Sunday 13 December 2015

                                           अधिग्रहण
                                                                                                 भगवान स्वरूप कटियार
              हम अधिग्रहित करना चाह्ते हैं
              तुम्हारे घर- द्वार और खेत- खलिहान
              ताकि भेज सकें तुम्हें
              शहरों में
              सस्ते मजदूरों के रूप में |
              

             हमने सस्ते मजदूर और सस्ती जमीन
             देने का वादा जो किया है
             देश- दुनिया के कारोबारियों से|

            तुम्हारे खेतों में
            लहलहायें गे अब औद्योगिक गलियारे
            दौड़ेगीं बुलट रेलगाड़ियाँ
            और गूंजेगे मुनाफा कमाते
                       अडानी-अम्बानी के
            हंसी के ठहाके
            जो देश की ख़ुशहाली
            और तरक्की के सूचकांक हैं|

            हाँ कुछ किसान उखड़ेंगे
                      अपनी जमीन से
           पर वे बचेंगे दैवी आपदाओं की मार से
           और रुकेंगी आत्महत्याएँ भी
           जो हमारी सरकार के लिए
           बदनामी और परेशानी का सबब हैं|
         
           हम देश की नदियाँ और जंगल भी
           अधिग्रहित करना चाहते हैं                                       
           ताकि देश की प्यास बुझाने में                                                
           कमा सके मुनाफ़ा
           देशी-विदेशी कम्पनियाँ                            
           और लूट सकें
           धरती की गर्भ में दबे
           अनमोल रत्न |
          
           हम ब्रांडिंग और मारकेटिंग के
           अनुभवी सौदागर हैं
           देश का चुनाव ही
           हमने जीता है                                      
          अपनी इसी हुनर के बूते |

          सबका साथ सबका विकास
          की सीडी से
          हम छू रहे हैं
          कमयाबी की ऊचईयां|
        
         हमनें विचारों और महपुरुषों का भी
         अधिग्रहण शुरू कर दिया है
         हमने गाँधी को स्वच्छ्ता के
         प्रतीक के रुप में अधिग्रहित किया
         कहते रहो हमें गाँधी का हत्यारा
         कौन सुनेगा तुम्हारी?

        हमने लौह पुरुष को
        अधिग्रहित किया
        एक भव्य लौह प्रतिमा बनवा कर
        नेताजी के परिजन भी हमारे करीब हैं
        अम्बेडकर कों भी हम अधिग्रहित कर रहे हैं
        उनके कई बड़े चेले हमारी झोली में हैं |

        भगत सिंह पर भी
        हमने फेंक दिया है वैचारिक जाल |

       अब तो प्रेमचन्द और मुक्तबोध भी
       हमारे ही होंगे
       सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में|

       हमारे पास दिखाने को
      ५६ इन्च का सीना है      
      और जनता से झूठ बोल कर
      ठगने की कला भी
      दुनिया भर में फेरी लगा कर
      देश को सस्ते से सस्ता
      बेचने का जादुई हुनर भी
      है हमारे पास |

     देश को  विकास की ऊंचाईयों पर
     ले जाने का एक ही उपाय है
     जल,जंगल जमीन का अधिग्रहण
     बिना किसी रोक-टोक के|



                   
          





             
             


                           आतंकवाद का अर्थशास्त्र
                                              भगवान स्वरूप कटियार
    दुनियां आज जिन दो गम्भीर संकटों से जूझ रही है वे हैं आतंकवाद और जलवायु संकट | ये दोनों संकट अमेरिका जैसे विकसित देशों की वर्चस्ववादी और मुनाफे और लालच की प्रव्रत्ति ने पैदा किये हैं जिससे सम्पूर्ण मानव जाति और पृथ्वी के विनाश का खतरा पैदा हो गया है |दुःख की बात यह है कि पेरिस में हुए बर्बर आतंकी हमले के बावजूद दुनियां के अमीर देशों के राष्ट्राध्यक्ष न तो आतंकवाद के कारणों के मूल में जा रहे हैं और न ही जलवायु संकट के मूल में | जबकि यह समय है कि हम राष्ट्रगत स्वार्थों से ऊपर उठ कर पृथ्वी और सम्पूर्ण मानवजाति को बचाने की सोचें वरना हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा |दुनियां में लालच और मुनाफे की अर्थव्यवस्था ने ही ये दोनों संकट पैदा किये हैं |इन दोनों गम्भीर संकटों के पीछे है कार्पोरेट पूंजी जिसका सिर्फ और और सिर्फ उद्देश्य है मुनाफा और पूरी पृथ्वी पर बिना रोक टोक एकछत्र राज | आज के दौर में  यह कार्पोरेट पूंजी ही दुनियाँ भर की राज्य व्यवस्थाएं संचालित कर रही है | इतना ही नहीं यह आवारा कार्पोरेट पूंजी युध्द भी पैदा करती है ताकि हथियारों का कारोबार फले-फूले |यह अवारा पूंजी मादक पदार्थों का उत्पादन कर नशे का कारोबार फैला कर समाज को बीमार भी करती है|जिस दुनियाँ में हम रह रहे हैं उसकी दिशा तय करते हैं दुनियाँ के पांच बड़े विकसित देश जिनके नाम हैं अमेरिका,फ़्रांस,जर्मनी,रूस,चीन और इंग्लैण्ड | हैरत अंगेज बात यह है ये देश हथियारों का जखीरा पैदा करते हैं और गरीब अविकसित देशों को बेंच कर अकूत मुनाफा कमाते हैं और गरीब देशों को आपस में लड़ाते हैं|हथियार उत्पादक ये देश कभी नहीं चाहते कि यह दुनिया युध्द और आतंक से मुक्त हो ताकि उनका हथियार कारोबार फलता –फूलता रहे | हथियार कारोबार के इस मनुष्य विरोधी काम में अमेरिका की मार्टिन लौकहीड कंपनी जैसी  दुनिया की सौ बड़ी कंपनिया लगी हुई हैं जो मनुष्य उसकी रची सम्पूर्ण कायनात को ख़त्म कर देने की साजिश रच रहीं हैं | इस कारोबार में वैश्विक स्तर पर १.५ ट्रिलियन डालर  की पूंजी लगी है जो विश्व जी डी पी का २.७ फीसदी है | हथियार उत्पादक ये दबंग देश  चिल्लाते तब है जब  इन हथियारों का निशाना ये खुद बनने लगते हैं | सीरिया बरबाद हो ,इराक़ बरबाद हो, लीबिया बरबाद हो ,हिंदुस्तान –पाकिस्तान लड़ें तो इन हथियार उत्पादक दुनियाँ के दबंग देशों को कोई प्रोब्लम नहीं है बल्कि उसमें तो अमेरिका जैसा देश बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है |पर कोई उन्हें आंख न दिखाये |पर हथियार थमाने के बाद तो च्वाइस उसकी है जिसके हाँथ में हथियार है कि वह निशाना किसे बनाये |अराजकता और वर्चस्व की संस्कृति किसी नियम कानून से नहीं चलती है वह चलती है सनक और दुनियाँ को हथियाने की महत्वाकांक्षा से |इन हथियारों से ५ लाख निर्दोष नागरिक प्रति वर्ष मारे जाते हैं यानि १५०० नागरिक प्रति दिन यह है हमारी आधुनिक सभ्यता का क्रूरतम चेहरा | इतना ही नहीं लाखों लोग बेघर होकर शरणार्थी शिविरों में जाने को मजबूर होते हैं और देशों के आधारभूत ढांचे सडक ,पुल, स्कूल ,अस्पताल ,खेत –खलियान निस्तनाबुत हो जाते हैं जिन्हें खड़ा करने में देश का अकूत श्रम ,धन और समय लगा होता है |
     आंकडे बताते हैं कि हथियार उत्पादन का सबसे बड़ा सरगना अमेरिका है जो कुल हथियारों का ३५ फीसदी पैदा करता है |इसके बाद रूस जो १५ फीसदी पैदा करता है |इसके बाद जर्मनी जो ७.५फीसदी,इंग्लैण्ड ६.५ फीसदी और फ़्रांस ४ फीसदी हथियार पैदा करते हैं |मजाक की बात यह है की ये सभी देश संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद् के सदस्य हैं |कैसी बिडम्बना है दुनियाँ की सुरक्षा का ठेका लेने वालों से ही यह दुनियाँ असुरक्षित है |इन देशों में १२ अरब बुलेट्स,८७५ अरब गन्स और 0८ अरब लाईट वैपन बनते है |हथियारों के इस जखीरे को जाहिर है हथियार उत्पादक देश अपने लिए तो पैदा कर नहीं रहे हैं पर इनका उपभोग तो होना ही है तो जाहिर है की गरीब और अविकसित देशों की बर्बादी के लिए इनका इस्तेमाल होता है |हथियारों की तिजारत का अर्थशास्त्र और उसकी राजनीति समझे बगैर न तो हम आतंकवाद से निपट सकते हैं और न ही विश्व शान्ति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं | अब जरा देखें कि जी -20 के गठन के मनसूबे क्या हैं ?इसका गठन जब हुआ जब दुनियाँ मंदी के दौर से गुजर रही थी | मंदी से जूझ रहे विकसित देश जिनकी दुनियाँ में चौधराहट कायम है सोच रहे थे कि चीन और भारत के विशाल बाजारों के सहारे वे मंदी से उबर सकते हैं | इस संगठन के देशों में दुनियाँ की दो तिहाई आबादी रहती है और दुनिया की ८५ फीसदी अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं |इसमें दुनियाँ के बड़े विकसित देश और बड़े विकासशील देश भी शामिल हैं | पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के पिछलग्गू बन कर तो हम उनका ही हित साधें गे | ब्रिक्स जैसे संगठन जो तीसरी दुनियाँ के मुल्कों का प्रतिनिधित्व करता है एक वैकल्पिक मंच के रूप में इन चौधरी देशों की मुखालफत कर सकते हैं जो आतंकवाद के बढ़ावे के लिए ज़िम्मेदार हैं | इसी तरह जलवायु संकट के लिए भी यही विकसित देश ज़िम्मेदार हैं जो सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं | अगर २९ नवम्बर को पेरिस में होने वाले जलवायु सम्मलेन में  किसी कारगर नतीजे पर नहीं पहुंचे तो हमे जलवायु संकट के भयानक परिणामों से गुजरना होगा जिसमे तमाम देश तो अपना अस्तित्व ही गँवा बैठें गे |

    हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी गला फाड़ कर विदेशों में चिल्लाते फिरते हैं कि आतंकवाद को फिर से परिभाषित किये जाने की जरुरत है पर अपने ही देश में बिहार के चुनाव में गाय के पोस्टर लगवा कर चुनाव जीतने का दम भरते हैं | देश में फ़ैल रही असहिष्णुता पर वैज्ञानिकों और बुध्दजीवियों के प्रतिरोध को न वे संज्ञान लेते हैं और न ही उनसे बात करना पसंद करते हैं |इसके इतर उनकी पार्टी के सांसद और उनकी सरकार के मंत्री भड़काऊ बयान देकर देश में उन्माद का माहौल पैदा करते है जो खुद में अपने तरह की दहशतगर्दी ही है | पर हमारे बड़बोले प्रधान सेवक चुप्पी साधे रहते हैं |जो प्रधान मंत्री मँहगाई,भ्रष्टाचार और देश में फ़ैल रही असहिष्णुता पर देश से आँख न मिला पा रहा हो वह विदेशों में चीखता फिरता है कि न हम न आँख दिखा कर बात करेंगे और न ही आंख झुका कर बात करेंगे |हम आंख मिला कर बात करेंगे |पर मेरे भाई देश से तो आंख मिला कर बात करो ,उसकी बात सुनो और अपने लम्बे चौड़े वायदों को पूरा करने का देश की जनता को भरोसा तो दो |
     यह खुला सच है कि वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण  अपराध - जनित आय को दुनियाँ में कहीं भी लगाने की क्षमता बढ़ गयी है | इक्कीसवीं सदी में यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है जब एक बटन दबाने से धन का अवैध प्रवाह सीमा पार चला जाता है | हथियारों और गोला बारूद की तस्करी का आतंकवाद को बढ़ावा देने में अहम रोल है | ए के ४७ और ए के ५६ जैसे खतरनाक हथियार आतंकवादियों के पास इसी तस्करी के जरिये पहुँचते हैं | दुश्मन देश अपने शत्रु देश के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल खुलेआम करते हैं | पाकिस्तान इसका खुला उदहारण है और पाकिस्तान के पूर्व वजीरे आजम जनरल मुशर्रफ अपने बयानों इसका खुलासा भी कर चुके हैं | संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस आतंकवाद को रोकने की पहल कदमी की और करार पर तमाम देशों ने हस्ताक्षर भी किये पर नतीजा सिफर ही रहा | आतंकवाद के बढ़ावे में काले धन की भी अपनी भूमिका है क्योंकि काला धन काले कामों की प्रमुखता पर ही फलता फूलता है | सच बात यह है कि दुनिया भर आई एस की बढती ताकत अमेरिका और पश्चिमी देशों की गलत नीतियों का नतीजा है | गत दिनों ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर ने इराक़ जंग में भागीदारी के लिए इराक़ और पूरी  दुनियाँ से माफ़ी मांगी थी | यदि इराक़ युध्द न हुआ होता तो आज आई एस जैसा चरमपन्थी संगठन अस्तित्व में ही न आया होता | खुद अमेरिका ने ही दहशतगर्दी रोकने के नाम पर आतंकवादी संगठनों को शह दी | इराक़ युध्द के बाद अलकायदा से अलग होकर आई एस अस्तित्व में आया | मजबूत आर्थिक ढांचें और कुछ देशों की गुप चुप मदद से से ही आई एस दुनियाँ भर को चुनौती दे रहा है | रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने जिन ४० देशों द्वारा आई एस के फंडिंग की बात कही है उनमें सिर्फ मजहबी देश ही नहीं हैं बल्कि वे देश भी हैं जिनके अपने राजनीतिक और आर्थिक हित भी हैं | इंसानियत और अमन के दुश्मन आई एस को तभी ख़त्म किया जा सकता है जब उसकी आर्थिक जड़ों को समाप्त किया जाये | सबसे पहले उन देशों की लगाम कसनी होगी जो इनको आर्थिक इमदाद पहुंचा रहे हैं | इसके बाद तेल कुओं से उनका नियंत्रण छीनना होगा | आर्थिक रूप से कमजोर पड़ने पर इंसानियत का यह दुश्मन अपने घुटने टेकेगा |

अन्याय के प्रतिरोध में खड़ा एक जन कवि “रमाशंकर विद्रोही -भगवान स्वरूप कटियार

         अन्याय के प्रतिरोध में खड़ा एक जन कवि “रमाशंकर विद्रोही
                             भगवान स्वरूप कटियार
जब भी किसी /गरीब आदमी का /अपमान करती है /यह तुम्हारी दुनियाँ / तो मेरा जी करता है /कि मैं इस दुनियाँ को उठा कर पटक दूँ /इसका गूदा-गूदा छीट जाये / मजाक बना रखा है / तुमने आदमी की आबरू को | ........ ये हैं जन कवि रमाशंकर विद्रोही जो बिना किसी लाग-लपेट के गरीबों और मेहनतकशों के तरफदारी में बोलते हैं | विद्रोही का कहना है कि वे जनता के हुक्म से कविताएँ बुनते हैं | कलम और कागज से तो कबीर की तरह जैसे उनकी रंजिश है | जे एन यू में प्रवेश के समय सेमिनार में लिखित परचा प्रस्तुत करने पर अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हुए उनहोंने कहा कि परचा प्रस्तुत नहीं करेंगे उसकी जगह सीधे वक्तव्य देंगे | पर यह नियम के विरुध्द था जिसके कारण उनको एम ए एडमीशन तो नहीं मिल सका पर वे जे एन यू के परिवेश और कैम्पस में इस तरह रच बस गये कि लोग अब जे एन यू का विद्रोही की जगह विद्रोही की जे एन यू कह कर बुलाते हैं | उस दिन से विद्रोही ने कागज और कलम नहीं छुआ| पर जे एन यू के नोटिस बोर्डों पर विद्रोही के फोटो और कविताएँ इस तरह मिल जाएँगी मानों की कोई नई नोटिस हो | वे अपने को जे एन यू का नागरिक कहते थे और जे एन यू भी  अपने लाडले कवि से बेहद मोहब्बत करती थी | उनके निधन से जे एन यू में उपजा शोक और उनकी अन्तिम यात्रा में सड़कों पर उमड़ी भीड़ उनकी मकबूलियत की हकीकत बयां करती है | उनके खुद के शब्दों में विद्रोही एक तगड़ा कवि था |
           गरीब – अमीर , न्याय –अन्याय की इन दो दुनियाओं से अदावत और उनसे टकराने एवं संघर्ष करने का प्रखर स्वर उनकी कविताओं में साफ झलकता हैं | यह फक्कड़ और फकीराना अंदाज में बेख़ौफ़ जीने वाला कवि दिल्ली में अन्याय और शोषण के प्रतिरोध के हर जुलुस और संघर्ष में हाजिर मिलता था खास कर युवाओं और छात्रों के आन्दोलनों में | उनकी कविता इतिहास , मिथ और  वर्तमान सबसे निरंतर बहस करती | मोहन जोदड़ों की महान सभ्यता के विध्वंश से लेकर आज के बर्वर और रर्क्त पिपाशु अमेरिकन साम्राज्यवाद तक से उनकी अदावत है | विद्रोही जी ने जान बूझ कर सिर्फ वर्तमान ही नहीं बल्कि पूरे मनुष्य के इतिहास को अपने कविकर्म के विषय के रूप में सचेतन चुना है |मनुष्य की चेतना को कुंद कर देने वाले और गुलाम बनाने वाले तमाम विचारों, प्रव्रत्तियो और परम्पराओं से वे दुश्मनी ठाने हुए हैं | ईश्वर,खुदा और धर्म इन सबको वे शोषण का हथियार मानते हैं | वे अपनी कविता में गणेश ,चूहा , कच्छप , बराह , नरसिंह आदि तमाम मिथकों और अवतारों की अवधारणा से वे मुठभेड़ करते हैं | वे परम्परागत विश्वासों को उलटते हुए एक नयी दुनिया की तामीर के ख्वाब देखते हैं जहाँ न्याय और बराबरी के साथ –साथ बिचारों की भी आजादी हों | वे कविता में बतियाते हैं और कविता में ही रोते और गाते हैं, कविता में भाषण देते हैं ,कविता में ही गरियाते भी हैं | वे कविता में ही दुनिया को उलट देने की हुँकार भी भरते हैं | कविता विद्रोही की जीविका नहीं जिन्दगी थी और जनान्दोलन एवं मार्क्सवादी जीवन द्रष्टि उनकी पौष्टिक खुराक थी | वे जैसा जिए वैसा ही मारे भी एक सक्रिय और बहादुराना मृत्यु , मानो कोई मध्य कालीन संत शताब्दियाँ पार करके आधुनिक सभ्यता के जंगलों में आ निकले और उसकी सारी बिडम्बनाए और चोटें झेलते फक्कड़ मलंग बना हमारे समय से गुजर जाये कबीराना अन्दाज में अपनी मातृभाषा में अपना घर फूंकने के लिए ललकारते हुए |
                       रमाशंकर विद्रोही का जन्म ०३ दिसंबर १९५७ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के अइरी फिरोजपुर गांव में हुआ था |बचपन में  ही उनका विवाह श्री रामनारायन यादव और श्रीमती करमा देवी की पुत्री शांतिदेवी से हो गया | कहा जाता है कि शांतिदेवी पढने जाती थी और रमाशंकर भैंस चराते थे | शुरू में लोगों ने इसे एक बेमेल विवाह के रूप में देखा |पर  शान्ति देवी ने ही उन्हें पढाई –लिखाई के लिए प्रेरित किया | उन्होंने बी ए करने के बाद एल एल बी  में दाखिला लिया पर आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और नौकरी करने लगे | कुछ समय बाद नौकरी छोड़ कर १९८० में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में एम ए दाखिला लिया | वामपन्थी छात्र आन्दोलन के सम्पर्क में आये और उसके सक्रिय कार्य कर्ता बन गये | १९८३ में छात्र आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी ली और जे एन यू से निकाल दिये गये | निकाले जाने के बावजूद वे जे एन यू के नागरिक बन कर जिए | अब तो जे एन यू के विद्रोही या विद्रोही का जे एन यू में क्या सच है कह पाना मुश्किल | इतना परिचित और जाना बूझा लोकप्रिय नाम का शख्श विश्वविद्यालय में शायद ही कोई हो | छात्रों के बीच गहन लोकप्रियता के कारण ही जे एन यू प्रशासन उन्हें जे एन यू से बहार नहीं कर पाया | जनता का कवि होने का अभिमान था विद्रोही को | तभी तो वे अपनी कविता में कहते हैं ..मसीहाई में मेरा कोई यकीन नहीं है / और न मै मानत हूँ कि कोई मुझ से बड़ा है | साहित्य के नामवरों और तथा पूंजी और बाजार द्वारा श्रेष्ठता के तय किये पैमाने की उन्होंने कभी परवाह ही नहीं की | वे हरकारा कवि थे और जनता को जगाये रखना उनकी कविता का कार्यभार था | विद्रोही अपनी पत्नी शांतिदेवी के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने उन्हें निभाया | उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा | उन्होंने अपनी कविता की किताब नयी खेती शांतिदेवी को ही समर्पित की है | विद्रोही जैसे शख्श को निभाना शांतिदेवी के ही जिगर के बस की बात थी |
         वैसे विद्रोही की कविता की असली ताकत उसे सुनते हुए ही महसूस की जा सकती है | वे कविता लिखते नहीं कविता कहते हैं एक खास अन्दाज में एक सार्थक बयान के बतौर | स्त्री के दुःख और उत्पीड़न के प्रति जितनी गहरी संवेदना विद्रोही की कविताओं में मिलती है इतनी कहीं अन्यत्र नहीं मिलती है | विद्रोही की कविता के भुखाली हरवाहा ,कन्हई कहार, नूर मियां तथा नानी –दादी के अद्भुत चरित्र हैं जो आत्मीयता और जीवटता से भरे हैं | ऐसे ही लोगों से जो देश बनता है ,विद्रोही उसके कवि हैं | वे जनता के राष्ट्र के निर्माण की बेचैनी और फ़िक्र के कवि हैं | फ़िलहाल उन्हें अपना देश कालिंदी की तरह लगता है और सरकारें कालिया नाग की तरह जिससे देश को मुक्त कराना उनकी कविता का जरुरी कार्यभार है | विद्रोही को सुनना जनता के किसी कवि को सुनना मात्र नहीं है बल्कि खुद को सुनना है ,खुद को बचाना है |अपनी भीतर की जिद को मजबूत करना है | अपने भीतर उस इंसान को बचाये रखना है जो आजाद है ,जो समझौता नहीं करता ,जो कभी हारता नहीं और जो कभी मरता भी नहीं | विद्रोही को सुनना अपनी रगों में किसी आदिम और नैसगर्किक ज्वार के उमड़ने के अहसास को हासिल करने जैसा है|विद्रोही अपनी कविताओं में सहज न्यायबोध,सामाजिकता,मनुष्यता ,आजादी ,बराबरी ,इश्क,क़ुरबानी जैसे भावों के ऊपर जमी धूल को पोंछ कर हमको ही सौंपते हैं | विद्रोही पितृ सत्ता, धर्म सत्ता और राज्य सत्ता के हर छद्म दे वाकिफ हैं | परम्परा और आधुनिकता के मिथकों से आगाह हैं | औरत शीर्षक की कविता की आखिरी पक्तियों में वे कहते हैं ; 
         इतिहास की वह पहली औरत कौन थी / जिसे सबसे पहले जलाया गया ? यह मैं नहीं जनता / पर वो जो भी रही होगी/ मेरी माँ रही होगी / मेरी चिंता यह है / कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी? जिसे सबसे अंत में जलाया जायेगा / मैं नहीं जानता / लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी /और यह मै हरगिज नहीं होने दूंगा |
  विद्रोही के साथ चलना हर किसी के लिए आसान नहीं है ,उनकी कविता जिन लोगों के साथ है वे विद्रोही को पहचान रहे हैं और वे ही विद्रोही को जिन्दा रखेंगे अपने हौंसलों और अपने बुलंद इरादों में |



Wednesday 11 March 2015

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