Saturday, 7 May, 2011

पिता के पास लोरियां नहीं होती



भगवान स्वरूप कटियार
पिता,मोटे तने और गहरी जडों वाला
एक बृक्ष् होता है
एक विशाल बृक्ष
और मां होती है
उस बृक्ष की छाया
जिसके नीचे बच्चे
बनाते बिगाडते है
अपने घरौंदे .

पिता के पास
दो ऊंचे और मजबूत कंधे भी होते हैं
जिन पर चढ कर बच्चे
आसमान छूने के सपने देखते हैं.

पिता के पास एक चौडा और गहरा
सीना भी होता है
जिसमें जज्ब रखता है
वह अपने सारे दुख
चेहरे पर जाडे की धूप की तरह फैली
चिर मुस्कान के साथ .

पिता के दो मजबूत हांथ
छेनी और हथौडी की तरह
दिन -रात तरासते रहते हैं सपने
सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए.

इसके लिए वह अक्सर
वह अपनी जरूरतें
और यहां तक की अपने सपने भी
कर देता है मुल्तवी
और कई बार तो स्थगित भी.

पिता,भूत वर्तमान, और भविष्य
तीनों को एक साथ जीता है
भूत की स्मृतियां
वर्तमान का संघर्ष और बच्चों में भविश्य .



पिता की उंगली पकड कर
चलना सीखते बच्चे
एक दिन इतने बडे हो जाते हैं
कि भूल जाते हैं रिश्तों की संवेदना
और सडक , पुल और बीहड रास्तों में
उंगली पकड कर तय किया कळिन सफर .

बाहें डाल कर
बच्चे जब झूलते हैं
और भरते हैं किलकारियां
तब पूरी कायनात सिमट आती है उसकी बाहों में
इसी सुख पर पिता कुरबान करता है
अपनी पूरी जिन्दगी.

और इसी के लिए पिता
बहाता है पसीना ता जिन्दगी
ढोता है बोझा,खपता है फैक्ट्री में
पिसता है दफ्तर में
और बनता है बुनियाद का पत्थर
जिस पर तमीर होते हैं
बच्चों के सपने
पर फिर भी पिता के पास
बच्चों को बहलाने और सुलाने के लिए
लोरियां नहीं होती.

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