देवता और मिथकों में पवनपुत्र को सर्वशक्तिमान और कृपालु बना डाला तो दूसरी ओर श्वास को साधते हुये योग प्राणायाम तक पहुँच गया जिसकी आज वैज्ञानिक पुष्टि तक होती जा रही है। विज्ञान का युग शुरू हुआ तो पता चला कि वायु भी कई तत्वों का मिश्रण है। उसमें सभी के जीवन का आधार कार्बन भी है और आक्सीजन भी है। प्रकृति का क्या जादुई संतुलन है- एक ओर वनस्पितियाँ कार्बन डाई आक्साइड सोंख कर आक्सीजन छोड़ती हैं और मानव जाति आक्सीजन सोंखकर कार्बन डाई आक्साइड छोड़ती हैं। बाद में यह भी पता चला है कि आक्सीजन के बगैर आग नहीं जलती। फिर लालची मनुष्य ने कार्बन और आक्सीजन दोनों का व्यापार करना शुरू किया। सृजनात्मक हुआ तो आक्सीजन के सिलेण्डर बना लिया और विध्वंसक हुआ तो तरह-तरह के जहरीली गैस बनाने लगा। युद्ध में तरह-तरह की गैस का इस्तेमाल होने लगा। हवा सबसे बड़ी वाहक है जीवन और मरण दोनों की। सामान्य औद्योगिक प्रक्रिया में भी तरह-तरह की मारक गैसें निकलने लगी और पर्यावरण प्रदूषित होता गया। मानव इतिहास रचा ही गया बहते जल यानि नदियों के किनारे। भूख से ज्यादा प्यास ने आदमी को गढ़ा है। भूख भी तृप्ति भी जल के संयोग से ही होती है। तभी तो ‘जल ही जीवन है’ तक पहुँच गया था आदमी। जब आदमी ने सोंचना शुरू किया तोजल की सबसे अधिक उपमा रूपक मुहावरे बनकर मन-मस्तिष्क में प्रवाहित होता रहा। मनुष्य ‘बिन पानी सब सून’ के नतीजे तक पहुँच गया। जीवन में प्रवाह और उसकी शुद्धता जल पर निर्भर होने लगी। जहाँ जल को शुद्धता से जोड़ा गया। वहीं जल-जल में फर्क होने लगा। ठाकुर का कुआँ अलग हो गया। अम्बेदकर को महाड़ में जल के लिये आन्दोलन करना पड़ा क्योंकि वहाँ जल सबके लिये उपलब्ध नहीं था। जल ही शुद्धकर्ता था पर जल को ही अशुद्ध किया जाने लगा और उसे अपेय बना दिया गया। सारी दुनिया ही नहीं मनुष्य के शरीर तक में अधिकांश जल ही तो है। पर धीरे-धीरे धरती के ऊपर और धरती के नीचे आदमी की आँखों में जल इतना कम होता गया कि उसकी पर्याप्ता संकट में पड़ गयी। गर्मी आई नहीं कि शहरों में सबके लिये पानी का संकट खड़ा हो गया। यहाँ तक कहा जाने लगा कि तीसरा विश्वयुद्ध जल के लिये ही हो सकता है। आज नदियाँ बेची जा रही हैं। समर्थ लोग बोतल का पानी पी रहे हैं। और असमर्थ लोग राजधानी में भी जहरीली हो चुकी जमुना को चूस रहे हैं। भौतिक से सांस्कृतिक तक की यात्रा की कथा ही इतिहास है। उसमें खुदी को बुलन्द करने के किस्से हैं। तो सर्वनाश की ओर बढ़ते कदमों के निशान भी।
यह सब मनुष्य के अहंकार और लालच का फल है कि सम्पूर्ण धरती और सम्पूर्ण सृष्टि विनाश की कगार पर खड़ी है। मनुष्य यह भूल जाता है कि वह कितनी भी ताकत हासिल कर ले पर पकृति से ताकतवर नहीं हो सकता क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि और मनुष्य स्वयं भी प्रकृति की ही उत्पत्ति है। अहंकार और महत्वकांक्षा को नष्ट करने के उपदेश शास्त्रों और पुराणों में बराबर दिये गये। पर न तो अहंकार नष्ट हुआ और न ही मनुष्य के लालच और महत्वकांक्षी होने की प्रवृत्ति को ही खत्म किया जा सका। सच्चाई यह है कि मनुष्य की कोई भी प्रवृत्ति उपदेश या शिक्षा से नष्ट नहीं की जा सकतीं उन्हें कुछ समय के लिये सुसुप्त तो किया जा सकता हैं पर अनुकूल परिस्थितियों में वह पुनः प्रकट हो जायेंगी। दरअसल अहंकार और महत्वकांक्षा को जीतने की भावना भी एक तरह का अहंकार और महत्वकांक्षा ही है। मनुष्य अपनी समस्त वृत्तियों के साथ ही मनुष्य है और यही उसकी शक्ति भी है। अगर यह वृत्तियां न होती तो सभ्यता और संस्कृति की महानतम उपलब्धियाँ तो दूर मानव जाति का अस्तित्व भी खत्म हो गया होता। सवाल अहंकार और महत्वकांक्षा को जीतने का नहीं है और न ही उन्हें नष्ट करने का बल्कि उनके उद्ातीकरण का है। यही वजह है कि धर्म और संत विफल हो जाते हैं, इसलिये नहीं कि मनुष्य गलत है बल्कि उनकी मनुष्य के प्रति समझ गलत है। उदाहरण के लिये मैं सारी पृथ्वी को नाप लूँ ताकि यह पृथ्वी मेरी हो जाये। यह एक महत्वकांक्षा है। दूसरी महत्वकांक्षा यह भी हो सकती है कि पूरी दुनिया में प्रेम और बन्धुत्व फैलाया जाय ताकि युद्ध की कल्पना ही खत्म हो जाये। द्वितीय विश्वयुद्ध में कुछ देशों को नष्ट करने की महत्वकांक्षा मानव विरोधी है तो दूसरी ओर युद्ध को समाप्त कर दुनिया में शांति फैलाने की महत्वकांक्षा मानव हित मंे है। महत्वकांक्षा के बल पर ही लोग एवरेस्ट पर जाते हैं, मदर टेरेसा गरीबों की सेवा के लिये दुनिया मंे एक मिथक बन जाते हैं। यदि महत्वकांक्षाओं के पक्ष सकारात्मक हैं और इन सकारात्मक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिये हम अहंकारी भी हो जायंे तो उससे दुनिया की शक्ल बदल सकती है। जैसे- दुनिया के तमाम देश यह तय कर लें कि हम भले ही मिट जायें किन्तु दुनिया के किसी कोने में भूख और आतंकवाद को नहीं पनपते देंगे। तो परिवर्तन की एक अच्छी शुरूआत हो सकती है। अगर मुट्ठी भर सिरफिरे आतंकवादी दुनिया को डरा सकते हैं तो दुनिया के परस्पर प्रेम करने वाले लोग और देश मिलकर इन मुट्ठीभर आतंकवादियों को मिटा भी सकते हैं। बस जरूरत इस बात की है कि महत्वकांक्षाओं और अहंकार का रूप सकारात्मक हो।

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