Saturday, 20 November, 2010

कोपेनहेगन के आइने में दुनिया का चेहरा

कोपेनहेगन के आइने में दुनिया का चेहरा
-भगवान स्वरूप कटियार
वरवर्तमान समय में धर्म मानव सभ्यता के विकास और प्रगति के मार्ग में एक बाधा की तरह दिख रहा है। धर्म जितना जोडता नहीं उतना तोड़ता है। बकौल कार्ल मार्क्स धर्म हृदय हीनों का हदय और आत्माहीनो की आत्मा था जो जनसाधारण के लिए अफीम साबित हुआ। धर्म का नैासर्गिक विकास हुआ है और उसकी व्यक्ति और समाज के जीवन में एक जगह बनी है जिसे नकारा नहीं जा सकता। गौतम बुद्ध और कबीर तक ने कई बार सनातन धर्म पर प्रश्न उठाये पर अंततः उनका भी दैवीकरण कर दिया गया और उनके विचार भी कर्मकाण्ड में खो गये इसलिए धर्म को एक गंभीर परिघटना की तरह समझने की जरूरत है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है यह सूत्र धर्म और ईश्वर पर भी लागू होता है। अपनी असमर्थता और आवश्यकताओं से निपटने के लिए धर्म का आर्विभाव हुआ। मार्क्स द्वारा धर्म की व्याख्या सबसे समीचीन लगती है, जिसके अनुसार धर्म भौतिकता और अध्यात्म दोनो का आधार है। मनुष्य धर्म का सृजन करता है, धर्म मनुष्य का नहीं। धर्म वस्तुत उस आदमी की चेतना है जो या तो अपने आप तक पहुंच नहीं पाया या जिसने अपने आप को खो दिया। यहां आदमी का अर्थ है आदमी की दुनिया राज्य और समाज। इसलिए धर्म के विरुद्ध संघर्ष परोक्षता उस दुनिया के विरुद्ध है जिसकी अध्यात्मिक सुगंध धर्म है। निश्चित ही धर्म का एक भौतिक पक्ष है और एक अध्यात्मिक, एक सैद्धांतिक और एक व्यवहारिक। एक सारभौमिक और एक स्थानीय, एक शाश्वत और एक परिवर्तनशील। एक शोषक और एक पोषक, अंततः एक सकारात्मक और एक नकरात्मक।
सभी धर्मो में एक निर्माता, पोषक और विध्वंसक की धारणा है। एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञता और सर्वव्यापी ईश्वर को धर्म का आधार माना ही जाता है। यह अलग बात है कि ईश्वर को सभी धर्मो में अपने-अपने ढंग से रचा और संजोया गया है। बौद्ध धर्म की एक शाखा में बुद्ध की मूर्तियां
-भगवान स्वरूप कटियार
अगर हम दुनिया को इस तरह समझें कि पूरी दुनिया एक बड़ी चादर के नीचे रहती है, जिसकी खींचतान के कारण उसके फटने से हर किसी को बगैर छत के होने का खतरा है। प्रकृत्ति के यही सारे संसाधन पूरी दुनिया के लोगों को एक होकर रहना सिखाते हैं और इसकी चेतावनी भी देते हैं कि जब भी हम प्रकृत्ति के साथ अपने निजी स्वार्थो को लेकर खिलवाड़ करेंगे तो हम सब नुकसान उठायेंगे। आज जलवायु और पर्यावरण संतुलन को लेकर जो पूरी दुनिया में कोहराम मचा है उसका मुख्य कारण यह है कि दुनिया के शक्तिशाली विकसित देश अपनी टेक्नोलोजी और उस टेक्नोलोजी के जरिए उत्सर्जित होने वाले कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों पर स्वयं नियंत्रण लगाने के बजाय भारत, चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं कि जनसंख्या में बड़े होने के नाते यही देश जलवायु और पर्यावरण बिगाड़ने में सबसे अधिक जिम्मेदार हैं और इसलिए इन देशों को ही गैसों और कार्बन के उत्सर्जनोे पर रोक लगानी चाहिए। जलवायु के बारे में अमेरिका का इरादा अच्छा नही है। उसने कह दिया है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय दायित्यों का निर्वाह करेगा, पर घरेलू कानून का रास्ता ही अपनायेगा। इससे साफ जाहिर है कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति उर्जा उपभोग का जो कानून है, उसमे वह किसी भी तरह की ढील देने को तैयार नही है। दुनिया की आबादी के पांच फीसदी लोग अमेरिका में रहते हैं, किन्तु अमेरिका वैश्विक हिस्से का 16 फीसदी कार्बन और गैसों का उत्सर्जन करता है, और वहां जितनी कटौती की बात की जा रही है वह नगण्य है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका अकेले ही वैश्विक उत्सर्जन के लिए 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार है और इसके बाद भी अमेरिका यदि यह सोचता है कि वह दुनिया के गरीबों पर जलवायु परिवर्तन के असर के बारे में सोच रहा है तो यह हास्यास्पद है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका अपने उत्सर्जन में जिस छोटी सी 17 प्रतिशत कटौती की बात कर रहा है, उसमें वह उत्सर्जन भी शामिल है जो विकासशील देशों से खरीदा जा रहा है। इसका लब्बोलुवाब यह है कि अमेरिका 2017 तक उत्सर्जन बढ़ाता रहेगा, जो एक निन्दनीय कदम है। इतनी भी कटौती अमेरिका तब करेगा जब चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे प्रदूषणकारी देश दुनिया के इस दरोगा को रियायत देने की इस योजना में इसका साथ देंगे। इसके अलावा सन् 2012 के बाद जलवायु व्यवस्था की कानूनी संरचना के लिए एक आस्ट्रेलियाई प्रस्ताव भी है। आस्ट्रेलिया एक ऐसा देश है जिसका कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन 1990 के बाद 40 प्रतिशत बढ़ा है। आस्ट्रेलिया- अमेरिका के साथ गठजोड़ का एक वफादार सैनिक है। इसलिए उसका कहना है कि सभी पक्षों को एकजुट करने वाले दायित्यों के आधार पर दुनिया को कोई समझौता करना चाहिए। आस्ट्रेलिया का यह प्रस्ताव एक तीर से दो शिकार करने वाला है। एक तरफ यह प्रस्ताव उसे क्योटा संधि से छुटकारा दिला देता है, जो पूरी दुनिया और अन्य देशों के बीच बेचैन करने वाला विभाजन पैदा करती है। क्योटा सन्धि के अनुसार औद्योगिक देश जो ऐतिहासिक और सामयिक तौर पर प्रदूषण का भारी उत्सर्जन करते हैं उन्हें पहले कार्यवाही करनी चाहिए। यह प्रस्ताव अमेरिका को भी साथ लेकर चलता है। ऐसे माहौल में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा कोपेनहेगन पहुंचकर जलवायु रक्षा के नायक बन सकते हैं। इसके लिए जी-77 को विभाजित कर एक और बड़े असहमत देश को साथ लाना है। जाहिर सी बात है वह देश भारत है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया हमारे भय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की पूरी ताकत लगा रहा है। यह भय अमीर देशों के बीच अलग-थलग पड़ने और हिकारत की नजर से देखने का है। एक ऐसी छवि बनायी जा रही है जैसे भारत जलवायु विरोधी हो, अथवा ऐसा समझा रहा है जैसे भारत जलवायु की सही व्याख्या ही न समझ पा रहा हो और इसीलिए शायद भारत हर बात पर न करता रहता है और समझौतों को होने से टालता रहता है।
भारत की आर्थिक गतिविधियों से कार्बन डाइआक्साइड और मीथेन जैसी गैसें सबसे अधिक मात्रा में उत्सर्जित होती हैं। यह गतिविधियां क्या हैं? कोयला और लकड़ी जलाना सबसे बड़ी गतिविधि है। कोयला हमारे औद्योगीकरण का मुख्य साधन ही नही, बल्कि हमारे बहुत से बिजली कारखानों का भी मुख्य चालक है। हमारे गांव में अब भी बिजली के अभाव में लकड़ी और घासफूस आदि ही उर्जा का òोत है। हमारी कुछ फसलों जैसे: धान से भी मीथेन हवा में चला जाता है। फिर हमारे जंगल लगातार कट रहे हैं और हमारे देश में वनों का आच्छादन पांच प्रतिशत से भी कम हो गया है। जंगल इन गैसों को सोखते हैं। इसलिए अमेरिका का आरोप है कि भारत और चीन सबसे अधिक पर्यावरण को बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। पलटकर देखें तो कहानी कुछ और है। भारत की आबादी अमेरिका से पांच गुने अधिक है, पर अमेरिका का क्षेत्रफल भारत से काफी अधिक है। हम जितनी कार्बन गैसें वातावरण में फेंकते हैं, उनका प्रति व्यक्ति अनुपात अमेरिका के प्रति व्यक्ति अनुपात का 20वां भाग है। अर्थात वातावरण को एक अमेरिकी एक भारतीय से बीस गुना अधिक प्रदूषित करता है। यही बात चीन पर भी लागू होती है। अमेरिका के मुकाबले पर्यावरण को प्रदूषित करने में चीन की भी जिम्मेदारी बहुत कम है। इस विसंगति का कारण अमेरिकी जीवन शैली है। उस जीवन शैली को बनाये रखने के लिए जो औद्येागिक और उर्जा तंत्र अमेरिका ने अपना रखा है उसमें गैसों का वायुमण्डल में फैलना आवश्यक है।
एक अमेरिकी एक भारतीय की तुलना में कई गुना बिजली खर्च करता है। भारत में तो अभी भी करोड़ों लोगों को बिजली का सुख नसीब ही नही है। अपनी जीवनशैली बदलने के लिए पश्चिमी दुनिया के विकसित देश तैयार नही हैं। वे कहते हैं कि इस पर कोई सौदा नही होगा। अब अमेरिका ने घोषणा की है कि वह सन् 2020 तक 17 प्रतिशत कटौती प्रदूषण उत्सर्जन में करेगा। इसमे भी पेंच है कि अमेरिका अपनी उर्जा की खपत में मामूली सी कटौती करेगा। लेकिन असल में वह कोयला और तेल आधारित उद्योगों में परमाणु उर्जा का इस्तेमाल बढ़ायेगा। इसके साथ ही वह रेफ्रिजेशन में नई टेक्नोलोजी का समावेश करेगा। सवाल यह है कि भारत यह सब क्यों नही कर सकता है? अगर हमें यही रास्ता अपनाना पड़े तो हमें कोयले और तेल आधारित गतिविधियेां को बदलने में खरबों डालर की लागत आयेगी। आखिर यह धन कहां से आये। इसीलिए भारत और अन्य विकासशील देश अमेरिका जैसे विकसित देशों से कह रहे हैं कि पश्चिम के देश हमें अपनी टेक्नोलोजी परिवर्तन के लिए आर्थिक सहायता करें या मुवावजा दें। वरना हमारा हò यह होगा कि हम महत्वपूर्ण विकास कार्यो को ठप कर चुपचाप बैठ जायें। कोपेनहेगेन सम्मेलन का मामला बस इतना ही है। यह सीधे-सीधे वर्चस्वशाली देश और विकासशील देशों के बीच एक वर्चस्व की मुठभेड़ है। एक सवाल और भी है कि यदि टेक्नोलोजी बदलने के लए पश्चिम के देश आश्वासन भी दे दें तो आर्थिक मदद देने के बाद भी टेक्नोलोजी कहां से आयेगी। मतलब साफ है कि उन्हीं पश्चिमी देशों से जहां से हमेशा विषाक्त करने वाली टेक्नोलोजी आती रही है।
यदि उसी आधुनिक और मंहगी टेक्नोलोजी का इस्तेमाल भारत भी करता है तो इस पर एक हजार खरब से अधिक का कारोबार होगा । अमेरिका से प्रस्तावित 10 अरब तथा यूरोपीय देशों से प्रस्तावित 100 अरब डालर की सहायता अगर मिल भी गयी तो उससे कई गुना पैसा पश्चिमी देशों के व्यापारियों की जेब में जायेगा, जो टेक्नोलोजी बेचते हैं। इसीलिए कोपेनहेगन में पश्चिमी देशें के व्यापारियों का जमावड़ा लगा हुआ है। कोपेनहेगन में आजकल वैसा ही माहौल है जैसे ओलम्पिक खेलों के दिनों में किसी महानगर में होता है। विश्व मीडिया, स्वयंसेवी संगठन, टेक्नोलोजी के खरीद-फरोख्त व्यापारी तथा तमाम देशों के प्रतिनिधि मण्डल कोपनेहेगन में जलवायु कान्फ्रेन्स को गरमाहट पहुंचा रहे हैं। पर्यावरण को बचाने और पृथ्वी के संरक्षण में सारी दुनिया का एक जैसा योगदान होना अपेक्षित है। यदि कोई देश यह कहे कि हमारा इससे कोई सरोकार नही है तो वह सम्पूर्ण मानव जीवन के प्रति अन्याय कर रहा है। भारत का कहना है कि सन् 2020 तक वह गैसों और कार्बन के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी लायेगा। पश्चिमी देश यदि चाहेंगे कि भारत के इस वादे को कानूनी जामा पहनाया जाये ताकि उस पर अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी रखी जा सके। चीन भी गैसों के उत्सर्जन को रोकने में लगातार प्रयास कर रहा है और उसने इसी उत्साह में अगले दस साल में 40 प्रतिशत उत्सर्जन की कटौती की घोषणा भी कर डाली है। भारत चाहता था कि चीन और भारत जनसंख्या की दृष्टि से जो दुनिया के दो बड़े देश हैं मिलकर गैसों और कार्बन के उत्सर्जन की कटौती की रणनीति तैयार कर संयुक्त घोषण करें। किन्तु चीन ने पहले घोषणा करके भारत को अकेला सोचने पर मजबूर कर दिया। कोपेनहेगन सम्मेलन में चीन का रुख क्या होगा, यह कहना आसान नही है। लेकिन भारत सहित सभी विकासशील देश यही चाहेंगे कि पश्चिमी देशों को यह अधिकार न मिले कि वे उनके विकास कार्यक्रमों की निगरानी रखें।
क्योटा समझौते के अनुसार गैसों और कार्बन के उत्सर्जन में अधिकांश कटौती पश्चिमी देशों को ही करने का प्राविधान था और यही वजह है कि अमेरिका सहित समस्त विकसित पश्चिमी देश क्योटा समझौते का विरोध कर रहे हैं। विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन नगण्य है, और वह भी उनकी आर्थिक स्थिति के कारण आधुनिक टेक्नोलोजी के अभाव में करना पड़ रहा है। जबकि पश्चिमी देश अपनी विलासितापूर्ण जिन्दगी जीने के लिए जिस मंहगी और आधुनिक टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, वही दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार है। इस सबके बावजूद भारत जैसे विकासशील देश अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों से मुकर नही सकते। ऐसा तो नही हो सकता कि सब कुछ दूसरे करें और फल हम खायें। इसलिए भारत जैसे देश को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा, क्योंकि समस्याएं हमारे यहां भी विकट हैं। शायद उन देशों से भी अधिक जहां तटवर्ती होने के कारण बढ़ते समुद्र तल से देशों को डूबने का खतरा है, वहीं भारत में सूखती नदियों और पिघलते ग्लेशियरों के कारण भारत के लिए जीवन-मरण का प्रश्न पैदा हो जायेगा। इसीलिए अमेरिकी मौसम परिवर्तन कार्यक्रम के अध्यक्ष भारतीय मूल के वीरभद्रन रामनाथन ने भारत को सलाह दी है कि भारत को जलवायु समस्या के हल के लिए एक महत्वपूर्ण कारक की भूमिका के लिए आगे आना चाहिए। इसी में उसकी भलाई है। अब देखना यह है कि दुनिया के तमाम देश मिलजुलकर बिगड़ते पर्यावरण और जलवायु संतुलन जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए कौन सी रणनीति अपनाते हैं? कोपेनहेगन, क्योटा समझौते से आगे निकलता है, यह सवाल भी अपनी जगह है?

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