Wednesday 25 May 2011

भगवान स्वरूप कटियार
औद्योगिक पूंजीवाद के उदयही के साथ अपराध की मानसिकता ने नये आयाम ग्रहण किये और लोगों के जीवन मूल्यों और द्दश्टिकोण में भारी बदलाव ला दिया .येनकेन प्रकारेण पैसा बटोरना लोगों का मुख्य लक्ष्य बन गया और पैसा षक्ति,प्रतिश्ठ और सामाजिक स्थिति का मापदण्ड बन गया जिसके कारण घोटाले आम हो गये.कार्पोरेट जगत की अबारा पूंजी ने हमारी अर्थ व्यवस्था को कितना दयनीय और कमजोर किया है इसका अन्दाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार ने कार्पोरेट जगत के आयकर का ३,७४,९३७ करोड़ रुपया वित्तीय वर्श २॰॰५-२॰॰६ से २॰१॰-२॰११ के लिए माफ कर दिया .यह धनराषि २जी स्पेक्ट्रम घोटाले से दोगुनी से भी अधिक है. ऐसी सरकारों से कले धन की वापसी और भ्रश्टाचार को समाप्त करने की उम्मीद कैसे कर सकते है जो कर्पोर्ेट घरानों को बेतहासा लूट की छूट दे रहीं हैं. आयकर माफी की इस धनराषि में लगातार वृध्दि होती गयी.२॰॰५-२॰॰६ में ३४,६१८ करोड़ का आयकर माफ किया गया था जो २॰११-२॰१२ के बजट में ८८,२६३ करोड़ पहुंच गया यानि कि १५५ फीसदी की बढ़त . इस प्रकार देष रोज २४॰ करोड़ रुपये का आयकर कार्पोरेट जगत का माफ कर रहा है .देष का मध्य वर्ग और किसान महगाई की मार से जूझ् रहा है और कार्पोरेट जगत मलाई खा रहा है. “ग्लोबल फाइनेंसियल इन्टिग्रिटी“ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग इतनी ही धनराषि रोज काले धन के रूप में देष से बाहर भी जा रही है. बिडम्बना तो यह है कि ८८,२६३ करोड़ का आयकर कार्पोरेट जगत का माफ कर दिया और दूसरी ओर करोड़ों रुपये की कटौती कृशी बजट में कर दी.इस प्रकार देष के लोगों का गला घोंट कर कार्पोरेट जगत को पाला पोशा जा रहा है जबकि इनसे देष का कुछ भी भला होने वाला नहीं है क्योंकि व्यापारी और पूंजीपति का कोई देष नहीं होता़ .
अगर हम कार्पोरेट कर्ज माफी,सीमा षुल्क और उत्पाद षुल्कों में दी गयी राहत ( इसका सबसे ज्यादा लाभ समाज के धनी तबके और कार्पोरेट जगत को मिलता है) से होने वाले आय में नुक्सान को जोड़ दें तो चौकाने वाले आकड़े सामने आते हैं . “सोने और हीरों“ पर सीमा षुल्क की छूट दी गयी ,ये आम आदमी के उपयोग की चीजें तो नहीं हैं पर इन पर दी गयी छूट से देष को ४८,७९८ करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ़.यह राषि सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर खर्च की गयी धन राषि की आधी है.इसके पहले तीन सालों में सोने,हीरे और आभूशणों पर सीमा षुल्क पर दी गयी छूट से देष को ९५,६७५ करोड़ का नुक्साान हुआ था. इस छूट का भोड़ा तर्क यह है कि हीरे और सोने में छूट भुमण्डलीकरण के दौर में गरीब कामगारों को नौकरी बचाने के लिए दी गयी है. पर इससे एक भी नौकरी नहीं बची . आभूशण उद्योग में लगे सूरत (गुजरात ) के तमाम कारीगर अपनी नौकरी गवां कर अपने वतन लौट गये और कुछ ने निराषा और हताषा में डूब कर जान दे दी . इसी प्रकार महाराश्ट्र में भी इसी उद्योग में वर्श २॰॰८ में औसतन प्रतिद्न १,८॰॰ कामगारों ने नौकरियां गमायीं. आखिर सरकार का खजाना भी लुटा और लोगों के जान पर भी बन आयी. कार्पोरेट जगत द्वारा सरकारी धन की यह लूट और बढ़ती बेतहासा बेरोजगारी देष को जिस दिषा की ओर ले जा रही है वह न सिर्फ खतरनाक है बल्कि विस्फोटक भी . सरकार की इन्हीं घटिया नीतियों के कारण देष में अवैध धन और काली कमाई में भारी बढ़ोत्तरी हुई. अवैध कमाई से धन बाहर ले जाने में विदेषी मुद्रा भंडार घटता है और सरकार को करों से होने वाली कमाई कम होती है़ जिसके कारण विकास योजनाओं के लिए अपेक्षित धन नहीं मिल पाता और इससे देष का गरीब लगातार पिसता है.चौकाने वाला तथ्य यह है कि हमारे देष में जितना सकल घरेलू उत्पाद पैदा होता है उसका आधा अवैध धन काले धन के रूप में पैदा होता है. काली अर्थव्यवस्था में लगी २८ प्रतिषत परिसम्पत्तियां देष में और ७२ प्रतिषत विदेषों में हैं .जाहिर है लोग अवैध सम्पत्तियां विदेष् में रखना चाहते हैं जिससे कानून के षिकंजे से बचा जा सके .
बजट में मषीनरी मद में सीमा षुल्क में भारी छूट दी गयी है जिसमें बड़े कार्पोरेट अस्पतालों द्वारा आयात किये जाने वाले अति आधुनिक चिकित्सा उपकरण क्रय किये जाते हैं जिन पर लगभग कोई ड्यूटी नहीं लगती . अरबों रुपये के इस उद्योग में अन्य छूटों के अलावा यह लाभ लेने के पीछे दावा ३॰ प्रतिषत षैय्याएं गरीबों को मुफ्त उपलब्ध कराने का है पर ऐसा होता कभी नहीं है. हर लूट में पिसता गरीब ही है.इस तरह की छूट से सरकार को लगभग १,७४,४१८ करोड़ का चूना लगता है जबकि इसमें आायात-निर्यात ऋण के रूप में दिये जाने वाली राहतें षामिल नहीं है. उत्पाद षुल्क मेम छूट दिये जाने के पीछे तर्क दिये जाते हैं कि इससे उपभोक्तााओं को उत्पाद कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं पर ऐसा होता भी है इसका सबूत ना तो सरकार के पास है और ना ही उपभोक्ता के पास है.ऐसा ही दावा २जी स्पैक्ट्रम घोटाले में भी किया जाता है कि कोई लूट नहीं हुई बल्कि उससे उपभोक्ताओं को सस्ती काल दरें उपलब्ध करायी गयीं हैं लेकिन सच्चई यह है कि उत्पाद षुल्क की इस माफी का सीधा लाभ उद्योग और व्यापार जगत को हुआ.उत्पाद षुल्क की इस माफी के कारण सरकार को १,९८,२९१ करोड़ का नुक्सान हुआ है. इस तरह की सारी रियायतों से विभिन्न तरीकों से धनाढ्यवर्ग ही लाभान्वित होता है. आयकर,उत्पाद षुल्क,तथा सीमा षुल्क की माफी की चलते कुल मिला कर सरकार को कितना नुक्सान होता है?वर्श २॰॰५-६ में नुक्सान की यह राषि २,२९.१॰८ करोड़ रुपए थी जो २॰११-१२ के बजट में दोगुने से अधिक ४,६॰,९७२ करोड़ रुपये हो गयी .इस प्रकार वर्श २॰॰५-६ से२॰११-१२ तक इन रियायतों में सरकार को कुल २१,२५.॰२३ करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ ,यानी लगभग आधा ट्रिलियन अमेरिकी डालर है. यह रकम २जी घोटाले से १२ गुना से भी अधिक तथा विदेषों में जमा अवैध काले धन २१लाख करोड़ से भी अधिक है़ और यह लूट पिछले ६ वर्शों में हुई.
सरकारी खजाने को होने वाला आय का यह नुक्सान हर साल बढ़ता जा रहा है.एक तरफ सरकार के पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए पैसा नहीं हैं और सबसे बड़ी भूखी आबादी के लिए दी जाने वाली सब्सिडी की कटौती कर रही है. हमारे देष में लूट का यह तंत्र सुनियोजित ढंग से चल रहा है जिसे राजनीत- अफसरषाही-व्यवसाय- अपराधिक जगत का गठबंन्धन चला रहा है.यह गठबंन्धन अटूट और अत्यन्त प्रभावषाली है जिसे पार पाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है.हाल के घोटालों से यह उजागर हो गया है कि रिष्वत अब “ अण्डर दि टेबुल“ की घटना नहीं रही बल्कि लेन देन खुलेआम हो रहा है. प्रधान मंत्री के मानद सलाह्कार षिकागो विष्वविद्यालय के अर्थषस्त्री गोविन्द राजन ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि भारत में जनतंत्र नहीं बल्कि अल्पतंत्र है. उन्होंने स्पश्ट कहा देष के नेता अपराधिक ताकतों से सांठगंाठ कर देष को लूट रहे हैं. देष में घोटाले होते हैं,जांच आायोग और जांच समितियां रिपोर्टे देती हैं पर अपराधियों को सजाएं नहीं होती और होती भी हैं तो ना के बराबऱ् आरोपित नेता सत्तासुख निरन्तर भोगते रहते हैं. घोटालों और भ्रश्टाचार में लिप्त लोग धनाढ्य और पढे़ लिखे लोग ही होते हैं.श्रम की सत्ता को पीछे धकेल कर जब पूंजी की सत्ता अपना वर्चस्व कायम कारती है तो वह पूरी व्यवस्था को भ्रश्ट कर देती हैं और लोग भ्रश्टाचार समाप्त करने की बजाय उसमें अपनी हिस्सेदारी तलाषने लगते हैं. यह एक जटिल और कठिन लडा़ई है जो खुद अपने खिलाफ है षायद इसीलिए कठिन और जटिल है पर लड़नी तो है और लड़ी भी जारही है , अपने-अ्पने तरीके से पर जनता की सीधी भागीदारी के बिना इसे जीतना संभव नहीं है़.

Thursday 19 May 2011

जसम लखनऊ: जन चेतना का चितेरा : अशोक भौमिक

जसम लखनऊ: जन चेतना का चितेरा : अशोक भौमि


kau शल जी चित्तू प्रसाद पर भौमिक जी का लेख ब्लॉग पर पढ़वा कर
बड़ी कृपा की |
लेख बहुत अच्छा है | कृपया मुझे भी मेल कर दें |

Wednesday 18 May 2011

सिद्धान्तहीन राजनीत की अविश्वशानियता



भगवान स्वरूप कटियार
जनतंत्र को हमने सबसे आदर्श व्यवस्था के रूप में चुना और अपनाया था . जनतंत्र हर तरह की बराबरी का पर्याय है.पर हमने जब जनतंत्र को अपनाया तब ना तो देष में आर्थिक बराबरी थी और ना ही सामाजिक बराबरी और सिद्धान्तहीन राजनीत के ६२ सालों के सफर में आर्थिक-सामाजिक गैरबराबरी की यह खाई लगातार बढती गयी जिसके कारण दुनियां का सबसे बडा लोकतंत्र सबसे भ्रष्ट और दरिद्र लोकतंत्र में तब्दील हो गया .संविधान निर्माता डा॰ बी॰ आर॰ अम्बेडकर ने देश का संविधान सौपते वक्त देश में मौजूद इन अन्तरविरोधों को तत्काल समाप्त कर लेने की बात कही थी , वरना उनके खतरों के दुष्परिणाम विस्फोटक होंग और लोकतंत्र वस्ताविक लोकतंत्र के रूप में बच पयेगा ,इस पर उन्होंने आशंका व्यक्त की थी. आजादी का इतना लम्बा सफर तय करने के बाद भी सामन्ती अवशेष अभी भी मौजूद हैं और उसी का परिणाम है सिध्दान्तहीन, सामाजिक सरोकारों से वंचित राजनीत को एक उद्योग में तब्दील होना.कुछ अपवादों को छोड कर अधिकाँश दलों के पास ना तो लिखित सिध्दान्त हैं और ना ही देश के लिए लिखित कार्यक्रम .चुनाव के दौरान हर राजनैतिक दल अपना घोषणा पत्र बनाता है जिसमें अधिकाँश बातें एक जैसी होती हैं और देष के लिए दीर्घकालीन कार्यक्रम नदारद रह्ता है. फील गुड और इन्डिया शाइन की तरह लुभावने और छद्म आदर्शों के अतिरिक्त और कुछ नही होता.जबकि होना यह चाहिए हर राजनैतिक दल का सिध्दान्त और कार्यक्रम चुनाव आयोग में पंजीकृत हो और उनसे विचलन के विरुध्द चुनाव आयोग कार्यवाही करे.सिर्फ मतदान करना और सरकार बनाना ही लोकतंत्र नहीं है बल्कि देखना यह है कि लोग लोकतंत्र की अनुभूति कर रहे हैं तथा संस्थाओं और उनकी कार्य प्रणाली का जनतंत्रीकरण हो रहा है कि नहीं.भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमारी नींद तब खुली जब वह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन गया है.राजनीत का अपराधीकरण, सिध्दान्तहीन और धन -बल की ही राजनीत का दुष्परिणाम है. यह कैसी बिडम्बना है कि दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के राजनैतिक दलों में कुछ अपवादों को छोड कर आंतरिक लोकतंत्र सिरे से गायब है.सभी दल प्राईवेट लि॰ की तरह व्यवहार करते हैं.
इसी सिध्दान्तहीन और सामाजिक सरोकारों से वंचित राजनीत का परिणाम है कि हमारा देश मानव विकास सूचकांक के लिहाज से फिसड्डी देष है.भले ही हम अपने आप को उदीयमान एषियाई ताकत और सूचना प्रौद्योगिकी की महाशक्ति कहते हों.देश में असंतुलित विकास ,विधायक और सांसदनिधि का बढता दुर्पयोग और आये दिन अरबों-खरबों के घोटाले हमारे लोकतंत्र के विद्रूप चेहरे की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं.बेलगाम धनसंचय और बेहिसाब भोगविलास की रंगरेलियों में डूबे रहने वाला देश का छोटा सा धनाढ्य वर्ग फलफूल रहा है और दरिद्रता तथा गरीबी में डूबा मेहनतकषों का एक बडा हिस्सा जो सम्पदा पैदा करता है रात दिन पिस रहा है.यह निर्मम विरोधाभास एक बेहद असंतुलित विकास की रणनीति का परिणाम है.कृषि जो आज भी हमारे देश के एक बडे तबके की रोटीरोजी का जरिया है, पर उपेक्षा का षिकार है और किसान तबाही झेल रहे हैं.सेवा तथा भू-सम्पति व्यवसाय के क्षेत्र को प्राथमिकता में रखा जा रहा है और उनके लिए हमारे प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों को कार्पोरेट लूट के लिए लगातार खोला जा रहा है. अपनी बढती आर्थिक ताकत और यहां तक कि पूंजी के कुछ निर्यात के बाबजूद राजनीतक तौर पर षासक नौकरषाह तथा पूंजीपतिवर्ग अपने मूल दलाल चरित्र को बरकरार रखे हुए है. हमारी सिध्दान्तहीन राजनीत अपराधिक तत्वों अवैध धन और भ्रश्ट नौकरशाही का गठज बन गयी है.वित्तीय पूंजी की गहरी पैठ तथा उनकी विस्तृत आर्थिक ,राजनीतिक और सामाजिक कडियां ना सिर्फ देश के स्वतंत्र विकास को बाधित करती हैं बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता तथा हर पश्चिमी चीज के प्रति अंधी आसक्ति को जन्म देती है.
सिध्दान्तहीन राजनीत के चलते ना तो देष में कोई कारगर आर्थिक नीत बन पायी और ना ही स्थायी विकास की दिशा तय हो पायी.देश उदारीकरण के जाल में फंस कर कर्ज के भारी बोझ तले दबता चला गया.इसी उदारीकरण ने काले धन की सामान्तर अर्थव्यवस्था को खडा किया जिसके कारण राजनीत में काले धन ने अपनी घुसपैळ बनायी और हमारी नीतियां बहुराष्ट्रीय कंम्पनियों और कार्पोरेट घरानों द्वारा निर्धारित की जाने लगीं क्योंकि वे हमारी व्यवस्था के नियामक बन गये.राजनैतिकि दलों के नेता कहते हैं कि देश में गरीब, अमीर रहेंगे पर गरीब - अमीर का भेद्भाव नही रहेगा.जातिव्यवस्था रहेगी पर जातीय या जातिगत भेदभाव नहीं रहेगा.जिस देश में पढाई और इलाज के लिए दोहरी व्यवस्था हो या यों कहें सारी सुबिधाएं सिर्फं अमीरों के लिए ही हों वह लोकतंत्र गरीबों काA लोकतंत्र तो नहीं हो सकता है . साफ साफ दिखाई देता है कि यह लोकतंत्र नेताओं ,नौकरशाहों,ठेकेदारों और दलालों का गिरोह है जो लोकतंत्र के नाम पर देश को लूट रहा है और इसीलिए वे व्यवस्था में किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते.सिध्दान्त,मूल्यों और देष के प्रति प्रतिबध्द्ता के नाम् पर सब ने देष के साथ छ्ल किया है.हमें दुनियां की उभरती आर्थिक ताकत कहा जा रहा है जबकि विदेषी धन पर हमारी निर्भरता दिनोंदिन बढती जा रही है जो हमारी विपन्नता का सूचक है.जिस देष में अरब पतियों की संख्या बढ रही हो और संसद और विधान सभाओं में भी करोडपतियों की संख्या बढ रही हो जबकि देश विदेशी कर्ज में डूबा हो तो उसे हम कौन सा लोकतंत्र कहेंगे.सिध्दान्तहीन और मूल्यहीन राजनीत ने देश को दिशाहीन राह पर लाकर खडा कर दिया है.मौजूदा सरकार गरीबी उन्मूलन में असफल होने पर उसने गरीबी की परिभाषा ही बदल दी.योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय में गरीबी की जो कसौटी बताई है वह हैरतअंगेज है. आयोग के मुताबिक अगर शहरी क्षेत्र में कोई व्यक्ति महीने में ५७८ रुपये अर्थात २॰ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से एक पैसा भी ज्यादा खर्च करता है तो वह गरीब नहीं है.इस खर्च को बीस अलग अलग मदों में बांटा गया.मसलन साग-सब्जी के मद में खर्च की सीमा एक रुपये वाइस पैसे रोजाना है.इतने में दो जून तो क्या एक जून भी कोई व्यक्ति सब्जी की जुगाड नहीं कर सकता है और इसी तरह शहरी इलाके में मकान का किराये की सीमा औसतन ३१ रुपये प्रति माह रखी गयी .योजना आयोग का यह सोच और नजरिया गरीब और गरीबी के प्रति उनकी गम्भीरता समझने के लिये पर्याप्त है. ग्रामीण क्षेत्र का हाल इससे भी बुरा है.वहां उसी को गरीब आदमी माना गया है जिसका दैनिक खर्च १५ रुपये से ज्यादा ना हो. एक ओर हमारे योजनाकार और नीति निर्माता यह दावा करते हैं कि देष ऊंची विकास दर की बदौलत तेजी से तरक्की कर रहा है और दूसरी ओर सरकार लोगों की आर्थिक स्थिति के आकलन का ऐसा तरीका अपनाती है जिससे देश में गरीबी वास्तविकता से कम कर के दिखाई जा सके. अन्तरराश्ट्रीय मानदण्डों के मुताबिक रोजाना सवा डालर तक खर्च करने वाले को गरीब और इससे कम खर्च करने वाले को अति गरीब की श्रेणी में रखा गया. अगर इस पैमाने को भारत में लागू करें तो तस्वीर कैसी दिखाई देगी, अन्दाज लगाया जा सकता है. इस सच्चाई को छिपाने के पीछे दो कारण हैं , एक तो सरकार की गरीबी को कम करके दिखाने से प्रचलित नीतियों की सार्थकता साबित करने की मंशा पूरी होती है ,दूसरी सरकार सब्सडी का बोझ घटाना चाहती है जिसके लिये यही एक सुगम उपाय है.सरकार की मंषा है कि बी पी एल परिवाारों की संख्या सीमित रखी जाय ताकि सब्सिडी को खत्म किया जा सके.पर क्या आम लोगों की आर्थिक हालत को इस तरह छिपाया जा सकता है. बरसों से देश के विभिन्न राज्यों में किसानों की खुदकुशी की घटनायें बतला देतीं हैं कि किस तरह भारत निर्माण हो रहा है.खुद योजना आयोग ने अपने हलफनामें में कहा है कि देष में रोजाना करीब ढाई हजार बच्चे कुपोशण के कारण मरते हैं जबकि हजारों कुन्टल अनाज बदइंतजामी के कारण गोदामों में सड जाता है.देश की यह बदहाली सिध्दान्तहीन तथा सरोकारविहीन राजनीत का परिणाम है।इससे निजाद पाने का एक ही हाल है कि पूंजी की सत्ता समाप्त कर श्रम की सत्ता कायम हो और राजनीत निजी स्वार्थों की पूर्ति का जरिया ना बन कर जनता की समस्याओं के निदान का कारगर तंत्र बने जो सैध्दान्तिक राजनीत से ही संभव है.

Saturday 7 May 2011

पिता के पास लोरियां नहीं होती



भगवान स्वरूप कटियार
पिता,मोटे तने और गहरी जडों वाला
एक बृक्ष् होता है
एक विशाल बृक्ष
और मां होती है
उस बृक्ष की छाया
जिसके नीचे बच्चे
बनाते बिगाडते है
अपने घरौंदे .

पिता के पास
दो ऊंचे और मजबूत कंधे भी होते हैं
जिन पर चढ कर बच्चे
आसमान छूने के सपने देखते हैं.

पिता के पास एक चौडा और गहरा
सीना भी होता है
जिसमें जज्ब रखता है
वह अपने सारे दुख
चेहरे पर जाडे की धूप की तरह फैली
चिर मुस्कान के साथ .

पिता के दो मजबूत हांथ
छेनी और हथौडी की तरह
दिन -रात तरासते रहते हैं सपने
सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए.

इसके लिए वह अक्सर
वह अपनी जरूरतें
और यहां तक की अपने सपने भी
कर देता है मुल्तवी
और कई बार तो स्थगित भी.

पिता,भूत वर्तमान, और भविष्य
तीनों को एक साथ जीता है
भूत की स्मृतियां
वर्तमान का संघर्ष और बच्चों में भविश्य .



पिता की उंगली पकड कर
चलना सीखते बच्चे
एक दिन इतने बडे हो जाते हैं
कि भूल जाते हैं रिश्तों की संवेदना
और सडक , पुल और बीहड रास्तों में
उंगली पकड कर तय किया कळिन सफर .

बाहें डाल कर
बच्चे जब झूलते हैं
और भरते हैं किलकारियां
तब पूरी कायनात सिमट आती है उसकी बाहों में
इसी सुख पर पिता कुरबान करता है
अपनी पूरी जिन्दगी.

और इसी के लिए पिता
बहाता है पसीना ता जिन्दगी
ढोता है बोझा,खपता है फैक्ट्री में
पिसता है दफ्तर में
और बनता है बुनियाद का पत्थर
जिस पर तमीर होते हैं
बच्चों के सपने
पर फिर भी पिता के पास
बच्चों को बहलाने और सुलाने के लिए
लोरियां नहीं होती.

हम फौलाद के गीत गायें गे


(विनायक सेन के प्रति) भगवान स्वरूप कटियार
हम फौलाद के गीत गायेंगे
दुनियां फौलाद की बनी है
और हम फौलाद की संताने हैं.

जैसे लोग निहाई पर
पत्तर ढालते हैं
वैसे ही हम
हम नये दिन ढालेंगे
उनमें उल्लास हीरे की तरह जडा होगा.

पसीने से नहाये
हम पाताल में उतरेंगे
और धरती के गर्भ से
हम नया वैभव जीत लायेंगे.

हम पर्वत के शिखर पर चढ कर
सूरज के टुकडे बन जायेंगे
ऊशा की लाली से अपनी मांशपेशियों में
लाल रंग भरेंगे.

इंसानियत से सराबोर
हम शानदार जिन्दगी ढालेंगे
जहां भेदभाव के लिए नहीं होगी
कोई जगह.

हम अनेक हैं पर एक में
संगळित होंगे
फौलाद के उस गीत में
हम सब की आवाज होगी
हम फौलाद के बने हैं
इसिलए फौलाद के गीत गायेंगे.

विश्व शान्ति बनाम हथियारों का कारोबार



भगवान स्वरूप कटियार
दुनिया की सबसे बडी ताकत अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को गत वर्श विष्व शांति के नोबेल पुरस्कार से नबाजा गया.यह बार बार सिध्द हो रहा है कि व्यक्ति, कुर्सी का चरित्र और चेहरा नहीं बदल बाता पर कुर्सी व्यक्ति का चेहरा बदल देती है.विष्व शान्ति पुरस्कार से नबाजे गये अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देष में हथियारों के कारोबार को लगातार बढावा दे रहे . उसके पीछे सोची समझी चाल यह है कि दुनियां के गरीब देश विकास करें और आत्म निर्भर बनने की बजाय हथियार खरीदे और आपस में लडे और अमेरिका का हथियार कारोबार फले फूले और उसकी चौधराहट दुनियां में बरकरार रहे.जरा देखें गत पांच वर्षों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढ गया है और पाकिस्तान का हथियार आयात इस बीच १२८ गुना बढा है. यह कैसा मजाक है कि जिन देशों के पास लोगों का पेट भरने के लिए भर पेट भोजन नहीं है वहां की सरकारें हथियारों की हवस पर जनता क पैसा फूंके जा रही है. विडम्बना देखिए कि नोबेल शान्ति पुरस्कार से नवाजे जाने के तुरन्त बाद साउदी अरब के साथ ६॰ अराब डालर के हथियार बेचने का सौदा किया.पिछले तीन दशक का यह सबसे बड हथियार सौदा है. इस सौदे से बोइंग कम्पनी के एफ-१५ बनाने वाले विभाग को आने वाले समय २॰१८ तक के लिए राशन पानी मिल गया. जबकि इस सौदे से पह्ले इसी बोइंग कम्पनी जो दुनियां की सबसे बडी हथियार निर्माता कम्पनी है के प्रबंन्धन और कर्मचारियों में बहश चल रही थी कि बोइंग प्रबंन्धन एफ-१५ लडाकू विमान युनिट के ४४ हजार कर्मचारियों की छटनी करने जारहा था क्योंकि लम्बे समय से इस जेट विमान के खरीददार नहीं मिल रहे थे.मगर बदलाव के नारे के साथ वाइट हाउस में प्रवेष करने के साथ ही ओबामा के हस्तक्षेप के बाद घटनाक्रम् में यह बदलाव तेजी से आया.छटनी की योजना बना रहे बोइंग कंम्पनी अब नये कर्मचारी भरती करने जारही है और विषेशज्ञों का कहना है कि ओबामा द्वारा साउदी अरब के साथ किया गया यह सौदा हथियार बनाने की इस सबसे बडी कंम्पनी में ७७ हजार नौकरियां सुरक्षित करेगा.
बिडंम्बना देखिए कि साउदी अरब को बेचे जाने वाले एफ-१५ विमान अब पुराने पड चुके हैं.शीतयुध्द के दौरान रूस के मिग विमानोंका मुकाबला करने के लिए इनका निर्माण् किया गया था. आखिर अमेरिका के इस कचरे से साउदी अरब किससे मुकाबला करेगा.तेल के बल पर कमाये अकूत् धन का दुरुपयोग कर अमेरिका जैसे विकसित देश खाडी देशों को पुराने हथियारों को खपाने के अड्डों में तब्दील कर रहे हैं. आतंकवाद से लडाई और सुरक्षा के नाम पर गरीब देशों के पैसे से विकसित देषों की तिजोरियां भरी जा रही हैं.दुनियां का हथियार उद्योग डेढ खरब डालर का है जो वैश्विक जीडीपी का २.७ प्रतिशत है और इस अमानवीय उद्योग पर ९॰ प्रतिषत कब्जा पष्चिमी विकसित देशों का है और उसमें भी ५॰ फीसदी पर अमेरिका का कब्जा है.दुनियां की तीन सबसे बडी हथियार निर्माता कंम्पनियां अमेरिका की हैं. दो ध्रुवीय दुनियां के जमाने में अपने अपने खेमें के देषों को हथियारों की आपूर्ति करने में अमेरिका और सोवियतसंघ में होड रहती थी. पर सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनियां भर में हथियारों की आपूर्ति और खपत् में कमी आयी जिसके परिणामस्वरूप बोइंग,रेथ्योन और लाकहीड जैसी बडी हथियार कंम्पनियों की बैलेंसषीट गडबडा गयी. इन्टरनेषनल पीस रिसर्च गु्रप (सिपरी ) स्टाकहोम के आंकडे भी इस बात पर मोहर लगाते हैं. ओबामा से दुनियां को बहुत उम्मीदें थीं. एक तो अष्वेत हैं इसलिए यह समझा जाता है कि उन्हें तीसरी दुनिया की बेहतर जानकारी है और उनकी समस्याओं के प्रति वे प्रतिबध्द और निश्ळावान होंगे. पर जिस तरह से वाशिंगटन नीतकारों ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के हथियार खपाने के लिए आग से खेलना षुरू कर दिया है. यह क्डुवी सच्चाई है कि अमेरिका चाहे लाख घोशणा करे पर अलकायदा,हमास,से लेकर लिट्टे तक के आतंकवादी संघळन उसी के हथियारों पर पलें हैं. अमेरिकी हथियारों की खपत बढे इसके लिए जरूरी था कि अलग थलग पडे देषों में आपसी झगडे बढें. अमेरिका ने दुत्कार और पुचकार की नीत अपना कर अपना अभियान चला रहा है .पकिस्तान-भारत- अफगानिस्तान,मध्य-पूर्व,खाडी और अफ्रीकी देशों के उलझे तनावपूर्ण संम्बन्धों अमेरिका की भुमिका छिपी नहीं है.नब्बे के दशक में तीसरी दुनियां की कई अर्थव्यवस्थाओं ने मैकडोनाल्ड और कोका कोला के साथ ही बोइंग जैसी कंम्पनी के लिए रास्ता साफ कर दिया था.एक रपट में यह भी खुलासा किया गया कि अमेरिकी कंम्पनियां अंतरराष्ट्रीय कानून से परे जाकर २८ से ज्यादा आतंकवादी संगळनों को हथियार बेंच रही हैं।हम भले ही यह समझें कि अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर् आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रहा है पर इस आड में उसने अकूत धन कमाया है. अमेरिका के रक्षा विभाग ने गत वर्श अमेरिकी काग्रेस को दी गयी सूचना में खुलासा किया है कि १९९५ से रक्षा सौदों में हर साल १३ अरब डालर की बढोत्तरी हो रही है.२॰॰१ के बाद से रक्षा सौदों की रफ्तार तीन गुनी हो गयी है.भारत पहले हथियार रूस से खरीदता था पर २॰॰१ में बुष प्रषासन के समय से षुरू हुई दोस्ती ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के लिए दिल्ली के दरवाजे खुल गये हैं.गत २॰॰९ में भारत ने बोंइंग से निगरानी विमान खरीदने के लिए २.१ अरब डालर का समझौता किया था और हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरा राश्ट्रपति ओबामा ने ४.१ अरब डालर का सौदा विमान आपूर्ति के लिए किया.सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आगामी एक दषक में भारत अपने सैनिक साजो सामान पर १॰॰ अरब डालर की भारी भरकम रकम खर्च कर सकता है जिसका सबसे बडा हिस्सा अमेरिकी हथियार कंपनियों को जाने वाला है.ऐसे में दक्षिण एषिया में षान्ति की अमेरिकी कवायतों को समझा जा सकता है.विकीलीक्स द्वारा फरबरी २॰१॰ मे़् जारी की गयी एक केबल में मैसाचुसेटस के सीनेटर जान कैरी अमेरिकी हथियार कंम्पनियों के लिए लाबिंग करते नजर आ रहे हैं.यद्यपि अमेरिकी दूतावासों पर राजनैतिक दखल्न्दाजी और हथियार कंपनियओं के हित साधने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं ब्राजील और नार्वे की विकीलीक्स केबलें भी की हथियार दलाली की बात प्रमाणित करती है.
शान्ति का मशीहा भारत हथियार खरीदने में सबसे आगे है. स्टाकहोम की संस्था इन्टरनेषनल पीस रिसर्च इन्स्टीत्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने दुनियां में सबसे अधिक हथियार आयात किये हैं. दुनियां के हथियार उधोग का ९ फीसदी कारोबार भारत द्वारा किया गया और पिछ्ले ५ साालों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढा और इसी अवधि में पाकिस्तान का हथियार आयात १२८ गुना बढा.यह कैसी बिडंम्बना है कि जिन देषों में जनता को भर पेट रोटी मयस्सर ना हो वहां हथियारों कि हवस पर सरकारें जनता का पैसा वेमुरौअत फूंक रही हैं.दुनियां के 10 बडे हथियार निर्यातक देश चीन को छोड कर पश्चिमी देश हैं.जी-८ के देषों वैश्विक हथियार कारोबार के ९३ फीसदी हिस्से पर कब्जा है षेश ७ फीसदी में तीसरी दुनियां के देश हैं.भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अन्तरराश्टीय संस्था ट्रंास्पैरेंसी इंटरनेश्नल के अनुसार अन्तरराश्ट्रीय हथियार उद्योग दुनियां के तीन महाभ्रश्ट उद्योगों मंे एक है.अमेरिका हथियार उद्योग को बढावा देते हुए विश्व शान्ति का मशीहा नहीं बन सकता .कम से भारत जैसा दुनियां का सबसे लोकतंत्र को तो यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए.

Thursday 5 May 2011

समय की आवाज



( रामाशंकर यादव विद्रोही के प्रति )

भगवान स्वरूप कटियार





अराजक सा दिखने वाला वह शख्स
चलता-फिरता बम है
जिस दिन फटेगा
पूरी दुनियां दहल जायेगी.

कितना यूरेनियम भरा है उसके भीतर
उसे खुद भी नही पता है.

उसके पत्थर जैसे कठोर हांथ
छेनी - हथौडी की तरह
दिन-रात चलते रह्ते है़
बेह्तर कल की तामीर के वास्ते.

उसके चेहरे पर उग आया है
अपने समय का बीहड़ बियावान.

अनवरत चलते रहने वाले
फटी बिवाइंयों वाले उसके पांव
किसी देवता से अधिक पवित्र हैं.

वह बीच चौराहे पर
सरेआम व्यवस्था को ललकारता है
पर व्यवस्था उसका कुछ नहीं
बिगाड पाती
तभी तो वह सोचता है
कि वह कितना टेरिबुल हो गया है.

तभी तो वह
बडे आत्मविश्वास के साथ कहता है
कि मशीहाई में उसका
कोई यकीन ही नहीं है
और ना मैं मानता हूं
कि कोई मुझ से बडा है.



वह ऊर्जा का भरापूरा पावर हाउस है
जिससे उर्जीकृत है
पूरी एक पीढी.

बच्चों जैसी उसकी मासूम आखों में
पूरा एक समुन्दर इळलाता है
और हृदय में भरी गहरी संवेदनाओं के साथ
जब वह हुंकारता है
तो समय भी ठहर कर सुनता है उसे
क्योंकि ना सिर्फ वह
अपने समय की आवाज है
बल्कि भविष्य का आगाज भी







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समय की आवाज


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जनक्रान्ति की इबारत के निहितार्थ



भगवान स्वरूप कटियार
कोई भी बडा जनाक्रोश किसी बडे बदलाव के लिए प्रसवपीडा की तरह होता है जिसकी कोख से जनक्रान्ति जन्म लेती है .ऐसा भी हो सकता है कि कोई जनक्रान्ति दिखने में एकदम अराजक लगे पर उसके पीछे छिपी जनभावना प्रक्रिया की प्रष्ट भूमि में बदलाव के असली कारण छिपे होते हैं. अरब देशों में भडके जनाक्रोष से तानाषाहों की हिलती जडों ने भारत की शक्ति को भी सोचने को मजबूर कर दिया. चुने हुए तानाषाहों और सडे हुए भ्रष्ट सिस्टम के शिकंजे से देष को कैसे निकाला जाय यह अकुलाहट कमोवेष हर आमजन में जन्म ले चुकी थी. यही बजह थी कि कि दिल्ली के जन्तर-मन्तर में आमरण अनशन पर बैळे अन्नाहजारे के समर्थन में देष हर कोने में आमरण अनषन और कैन्डिल जुलूष षुरू हो गये थे. वैसे भारत में भी एक बडे आन्दोलन की सुगबुगाह्ट तो बहुत दिनो से चल रही थी. अस्तित्व और अस्मिता की लडाई,जल जंगल और जमीन बचाने की लडाई,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा देष को उपनिवेश बनाये जाने की लडाई किसी ना किसी रूप में चल रही थी. देश की जनता राजनीत और नेताओं को घ्रणा की द्दष्टि से देखने लगी थी. जनता समझ लगी थी की चुनाव से सिर्फ चेहरे बदलते हैं व्यवस्था नहीं.जितना गान्धीवादियों ने निराष किया था उतना ही निराश कमोवेश कमंडवादियों,समाजवदियों,साम्यवादियों और अम्बेडकरवादियों ने भी किया. गावों के किसान परिवारों से राजनीत में आये पासवान,लालू,मुलायम और मायावती जैसे नेताओं ने राजनीत और लोकतंत्र को अविष्वसनीय बना दिया.लोकतंत्र उनके लिए सिर्फ लूटतंत्र बन गया और देश की निरीह जनता उनकी बंधुआ मतदाता जिसके लिए किसी ना किसी चोर लुटेरे को चुनना उसकी मजबूरी बन गयी.भारतीय जनता पार्टी जितने जोरषोर से भ्रश्टाचार के खिलाफ भाशण देती है उतनी षिद्दत से भ्रश्टाचार में फंसे अपने नेताओं को बचाती भि है.कोई भी नेता कुछ अपवादों को छोड कर इस रजनैतिक यथास्थितवाद को खत्म नहीं करना चाहता है,क्यों कि हर किसी की इसी में भलाई है.सांसदों के भत्तों में बृध्दि हो सांसद निधि में बृध्दि सब एक साथ संसद में मेजें थपथपाते है. यही बजह है अन्ना की इस मुहिम में कुछ को छोड कर सभी राजनैतिक दल चुप्पी साधे है़ं.
आखिर क्या है क्रान्ति जिसकी हमें बार बार जरूरत पड्ती है.एक जन विरोधी व्यवस्था के खिलाफ जनता का गुस्सा जनाक्रोश और उस व्यवस्था को तत्काल बदलने की अकुलाहट को जनता की सरल भाषा में क्रान्ति कह सक्ते हैं. अर्थात पूर्वनिर्धारित मूल्यों का व्यापक मानवहित में पुनर्निधारण का नाम ही क्रान्ति है.व्यापक मानवहित में इस पुनर्निर्धारण में वे षक्तियां गतिरोध पैदा करती हैं जिनके स्वार्थ बाधित होते हैं. उदाहरण के कर्लिए सवर्ण जातियां कभी वर्णव्यवस्था समाप्त नहीं करना चाहती हैं क्योंकि ऊंचनीच की इस गैरबराबरी वाली सामाजिक व्यवथा में उनका स्वार्थ निहित है.क्रान्तियों के इतिहास को पलट कर देखें तो हर जनक्रान्ति अपने साथ बद्लाव की मंशा के साथ साथ बदलाव की पूरी रूपरेखा ले कर आती है.रोमनक्रान्ति से इटली का एकीकरण हुआ, अमेरिकी क्रान्ति से अमेरिका अजाद हुआ और 1789 में घटित हुई फ्रांसीसी क्रांन्ति ने स्वतंत्रता-समता-बन्धुत्व के नये स्वप्नों और नयी अवधारणाओं के साथ पूरी दुनियां में,दबे कुचले लोगों ने राजसत्ताओं की ओर अधिकार भरी निगाहों से देखना षुरू कर दिया था जिसने पूरी दुनिया में लोकशाही शंखनाद किया.गत 5 अप्रैल से 10 अप्रैल ( 2011 ) के बीच अर्थात पांच दिनों में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रश्टाचार के खिलाफ देष भर में उमडे जन सैलाब ने यह साबित कर दिया कि देश की पूरी व्यवस्था में कोई बहुत बडी गडबडी है जिसे जनता तत्काल निजात चाह्ती है.इस बात से सभी सहमत हैं कि भ्रष्टाचार सारी समस्याओं की जड है जो गत 60-62 सालों से देश को घुन की तरह चाट रहा है.कुछ लोग इसे संसदीय प्रक्रिया को चुनौती देने की बात कहते हैं. अंग्रेज भी हमारे स्वाधीनता आन्दोलन को कुछ इसी तरह से आरोपित कर हमारा दमन करता था पर हम कहां रुके.यद्यपि हमे जो आजादी मिली खंडित और अधूरी है़. डा़. अम्बेडकर की देष को संविधान सौपते वक़्त जो शंकाए थी वे पूरी तरह फलीभूत हो रही है.इस भ्रश्टाचार की आशंका उन्हे पूरी तरह थी.इसीलिए वे संविधान में दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं भूमि का राष्ट्रीयकरण और समान स्तरीय निशुलक शिक्षा व्यवस्था हेतु शिक्षा के राश्ट्रीयकरण लाना चाहते थे पर यह कह कर रोक दिया गया कि देश अभी इतना परिपक्व नहीं है.सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त सांमन्ती अवशेष भला क्यों ऐसा चाहेंगे जैसे आज भी अधिकाँश राजनैतिक द्ल लोकतंत्र के हिमायती तो अवष्य पर भ्रष्टाचार समूल नश्ट हो यह वे कथी नहीं चाह्ते.लोकशाही की खेती में वे भ्रष्टाचार की फसले कटते रहना चाह्ते हैं. डा. अम्बेडकर ने कहा था कि यह संविधनान तभी महत्वपूर्ण और देष के लिए उपयोगी सिध्द हो सकता है जब इसके संचालक देषभक्त,संवेदनशील,सदचरित्र और योग्य हों वरना यह महज कागज का एक पुलिन्दा और कुछ नहीं . उन्होंने यह भी कहा था कि यह देश सदियों से सामाजिक सांस्कृतिक अन्तर्विरोधों का देष रहा है और इन अन्तरविरोधों को हम अभी तक् दूर नहीं कर पाये हैं और हम विभिन्न विचारधाराओं वाले बहु दलीय लोकतंत्र में प्रवेष कर रहे हैं. अगर हम सचेत और सजग ना रहे तो यह लोक्तंत्र बच पायगा मुझे संदेह है. आज वही सब देख रहा है. भारत का लोकतंत्र जिसे हम दुनियां का सब्से बडा लोकतंत्र कहते हुए छाती ठोकते हैं वह इस देश के भ्रष्ट नेताओं,भ्रष्ट नौकरशाहों,पूंजीपतियों, कापोरेट घरानों और अपराधिक तत्वों का गळ््जोड है. यह वह लोकतंत्र् तो कतई नहीं जिसकी परिकल्पना करके संविधान लिखा गया था आमजन की जन इच्छा फलीभूत हो सके.सच यह यह घोर हताषा और निराषा की घडी है जहां जनता मन्अपने ही लोगोंके हाथों ळगी जा रही है. यह जनाक्रोश उसी का उबाल है.
अन्ना हजारे के अनषन की सफलता भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है. आन्दोलन ने संकेत दिया कि लोक्षक्ति सत्ता क झुका सकती है. अगर यह आन्दोलन विफल हो जाता तो ना जाने कितने देशवासियों का मन टूटता और ना जाने कितने युवक यह मान बैठते कि भ्रष्टाचार से निजात पाना सम्भव नहीं है. पर हमें इस आन्दोलन की इबारत के पीछे छिपी पूरी मंशा और आशय को समझना चाहिये जो सिर्फ जनलोकपाल विधेयक तक सीमित नहीं है. उसके एक व्यापक मायने और गहरे अर्थ हैं.कह्ने में हम भले ही हिचकें पर यह आन्दोलन जल,जंगल,जमीन और अपने अस्तितत्व के लिए लम्बे समय से लड रहे मावोवादियों की जन इच्छा को कहीं ना समाहित किये हुए है. अनशन की तरह शायद हथियार उळाना उनकी भी बेवशी ही है. नर्मदा आन्दोलन की गूंज भी इसमें भी इसमें समाहित है.इसमे संसद पर मुम्बई में हुए आतंकी हमले का दर्द और आक्रोश भी समाहित है. कुल इस आन्दोलन की इबारत चीख चीख कर यह रही है कि हमें शहीदों के सपनों का ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान और पूरी गरिमा के साथ जीने की सूनिश्चित गारन्टी हो.जिसमें सबके लिए समान स्तरीय निषुल्क षिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था की गारन्टी हो.रोजगार की सुनिष्चत् गारन्टी के साथ साथ भूख से ना मरने की भी गारन्टी हो. जात पात,ऊंच नीच और धर्म के भेदभाव जड से समाप्त किये जांय.मनरेगा और राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिषन जैसे रियायती कार्यक्रमों की जगह पूर्ण रोजगार और पूर्ण शिक्षा चिकित्सा गारन्टी कार्यक्रम चाहिए. यदि हमारी संसद, विधान सभाएं,न्यायपालिका,व्यव्स्थापिका,चौथा स्तम्भ यानी प्रेस और यहां तक कि संविधान भी आन्दोलन की मंषा के अपेक्षित व्यवस्था देने में सक्षम नहीं हैम तो हम इन्हें बदलेंगे.बेखौफ बदलेंगे,कितना भी दुरूह,दुश्कर,जटिल और कळिन क्यों ना हो. आाखिर आजादी की दो ढाई सौ वर्शोम की लडाई कम जटिल और दुरूह नहीं थीं.जरूरत पड्ने पर षहादतें भी दी जायेंगी पर फैज की जुबान में डेरे अब मंजिल पर ही पडेगे कट्ने को हमारे पास हांथ भी बहुत हैं और सर भी. आन्दोलन की इस इबारत को देश के हुक्मरान अच्छी तरह पढ लें.यह आन्दोलन महज अन्ना का नहीम पूरे देष का है जिसमें षामिल हर व्यक्ति अन्ना है.हमारी सजगता और सचेष्टता इसमें है कि हम इसे सम्पूर्ण क्राति की तरह अपहृत ना होनेदें.

कार्ल मार्क्स और उनका चिन्तन


( ५ मई जन्म दिवस पर विषेश ) भगवान स्वरूप कटियार
मार्क्सवादी विचारधारा के अस्तित्व में आने के बाद दुनियां मार्क्सावादी तथा गैरमाक्सर्वादी दो धु्रवीय विचारधारा में विभाजित हो गयी या यों कि कहें कि पूंजीवादी और गैरपूंजीवादी यानी समाजवादी.दुनिया के समृध्द और विकसित देष पूंजीवादी खेमें में एकताबध्द हुए जिसके मुखिया अमेरिका और इंग्लैण्ड जैसे षक्ति सम्पन्न देष बने और तीसरी दुनिया के गरीब देषों का नेतृत्व तत्कालीन सोवियतसंघ यानी रूस ने संभाला जो मार्क्सवादी चिन्तन को हथियार बना कर अक्तूबर क्रान्ति के जरिये पूंजीवाद और सामन्तवाद के खिलाफ एक ताकत बन कर उभरा था.सोवियत संघ के विघटन के बाद भले ही यह कहा जाने लगा हो कि दुनिया एक धु्रवीय हो गयी है पर सच्चई तो यह कि वैचारिक रूप से दुनिया आज भी दो धु्रवीय ही है और जब तक पूंजीवाद है, दुनिया दो धु्रवीय ही रहेगी. भले ही पूंजीवाद किसी भी षक्ल में क्यों ना हो .लैटिन अमेरिकी देषों में वामपंथ की बढती लहर इस बात का ज्वलन्त सबूत है .गत दिनों आयी वैश्विक मन्दी ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण की हवा निकाल कर रख दी और अन्ततः समाधान के लिए मार्क्सवाद की षरण जाना पडा और अर्थषस्त्रियों को मार्क्स की प्रसिध्द पुस्तक ”पूंजी“ के सफे पढने पढे. पूंजीवाद का जितना अच्छा अध्यय्न और विश्लेषण मार्क्स ने किया उतना और किसी ने अभी तक नहीं किया. मार्क्स ने उस नैतिक और सांस्कृतिक विध्वंस की ओर ध्यान दिलाया , पूंजीवाद जिसे अपने साथ लाता है. मार्क्स ने पूरे तर्कों के साथ बताया कि मनुश्य जब पहली बार शोषित वर्ग का सदस्य बनता है तो वह अपने मानवीय सारतत्व से वंचित हो जाता है और पुंजीवाद के अधीन वह अपने अन्दर समूची मानवता का विध्वंष होते देखता है. पूंजीवाद लालच और लालचियों के बीच लडी जाने वाली लडाई है जो संपूर्ण मानवजाति को अपने शिकंजे में जकड कर बाजार की अंधी ताकतों के रहमोंकरम पर छोड देती है. मनुश्य की मुक्ति के मुख्य आधार सृजनात्मक आत्मक्रियाषीलता को ,श्रम को और स्वयं मनुष्य को माल में तब्दील कर देता है. पूंजीवाद् मनुश्य को मनुश्य से अलग कर देता है .पूंजीवाद मनुश्यों के बीच सभी जेनुइन रिशतोंको तोड देता है और मनुष्यों के संसार को एक दूसरे के शत्रुओं के संसार में बदल् देता है।यह मनुश्य मनुश्य के बीच नंगे स्वार्थ , कठोर नगद भुगतान के अलावा रिष्ते का और कोई आधार नहीं छोडता.मानव- जीवन का हर पहलू खरीदने और बेचने की वस्तु बन जाता है.प्रेम, निश्ळा,ज्ञान, अंतरआत्मा,गुण आदि जो कभी संप्रेषित की जाती थीं लेकिन बदली नहीं जाती थीं,बेची खरीदी नहीं जाती थीं , सब बाजारू हो कर वणिज्य के क्षेत्र में प्रवेश कर जाती हैं. पूंजी सभी मानवीय और प्राकृतिक गुणों को बाजार में लाकर पराजित कर देती है. मार्क्स ने इस ओर खास तौर से ध्यान आकर्षित करते हुए आगाह किया कि हमारी शानदार संवेदनाओ के बदले पूंजीवाद सिर्फ अमूर्त संवेदना सम्पत्तिबोध को प्रस्तावित करता है जो मानवीय व्यक्तित्व का विध्वंश कर देती है, मनुष्य को लालची समाज की बीमारी से ग्रसित कर देती है.मनुष्य को उस असीम दरिद्रता में धकेला जाता है कि ताकि वह अपनी आन्तरिक संपत्ति को बाहरी दुनियां के हाथों सौंप सके. पूंजीवादी व्यवस्था में धनी व्यक्ति भी वास्त्विक जीवन से वंचित और अपनी अंतरआत्मा से अपंग दीन-हीन हो जाता है.जिसकी संपत्ति जितनी बडी होती है वह अंतरआत्मा के स्तर पर् उतना ही छोटा होता जाता है.उसने इस बात पर जोर दिया कि “निजी संम्पत्ति का अतिक्रमण ही सभी मानवीय संवेदनाओं और और गुणों की पूर्ण मुक्ति है़् .
जर्मनी के राइन प्रदेश प्रशा के त्रियेर नगर में ५मई १८१८ में एक यहूदी परिवार के वकील के घर में जन्में कार्ल मार्क्स ने अपने क्रान्तिकारी विचारों से दुनियां को सबसे अधिक प्रभावित किया.सामाजिक और आर्थिक चिन्तन के क्षेत्र में मार्क्स के बाद् एक युगान्तकारी परिवर्तन आना शुरू हुआ.चार्ल्स डार्विन और कार्ल मार्क्स ने दुनिया के बारे में सोचने ,समझने और देखने का नया नजरिया पेष किया. डार्विन ने मनुश्य की उत्पत्ति के विकास की वैज्ञानिक अवधारणा पेष की तो मार्क्स ने समाज की उत्पत्ति की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक अवधारणा पेश की.मार्क्स ने प्रतिपादित किया कि “दुनियां का संम्पूर्ण इतिहास वर्ग संघर्श का इतिहास है. अपने मित्र और जीवन के सहयात्री फ्रेड्रिक एंगेल के साथ लिखा गयी मशहूर पुस्तक कम्युनिस्ट घोशणा-पत्र1890 के दशक में आश्चर्यजनक ढंग से बेस्ट सेलर साबित हुई और बीसवीं सदी के आरम्भ में बीबीसी ने “ उन्हें सर्वकालिक महान दार्शनिक “ चुना।उन्होंने कहा कि “ दार्शनिकों ने केवल दुनियां की व्याख्या की है ,पर सवाल इसे बदलने का है“ यहीं से मार्क्स एक दार्षनिक से क्रान्तिकारी विचारक में रूपान्तरित होने लगते हैं।मार्क्स के पिता हेनरिख मार्क्स पेशे से वकील और कुलीन यहूदी परिवार थे और उन पर फ्रांसीसी क्रान्ति का गहरा प्रभाव था।उन पर वाल्टेयर और रूसो का गहरा प्रभाव था और उन्होंने अपना धर्म बदल कर प्रोटेस्टेन्ट हो गये.कार्ल मार्क्स पर अपने पिता की गहरी छाप थी.उन्होंने लिखा है कि मेरे पिता का चरित्र निश्छल और निष्कपट था और कानून के क्षेत्र के प्रतिभावान हस्ती थे.मार्क्स की मां हेनिरिएटा हालैण्ड के एक घरेलू परिवार की साधारण महिला थीं.१८३॰ से १८३५ तक मार्क्स त्रिएर के जिम्नेजियम में पढे.इसी समय मार्क्स का वैचारिक विकास प्रारम्भ हो चुका था जिसकी झलक उनके द्वारा “व्यवसाय के चयन पर एक तरूण के विचार“ विशय पर लिखे गये निबन्ध से साफ झलकती है.उन पर उनके पिता के मित्र लुडविग वान का भी प्रभाव थे जिसके कारण षुरू में उन्होंने कवितएं , नाटक और उपन्यास भी लिखे.षेक्सपियर उनके प्रिय लेखक थे. जेनी वान वेस्टफालेन लुड्विग की ही बेटी थी जिनसे मार्क्स बचपन से बेहद प्यार करते थे और १८४३ में जेनी मार्क्स की जीवन संगनी बनी.मार्क्स को मार्क्स बनाने में उनकी पत्नी जेनी,उनके मित्र फ्रेड्रिक एंगेल और उनकी घरेलू सहायक हेलेन की अहम भूमिका थी. अगर कहा जाय कि मार्क्स इन्हीं तीनों अवयवों का विकसित मिश्रण थे तो अतिशयोक्ति न होगा.
.१८३५ में मार्क्स ने बोन विष्वविद्यालय के विधि संकाय में दाखिला लिया.मार्क्स की दर्षन और् इतिहास में गहरी रुचि थी पर वह सिर्फ अकादमिक नहीं थी.उन दिनों की बहषों में महान दार्षनिक हेगेल का गहरा प्रभाव था.हेगेल पर फ्रांसीसी क्रान्ति का गहरा असर था और उनका मानना था कि मानवीय सभ्यता के न्यायपूर्ण विकास के लिए नये युग का सूत्र्ापात है.लेकिन जब मार्क्स हेगेल के विचारों से परिचित हुए तब तक हेगेल पूर्णरूपेण यथास्थितिवादी बन गये थे और वे यह मानने लगे थे कि “ईश्वर ही चेतना का सर्वोच्च प्रतीक है“.मार्क्स के लिए समाज को वर्गों के आधार पर समझने की प्रक्रिया का प्रस्थान विन्दु था.कार्ल मार्क्स ने “दर्षन की दरिद्रता“.“कम्युनिस्ट घोषणा पत्र “ तथा तीन खंडों में बृहद पुस्तक “पूंजी“ के अतिरिक्त अनेक महत्व्पूर्ण पुस्तकें लिखी तथा अनेक् महत्वपूर्ण अखबारों और पत्रिकाओं का संपादन किया।मार्क्स द्वारा लिखित पूंजी को सर्वहारा की बाइबिल कहा जाता है। उन्होंने “दुनियां के मजदूरो एक हो“ का नारा बुलन्द करते हुए कम्युनिस्ट इन्तरनेशनल का गळन किया। कम्युनिस्ट इन्तरनेशनल के लिए काम करते हुए उनके स्वास्थ पर गहरा असर पडा.२दिसम्बर १८८१ को उनकी जीवन संगनी जेनी का निधन हुआ.इसके कुछ दिन बाद उनकी बडी बेटी का निधन हो गया.मार्क्स के कुछ बच्चे लंदन में बचपन ही मर गये थे.१४ मार्च १८८३ को मार्क्स काम करते हुए अपनी कुर्सी पर हमेषा के लिए चिरनिद्रा में सो गये.इस महान क्रान्तिकारी चिन्तक के निधन से विष्व सर्वहारा की अपूर्ण क्षति हुई.वह कहा करते थे कि “सिर्फ और सिर्फ मानवता और मानव कल्याण के लिए काम करो“.उन्होंने अपार कश्ट और तकलीफे सही ,निर्वासन और गरीबी के थपेडे सहे पर उनके पांव नहीं डगमगाये . उनका अमर वाक्य “यह मनुश्य की चेतना नहीं होती जो उसके अस्तित्व का निर्धारण करती है,बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व होता है जो उसकी चेतना को निर्धारित करता है“ विश्व सर्वहारा की वैचारिक चेतना का सूत्र बन गया. आज कार्पोरेट पूंजीवाद ,उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जिन धारदार हथियारों के साथ हमारे सामने खडा है ,उससे लडने का एक ही हथियार हमारे सामने है कार्ल मार्क्स का सार्वभौमिक चिंतन यानी मार्क्सवाद.मार्क्सवाद की प्रासांगिकता आज पहले से अधिक है.