Thursday, 25 November, 2010

भूख का भविष्य -

भूख का भविष्य
- भगवान स्वरूप कटियार

दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा संकट उपजाऊ भूमि का लगातार रेगिस्तान में तब्दील होने का है। भारत जैसे विकासशील देश में सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हित में प्राकृतिक सम्पदा का अनाप-शनाप दोहन तथा कौढ़ियों के मोल उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण है। धरती के रेगिस्तान में तब्दील होने की इस प्रक्रिया ने बड़ी तेजी से और बड़े पैमाने पर चीन, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा भूमध्य सागर के अधिकांश देशों में, पश्चिम ऐशिया और उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के सभी देशों सहित भारत में भी चल रही है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई साम्राज्यों का अंत उनके रेगिस्तान में बदल जाने के कारण ही हुआ है। एक समय था जब मोरक्को, ट्यूनिशिया और अल्जीरिया जो आज वृक्षविहीन रेगिस्तान है रोमन साम्राज्य के गेहूँ उत्पादन के उपजाऊ क्षेत्र हुआ करते थे। किसी समय ईरान एक बड़ा साम्राज्य था। और आज उसका अधिकांश भाग रेगिस्तान है। सिकन्दर के अधीन ईरान एक विशाल साम्राज्य था। एशिया, अफ्रीका, ऑस्टेªलिया, न्यूजीलैण्ड और उत्तरी अमेरिका की धरती का सत् चूसने और खनिज सम्पदा के दोहन में ब्रिटिश, फ्रेंच और अन्य आधुनिक साम्राज्यों का बड़ा हाँथ रहा है। कीनिया, यूगाण्डा और यूथोपिया में ईमारती लकड़ी की कटाई से नील नदी का विशाल प्रवाह नष्ट हो गया है। पूरी दुनिया में उष्ण कटिबन्धीय जंगल 2 करोड़ हेक्टेयर प्रति वर्ष कट रहे हैं। अगर सिलसिला थमा नही ंतो 20-25 साल में उष्ण कटिबन्धीय जंगल समाप्त हो जायेंगे। जिससे पूरी दुनिया में खाद्यान्न, ऑक्सीजन और पानी का संकट गहरा जायेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन के अनुमानों के अनुसार दुनिया में प्रतिदिन भूखे रहने वाले लोगों की संख्या पिछले वर्ष एक अरब से बढ़कर सवा अरब हो गयी है। सन् 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ज्यादा हो जायेगी। ‘हमारी लुटी हुयी धरती’ (अवर प्लण्डर्ड प्लेनिट) नामक अपनी पुस्तक में फेयर फील्ड आस्बर्न ये अनुमान लगाते हैं कि सारे विश्व में चार अरब एकड़ भूमि खेती योग्य है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार पूरी दुनिया में कुल भूमि 33 अरब 17 करोड़ 60 लाख एकड़ है जिसमें कृषि योग्य 3 अरब 70 करोड़ भूमि है। एक अन्य आंकड़े जो पियरसन और होरिजन ने तैयार किये हैं के अनुसार पृथ्वी का कुल क्षेत्रफल 35 अरब 70 करोड़ एकड़ है जिसका 34 प्रतिशत भूभाग कृषि योग्य है जहाँ पर्याप्त वर्षा और गरमी होती है। इस प्रकार संसार भर में कुल 2.5 अरब से लेकर 4 अरब के बीच भूमि कृषि योग्य है। मनुष्य जलवायु तो बदल सकता है पर किसी भी सूरत में इससे अधिक खेती योग्य भूमि बनाना नामुमकिन है। इस उपजाऊ जमीन में 10-15 प्रतिशत भाग पटसन और तम्बाकू के उत्पादन के लिये प्रयोग किया जाता है। इन आंकड़ों से जाहिर है कि यदि वाणिज्य और व्यापार पूरी तरह आदर्श बन जाये जो मुमकिन दिखायी नहीं देता, खाद्यान्न ले जाने-लाने की ढुलाई और आयात-निर्यात पर प्रतिबन्ध न रहे तो पूरे संसार को बड़ी मुश्किल से भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है। जलवायु संकट को लेकर अर्न्तराष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं पर धरती के कटाव रोकने और उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगाने जैसे उपायों पर कारगर उपाय खोजने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रिपोर्ट का तकाजा है कि हम भविष्य के साधनों को नष्ट किये बिना वर्तमान की बुनियादी जरूरतों को पूरा करें। अगर कुछ करना है तो अभी करें वरना भविष्य बचेगा ही नहीं।
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने खाद्य सुरक्षा और जलवायु संकट को वर्तमान विश्व की बड़ी समस्यायें बताते हुये उन्हें परस्पर अन्तर सम्बन्धित बताया है। उन्होंने कहा कि दुनिया मंे आवश्यकता से अधिक भोजन है। इसके बावजूद एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं। सन् 2050 तक विश्व की आबादी नौ अरब से ज्यादा हो जायेगी अर्थात् आज से 2 अरब ज्यादा। प्रत्येक वर्ष 60 लाख बच्चे भुखमरी के शिकार होते हैं। खाद्य सुरक्षा जलवायु सुरक्षा के बिना सम्भव नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के भूमि रक्षा विभाग की ओर से प्रकाशित 7 हजार वर्षों में ‘भूमि की विजय’ नामक पुस्तक में लेखक डब्ल्यू सी लाडर मिल्क कहते हैं कि आधुनिक सभ्यता को उस तरह के लम्बे पतन और बरबादी से बचाना है तो समाज को शोषण की अर्थव्यवस्था से बाहर निकालकर संरक्षण की अर्थव्यवस्था को फिर से अपनाना होगा। यह सच है कि रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग और मशीनों की मदद से एक ही फसल की खेती करते रहने से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका और यूरोप में खाद्य पदार्थों का उत्पादन आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ाया गया है। मगर मूल नियन्त्रण, निर्यात नियन्त्रण और दूसरे सरकारी और आर्थिक हस्तक्षेपों के कारण यह अतिरिक्त उत्पादन आमतौर पर भूखी जनता तक नहीं पहुँचने दिया गया। जो लोग संसार की खाद्यान्न समस्य को हल करने के लिये विज्ञान पर निभर रहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि विज्ञान मानव के लोग, अहंकार, कल्पनाहीनता, मानसिक आलस्य, जड़ता या रूपये-पैसे और आर्थिक प्रक्रियाओं का अत्यधिक मूल्य आंकने की बुराई का इलाज नहीं कर सकता। जितनी तेजी से मानव जाति का मन और आदतें बदल रही हैं उतनी ही तेजी से या उससे भी ज्यादा तेजी से होने वाले धरती के कटाव के कारण हमारे अन्य उत्पादन के स्रोत भी नष्ट हो रहे हैं।
जलवायु का संतुलन बिगड़ने और प्राकृतिक संसाधनों के अकूत खजाने की तबाही के निकट आ जाने से अगर कुदरत ही खुदकुशी के लिये विवश कर दी जाती है, तो उसकी श्रेष्ठ रचना के रूप मंे मौजूद मनुष्य का बचना कैसे मुमकिन है? पर शायद यह सवाल एकतरफा है। हम ऐसे सवाल इसलिए पूछते हैं क्योंकि हमें कुदरत का अन्दाजा नहीं है। दरअसल यह आत्मआलोचना का समय है। वक्त रहते यदि हमनें अपने विकास मॉडलों को नई शक्ल नहीं दी तो बहुत कुछ भुगतना पड़ सकता है। दरअसल जो बात देखने-समझने लायक है, वह यह है कि हमारे दौर का पूँजीवादी तथा उत्तर पूँजीवादी विकास जिस अनुपात में कुदरत को खुदकुशी करने की ओर ढकेल रहा है उसी अनुपात में कुदरत भी मानव समाजों को आत्मघाती प्रवृत्तियों का शिकार बनाती है। इसके लिये कुदरत कसूरवार नहीं है। सारी जिम्मेदारी हमारी है। हम जो बोते हैं वही काटते हैं। हमारी विवशतायें, हमारी संस्कृतियाँ, हमारी चेतनायें हमारी कुदरत के साथ निरन्तर अर्न्तक्रिया करती हैं और जो कुछ कुदरत में घट रहा होता है, वह हमारे व्यवहारों-आचरणों में उतरता हुआ हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करता हुआ चलता है। इसे थोड़ा ठोस रूप में समझने के लिये हमें ध्यान देना होगा कि इस वक्त दुनिया भर में जो असंख्य वाहन लाखों सालों के जीवन रूपों के अवशेषों को डीजल-पेट्रोल के रूप में फूंकते हैं तथा हमारे रफ्तार से चलने की सुविधा बन रहे हैं, उनकी वहज से मानव जाति कुदरत की कितने बड़े पैमाने पर कर्जदार हो रही है। लाखों वर्षों में पैदा होते आये असंख्य प्राणियों के अवशेष हमारे काम आ रहे हैं। इ वजह से हम अपने पूर्वजों के प्रति कर्जदार हो रहे हैं, मगर उस अनुपात में हम उन्हें कुछ भी नहीं लौटा रहे हैं। इस वजह से हमारी संस्कृति हमें जीवनरूपों के प्रति और संवेदनशील और जिम्मेदार होने के मूल्य प्रदान नहीं कर रही है। हम न उतने पेड़ लगा रहे हैं और न ही उतने समुद्री जीवों को पनपने के हालात पैदा कर रहे हैं। और न ही हम अपने इतिहास और परम्पराओं के प्रति विनम्र और आभारी ही हैं जिसके कारण नया मूल्य रचने की हम शक्ति भी खोते जा रहे हैं। आज हालात यह है कि हम अपने खाते ही नहीं बल्कि उधारी तक की सम्भावनायें भी खर्च करते जा रहे हैं।
आत्मघाती विकास का यह मॉडल परजीवी विकास का मॉडल है। परजीवियों के लिये युद्ध और हिंसा एक सहज स्वीकृति मनोवृत्ति है। इसलिये कुदरत को तबाह करने वाली सभ्यता के पक्षधर, युद्धों में मानव जाति की सामुहिक बल लेने से कैसे हिचकिचा सकते हैं। परिजीवी विकास के इस मॉडल में मनुष्यों के कामयाब होने की शर्त भी वहीं है- दूसरों की कीमत पर अपना हित साधना। इसी का नाम प्रतिस्पर्धा है। सभी को एक-दूसरे के साथ तुलना की मनःस्थति में लाकर खड़ा कर दिया है। ‘आत्म सभ्य’ का अर्थ खो गया है। कुदरत खो जायगी तो मनुष्य आत्मा को भी खो देगा। परजीवी होने का यही मतलब है आत्मघाती जीवन शैली को जीवन का लक्षण समझ लेना क्या यह संयोगवश है कि मध्य एशिया के जो मूल अपनी उस कुदरत द्वारा संरक्षित तैल सम्पदा को बेंच-बेंच कर ही समृद्ध हुये हैं और जिन्होंने उस समृद्धि को आधार बनाकर इसी श्रम मूलक उत्पादन तंत्र का विकास कर अपने समाजों को रचनात्मक हो सकने की कोई नई सम्भावना नहीं दी है- उन्हीं देशों में मजहबी कट्टरतायें, आत्मघाती आतंकवाद की ओर ज्यादा रूख करती नजर आती हैं। सऊदी अरब के ओसामा और मिस्त्र के सईद कतुब या अल जवाहिरी जैसे लोगों की सोंच में क्या हमें वैसी ही अतीत जीवी भूगर्भीय आग और तादीकी दिखाई नहीं देती जिसमें लाखों वर्षों से तपते-तपते प्राणियों की देह सम्पदायें तैलीय जीवाश्मों में बदल जाती हैं। वह स्मृति-संपदा, अन्तःरूपांतर की कुंजी समेटे हुये हैं, इसलिए कुदरत उन्हें लाखों वर्षों तक महफूज रखती है। पर वह मृतकों की दुनिया का सच है। उसे जीवन और उसके भविष्य की कसौटी नहीं बनाया जा सकता।
कुदरती संसाधनों का समग्र खनन-दोहन मानव जाति के लिये बेहद खतरनाक है। मनुष्य कुदरत के निजाम को अपने हाँथों में ले सकने लायक कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह खुद प्रकृति पुत्र है। प्रकृति अपने खनिजों-जीवाष्मों को जीवन-चक्र चलाये रखने के लिये सम्भालती है। उनका जिस अनुपात में दोहन होगा, उसी अनुपात में जीवन-चक्र भी डगमगायेगा। खास बात यह है कि कुदरती संसाधनों की तबाही का मतलब है मनुष्य से उसके मनुष्य हो सकने की संभावना को छीन लेना। अभी हमने इस दिशा में गहराई से सोंचना नहीं किया है, लेकिन जल्द ही ये चिन्तायें हमें चारो ओर से घेरकर हमसे बहुत से नये और बड़े सवाल पूछने वाली हैं। बेलगाम बहुराष्ट्रीय पूँजीगत विकास और पहले से भी ज्यादा भयावह होता जाता आतंकवाद ये दोनों स्थानीय निवासियों की अपने कुदरती संसाधनों पर असल मिलकियत को खतरे में डाल रही हैं। हालांकि अभी दुनिया में संसाधनों के स्थानीय स्वामित्व वाले विचार को भावी इंकलाब का आधार नहीं बनाया गया है मगर इसका कोई विकल्प भी नहीं बचा है। पूँजीवाद, अचल सम्पत्ति पर निजी मिल्कियत को कानूनी अधिकार बनाने से जुड़कर विकास कर पाया था, नही ंतो लोग पूँजी के विकल्प में अपने आप को किसलिये झोंकते हैं? इसी का अगला चरण है स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय निवासियों के स्वामित्व का कानूनी अधिकार जो दुनिया को वास्तविक जन इंकलाब में ले जायेगा।

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