Thursday 5 May 2011

जनक्रान्ति की इबारत के निहितार्थ



भगवान स्वरूप कटियार
कोई भी बडा जनाक्रोश किसी बडे बदलाव के लिए प्रसवपीडा की तरह होता है जिसकी कोख से जनक्रान्ति जन्म लेती है .ऐसा भी हो सकता है कि कोई जनक्रान्ति दिखने में एकदम अराजक लगे पर उसके पीछे छिपी जनभावना प्रक्रिया की प्रष्ट भूमि में बदलाव के असली कारण छिपे होते हैं. अरब देशों में भडके जनाक्रोष से तानाषाहों की हिलती जडों ने भारत की शक्ति को भी सोचने को मजबूर कर दिया. चुने हुए तानाषाहों और सडे हुए भ्रष्ट सिस्टम के शिकंजे से देष को कैसे निकाला जाय यह अकुलाहट कमोवेष हर आमजन में जन्म ले चुकी थी. यही बजह थी कि कि दिल्ली के जन्तर-मन्तर में आमरण अनशन पर बैळे अन्नाहजारे के समर्थन में देष हर कोने में आमरण अनषन और कैन्डिल जुलूष षुरू हो गये थे. वैसे भारत में भी एक बडे आन्दोलन की सुगबुगाह्ट तो बहुत दिनो से चल रही थी. अस्तित्व और अस्मिता की लडाई,जल जंगल और जमीन बचाने की लडाई,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा देष को उपनिवेश बनाये जाने की लडाई किसी ना किसी रूप में चल रही थी. देश की जनता राजनीत और नेताओं को घ्रणा की द्दष्टि से देखने लगी थी. जनता समझ लगी थी की चुनाव से सिर्फ चेहरे बदलते हैं व्यवस्था नहीं.जितना गान्धीवादियों ने निराष किया था उतना ही निराश कमोवेश कमंडवादियों,समाजवदियों,साम्यवादियों और अम्बेडकरवादियों ने भी किया. गावों के किसान परिवारों से राजनीत में आये पासवान,लालू,मुलायम और मायावती जैसे नेताओं ने राजनीत और लोकतंत्र को अविष्वसनीय बना दिया.लोकतंत्र उनके लिए सिर्फ लूटतंत्र बन गया और देश की निरीह जनता उनकी बंधुआ मतदाता जिसके लिए किसी ना किसी चोर लुटेरे को चुनना उसकी मजबूरी बन गयी.भारतीय जनता पार्टी जितने जोरषोर से भ्रश्टाचार के खिलाफ भाशण देती है उतनी षिद्दत से भ्रश्टाचार में फंसे अपने नेताओं को बचाती भि है.कोई भी नेता कुछ अपवादों को छोड कर इस रजनैतिक यथास्थितवाद को खत्म नहीं करना चाहता है,क्यों कि हर किसी की इसी में भलाई है.सांसदों के भत्तों में बृध्दि हो सांसद निधि में बृध्दि सब एक साथ संसद में मेजें थपथपाते है. यही बजह है अन्ना की इस मुहिम में कुछ को छोड कर सभी राजनैतिक दल चुप्पी साधे है़ं.
आखिर क्या है क्रान्ति जिसकी हमें बार बार जरूरत पड्ती है.एक जन विरोधी व्यवस्था के खिलाफ जनता का गुस्सा जनाक्रोश और उस व्यवस्था को तत्काल बदलने की अकुलाहट को जनता की सरल भाषा में क्रान्ति कह सक्ते हैं. अर्थात पूर्वनिर्धारित मूल्यों का व्यापक मानवहित में पुनर्निधारण का नाम ही क्रान्ति है.व्यापक मानवहित में इस पुनर्निर्धारण में वे षक्तियां गतिरोध पैदा करती हैं जिनके स्वार्थ बाधित होते हैं. उदाहरण के कर्लिए सवर्ण जातियां कभी वर्णव्यवस्था समाप्त नहीं करना चाहती हैं क्योंकि ऊंचनीच की इस गैरबराबरी वाली सामाजिक व्यवथा में उनका स्वार्थ निहित है.क्रान्तियों के इतिहास को पलट कर देखें तो हर जनक्रान्ति अपने साथ बद्लाव की मंशा के साथ साथ बदलाव की पूरी रूपरेखा ले कर आती है.रोमनक्रान्ति से इटली का एकीकरण हुआ, अमेरिकी क्रान्ति से अमेरिका अजाद हुआ और 1789 में घटित हुई फ्रांसीसी क्रांन्ति ने स्वतंत्रता-समता-बन्धुत्व के नये स्वप्नों और नयी अवधारणाओं के साथ पूरी दुनियां में,दबे कुचले लोगों ने राजसत्ताओं की ओर अधिकार भरी निगाहों से देखना षुरू कर दिया था जिसने पूरी दुनिया में लोकशाही शंखनाद किया.गत 5 अप्रैल से 10 अप्रैल ( 2011 ) के बीच अर्थात पांच दिनों में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रश्टाचार के खिलाफ देष भर में उमडे जन सैलाब ने यह साबित कर दिया कि देश की पूरी व्यवस्था में कोई बहुत बडी गडबडी है जिसे जनता तत्काल निजात चाह्ती है.इस बात से सभी सहमत हैं कि भ्रष्टाचार सारी समस्याओं की जड है जो गत 60-62 सालों से देश को घुन की तरह चाट रहा है.कुछ लोग इसे संसदीय प्रक्रिया को चुनौती देने की बात कहते हैं. अंग्रेज भी हमारे स्वाधीनता आन्दोलन को कुछ इसी तरह से आरोपित कर हमारा दमन करता था पर हम कहां रुके.यद्यपि हमे जो आजादी मिली खंडित और अधूरी है़. डा़. अम्बेडकर की देष को संविधान सौपते वक़्त जो शंकाए थी वे पूरी तरह फलीभूत हो रही है.इस भ्रश्टाचार की आशंका उन्हे पूरी तरह थी.इसीलिए वे संविधान में दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं भूमि का राष्ट्रीयकरण और समान स्तरीय निशुलक शिक्षा व्यवस्था हेतु शिक्षा के राश्ट्रीयकरण लाना चाहते थे पर यह कह कर रोक दिया गया कि देश अभी इतना परिपक्व नहीं है.सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त सांमन्ती अवशेष भला क्यों ऐसा चाहेंगे जैसे आज भी अधिकाँश राजनैतिक द्ल लोकतंत्र के हिमायती तो अवष्य पर भ्रष्टाचार समूल नश्ट हो यह वे कथी नहीं चाह्ते.लोकशाही की खेती में वे भ्रष्टाचार की फसले कटते रहना चाह्ते हैं. डा. अम्बेडकर ने कहा था कि यह संविधनान तभी महत्वपूर्ण और देष के लिए उपयोगी सिध्द हो सकता है जब इसके संचालक देषभक्त,संवेदनशील,सदचरित्र और योग्य हों वरना यह महज कागज का एक पुलिन्दा और कुछ नहीं . उन्होंने यह भी कहा था कि यह देश सदियों से सामाजिक सांस्कृतिक अन्तर्विरोधों का देष रहा है और इन अन्तरविरोधों को हम अभी तक् दूर नहीं कर पाये हैं और हम विभिन्न विचारधाराओं वाले बहु दलीय लोकतंत्र में प्रवेष कर रहे हैं. अगर हम सचेत और सजग ना रहे तो यह लोक्तंत्र बच पायगा मुझे संदेह है. आज वही सब देख रहा है. भारत का लोकतंत्र जिसे हम दुनियां का सब्से बडा लोकतंत्र कहते हुए छाती ठोकते हैं वह इस देश के भ्रष्ट नेताओं,भ्रष्ट नौकरशाहों,पूंजीपतियों, कापोरेट घरानों और अपराधिक तत्वों का गळ््जोड है. यह वह लोकतंत्र् तो कतई नहीं जिसकी परिकल्पना करके संविधान लिखा गया था आमजन की जन इच्छा फलीभूत हो सके.सच यह यह घोर हताषा और निराषा की घडी है जहां जनता मन्अपने ही लोगोंके हाथों ळगी जा रही है. यह जनाक्रोश उसी का उबाल है.
अन्ना हजारे के अनषन की सफलता भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है. आन्दोलन ने संकेत दिया कि लोक्षक्ति सत्ता क झुका सकती है. अगर यह आन्दोलन विफल हो जाता तो ना जाने कितने देशवासियों का मन टूटता और ना जाने कितने युवक यह मान बैठते कि भ्रष्टाचार से निजात पाना सम्भव नहीं है. पर हमें इस आन्दोलन की इबारत के पीछे छिपी पूरी मंशा और आशय को समझना चाहिये जो सिर्फ जनलोकपाल विधेयक तक सीमित नहीं है. उसके एक व्यापक मायने और गहरे अर्थ हैं.कह्ने में हम भले ही हिचकें पर यह आन्दोलन जल,जंगल,जमीन और अपने अस्तितत्व के लिए लम्बे समय से लड रहे मावोवादियों की जन इच्छा को कहीं ना समाहित किये हुए है. अनशन की तरह शायद हथियार उळाना उनकी भी बेवशी ही है. नर्मदा आन्दोलन की गूंज भी इसमें भी इसमें समाहित है.इसमे संसद पर मुम्बई में हुए आतंकी हमले का दर्द और आक्रोश भी समाहित है. कुल इस आन्दोलन की इबारत चीख चीख कर यह रही है कि हमें शहीदों के सपनों का ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान और पूरी गरिमा के साथ जीने की सूनिश्चित गारन्टी हो.जिसमें सबके लिए समान स्तरीय निषुल्क षिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था की गारन्टी हो.रोजगार की सुनिष्चत् गारन्टी के साथ साथ भूख से ना मरने की भी गारन्टी हो. जात पात,ऊंच नीच और धर्म के भेदभाव जड से समाप्त किये जांय.मनरेगा और राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिषन जैसे रियायती कार्यक्रमों की जगह पूर्ण रोजगार और पूर्ण शिक्षा चिकित्सा गारन्टी कार्यक्रम चाहिए. यदि हमारी संसद, विधान सभाएं,न्यायपालिका,व्यव्स्थापिका,चौथा स्तम्भ यानी प्रेस और यहां तक कि संविधान भी आन्दोलन की मंषा के अपेक्षित व्यवस्था देने में सक्षम नहीं हैम तो हम इन्हें बदलेंगे.बेखौफ बदलेंगे,कितना भी दुरूह,दुश्कर,जटिल और कळिन क्यों ना हो. आाखिर आजादी की दो ढाई सौ वर्शोम की लडाई कम जटिल और दुरूह नहीं थीं.जरूरत पड्ने पर षहादतें भी दी जायेंगी पर फैज की जुबान में डेरे अब मंजिल पर ही पडेगे कट्ने को हमारे पास हांथ भी बहुत हैं और सर भी. आन्दोलन की इस इबारत को देश के हुक्मरान अच्छी तरह पढ लें.यह आन्दोलन महज अन्ना का नहीम पूरे देष का है जिसमें षामिल हर व्यक्ति अन्ना है.हमारी सजगता और सचेष्टता इसमें है कि हम इसे सम्पूर्ण क्राति की तरह अपहृत ना होनेदें.

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