Monday 21 March 2011

रंगों की खुषुनुमा दुनियां



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भगवान

कुदरत की खुबसूरती का वर्णन अद्भुत है और उसमें चार चांद लगाते हैं रंग . जिन्दगी में रंगों का कोई विकल्प नहीं है . जब हम ताजगी और स्फूर्ति देने वाले रंगों को अपने जीवन में षमिल कर लेते हैं तब हमारी जिन्दगी रंगीन और खुबसूरत हो जाती है . रंग मौसम में घुल कर पूरे मौसम को रंगीन और खुषनुमा बना देते हैं . रंग कोई बनावटी चीज नहीं है बल्कि कुदरत के साथ ही पैदा हुएं हैम . पूरी कुदरत रंगीन और खुषनुमा है फिर हम गमगीन क्यों हैं. जैसे- जैसै हम कुदरत से दूर हट कर एक बनावटी दुनियां में ज्ीने लगते हैं , हमारा कुदरत के रंगों से नाता टूट जाता और हम अनचाहे दुखों से भर जाते हैं .सूर्य की लालिमा हो खेतों की हरियाली , नीला आकाष हो या बादलोंकी काली छटा , या वारिष के बाद बिखरती इन्द्रधनिशी छटा, हमारे मन और दिलोंको खुषी से भर देते हैं . रंग हमारे जीवन में इस तरह घुल गये हैं कि हम उन्हें अलग ही नहीं कर सकते . रंगों का हमारे विचारों और भवनाओं पर गहरा प्रभाव पडता है . रंगों में आत्मिक भावनाओं को संप्रेशित करने की अपार सामर्थ्य है . सच में मानव जीवन रंगों के बिना उदास और सूना है .
मनुश्य पैदायिषी रंग पसंद है ़ नवजात षिषु रंगों को देख कर जिस तरह से किलकारियां भरता है उसी से हम अन्दाजा लगा सकते हैं कि रंगों से हमारा कितना घनिश्ळ रिष्ता है . आदिमकाल से ही मनुश्य अपने को रंगने का बहाना ढूढता रहा है . आादिम समाजों में धार्मिक अनुश्ळान हों या सामूहिक नृत्य या फिर जंग का मैदान ,लोग अपने चेहरों और षरीर् को रंगने , सिर पर् रंगबिरंगे पंख लगाने और रंगीन मुखौटे लगाने की एक समृध्द परंपरा रही है और इन्हीं रंग भरी परंपराओं से वे अपनी खुषियों का इजहार करते आये हैं . प्राचीनकाल से ही रंगों की प्रतीकात्मक व्याख्या की जाती रही है , जिसका् दार्षनिक , सामाजिक और धर्मिक उद्देष्य रहा है . षास्त्रों ,वेदों , पुराणों, और धर्म ग्रंथों यहां तक की कामसूत्र में भी रंगों का वर्णन मिलता है. समस्त भौतिक जगत का निर्माण जिन पांच तत्वों से हुआ है -पृथ्वी तत्व- पीत , जल तत्व-ष्वेत , अग्नि तत्व - रक्त , वायु और आकाष तत्व - ष्याम . हम से रंगों का यह घनिश्ळ रिष्ता अनायास या बेवजह नहीं है , धर्मिक आस्थाओं से लेकर वैज्ञानिक आधारों तक की सच्चाई यही है कि रंगो को धरण कर प्रकृति से अपना रिष्ता जोडते हैं . वसंती रंग हमारे अन्दर बसन्त बिखेरता है और हरा मौसम में हरियाली घिल कर हरितिमा फैलाता है , नीला रंग आसमान का आइना है और लाल रंग सुबह की लालिमा से हमारा रिष्ता जोड्ता है . रंगों से हमारी भावनाएं जुड जाती हैं और हम प्रकृति से अपना रिष्ता जोडने लगते हैं.जब तक हम प्रकृति के नजदीक हैं तभी तक हम खुष हैं . बनावटी दुनियां में सिर्फ दुख और तनाव के सिवा कुछ नहीं है .इस रंगीन दुनिया में हर रंग कुछ बोलता है . जिन रंगों को हम अपने अन्दर समा लेते हैं,हम जिनके बीच रह्ते हैं सभी कहीं न कहीं हमें प्रभावित करते हैं . ताजगी और स्फूर्ति देने वाले इन रंगोंको अपने जीवन में षामिल करें ये आप की जिन्दगी को खुषुनुमा और खुबसूरत बना देंगे. जहंा प्रकृति में स्वाभाविक रंग कम होते हैं वहां बाहरी रंगोंसे उसकी पूर्ती की जाती है . उदाहरण के लिए राजस्थान पूरी दुनियां में “रंगीलो राजस्थान “ के नाम से विख्यात है जबकि सच्चाईयह है कि पानी की कमी के कारण पूरा राजस्थान धूसर और मटमैले रेत से भर पडा है . ऐसे में रंगों की पूर्ति वहां के लोगों द्वारा रंगीन वेश- भूशा पहन कर की जाती है .
प्रारंभ में लोग प्राकृतिक रंगो को ही उपयोग में लाते थे . अजन्ता की महान चित्रकारी में इन्ही प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया है . मोहनजोदडो और हडप्पा में खुदाई में सिन्धु घाटी की सभ्यता में जो जो चीजें मिलीं खास कर मुर्तियां और बर्तन तथा कपडे जिन पर रंगाई की गयी थी , इसमें विषेशज्ञों का कहना है कि लाल रंग मजिश्ळा की जड से बनाया गया था . हजारों साल तक यही मजीळ की जड और वक्कम वृक्ष की छाल लाल रंग की स्रोत रही है . पीपल , गूलर और पाकड जैसे वृक्षों पर लगने वाली लाख की कृमियों से महाउर रंग बनाया जाता था और पीला रंग सिन्दूर हल्दी से तैयार कियाा जाता था.धीरे- धीरे प्राकृतिक रंगो को तैयार करने के लिये दुसरे साधनों का प्रयोग किया जाने लगा.टेसू के फूलों से पीला और नारंगी रंग तैयार किया जाता था और लाल रंग अनाार के छिलकों तथा गुलाब की पंखुडियों कओ उबाल कर तैयार किया जाता था . इसी प्रकार नीला रंग नील के फल से तथा हरा रंग पिपरमिन्ट ,धनियंा,पालक तथा सूखी मेंहदी से तैयार किया जाता था तथा बैगनी रंग षलजम और प्याज से और भूरा रंग कत्थे से तैयार होता था. रंगो की विकास यात्रा का लम्बा इतिहास है .पष्चिमी दुनियां में हुई औद्योगिक क्रान्ति के बाद कपडा उद्योग का तेजी से विकास हुआ ओर उसी के तहत रसायनिक रंगों का उत्पादन षुरू हुआ . संयोगवष 1856 में तैयार हुए रंग को मोव कहा गया . आगे चलकर 1860 में रानी रंग,1862 में एनलोन नील और काला ,1865 में बिस्माई भूरा,1880 में सूती काला रंग अस्तित्व में आया.जर्मन रसायन षस्त्री एडोल्फ फोन ने कृतिम नील के विकास का अपने हाथों में लिया. मुम्बई में सबसे पहले रंग का काम करने वाली कामराज नामक कम्पनी नें 1867 में आनी रंग का आयात किया था . 1872 में जर्मनी से रंग बिक्रेताओं का एलजिरिन नामक एक दल भारत आया था.प्राकृतिक रंगों की अपेक्षा रसायनिक रंग काफी सस्ते थे और आसानी से उपलब्ध हो जाते थे, इसलिए ये आसानी से चलन में आ गये .
रंग मन के सभी स्तरों को भेद देते हैं , रंगों की अपनी भाशा होई है और उनका अपना अलग- अलग तथा सामूहिक दोनो महत्व हैं . वारिष में इन्द्रधनुश हमें खुषी और तजगी का एहसास कराता है. हर रंग में ताजगी और स्फूर्ति होती है. रंगों का असर हमारे तन मन के साथ बुध्दि और भावनाओं पार भी असर डालते हैं. एक ही रंग के अनेक प्रभाव होते हैं- जैसे लाल रंग में प्रसन्नता,उल्लास,उत्तेजना,क्रोध और उश्णता का प्रबाव होता है. यह भी अजब बात है एक ही रंग अलग- अलग भाव संजोये रहता है. इसका मुख्य कारण रंगों की रंगत संघनता है और साथ ही हमारी द्दश्टि तथा वैयक्तिक ग्रहणता पर भी निर्भर् करता है. रंगों द्वारा मानवीय भावनाओं पर पडने प्रभाव का महत्व उल्लेखनीय है. एक षोध के अनुसार इंसानी आंखे सात मिलियन रौगों में भेद् कर सकती हैं और हर रंग हम पर असर डालता है. हर रंग में कुछ अर्थ छुपा होता है. अगर हमें अपने भ्ाव व्यक्त करने हैं य किसि को कुछ उपहार देना है इसमें रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. रंगों की अपनी गुप्त ऊर्जा होती है जो गतिशीलता प्रदान करने के साथ साथ हमारे विचारों और भावनाओं को
व्यक्त करने में अहम रोल अदा करते हैं .ख़ुशी और दुःख को फूलों के अलग अलग रंगों से व्यक्त किया जाता है .हमारे संसार शायद ही कोई ऐसा पहलू हो जो रंगों के जादू से मुक्त हो .
हर सभ्यता ने रंगों को अपने लिहाज से गढ़ा है और उन्हें मुलभूत रंगों से जोड़ कर देखा है .
चिकित्सा के क्षेत्र में कलर थिरेपी का बड़ा महत्व है . जीवन में ज्ञान ,प्रेम ,उल्लास ,शक्ति
आदि सभी में रंगों कि अहमियत साफ झलकती है .रंगों कि दुनिया का अपना मनोविज्ञान है . सचमुच जीवन में रंगों का कोई विकल्प नहीं है .रंगों के बिना हम और हमारी दुनिया बेरंग है .रंगों के त्यौहार होली में रंगों कि बात ना हो यह कैसे हो सकता है .
फुले ढेर पलाश तो लगा होली है
मचने लगा धमाल तो लगा होली है
गोरी हुई उदास तो लगा होली है
पलको पर सजी आस तो लगा होली है



--
Regards,

Bhagwan Swaroop Katiyar
2, Manas Nagar, Jiamau
Lucknow
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