Tuesday, 18 January, 2011

किसानो का ‘शोक गीत



भागवान स्वरुप कटियार


अब सब ;ह मान चुके हैं कि आजादी के बाद दे‘ा में ‘ाासन करने वालों की चमडी का सिर्फ रंÛ बदला है-‘ाो”ा.ा का दमन चक्र पुराने ढांचे मे$ न;े जुमलों के साथ ;थावत जारी है-संवै/ाानिक मूल्;ों को अनदेखा कर विकास के लि, Ûैरबरबरी को अनिवार्; मान लि;ा Û;ा है-दे‘ा के विकास की परि/िा से सात लाख Ûांवों को हांसि;े पर /ाकेल दि;ा Û;ा है-कृ”िा प्र/ाान भारत में जहां आज भी साळ फीसदी जनता का जीवन खेती पर निर्भर् है वहां खेती किसानी को अकु‘ाल श्रम की श्रे.ाी मे रखा Û;ा है-खेती किसानी में आज भी 30-40 रुप;े रोज है जबकि छळे वेतन आ;ोÛ के बाद सा/ार.ा् कर्मचारी 400 रुप;े रोज का हकदार है-सन 1948 में सं;ुक्त रा”ट्र ?ाो”ा.ाा प= में कहा Û;ा था कि मेहनत की हकदारी इतनी तो होनी चाहि, कि मेहनतक‘ा और उसके परिवार का अच्छी तरह भर.ा-पो”ा.ा हो स्अके-पर उसी वर्”ा बने भारत के न्;ुनतम मजदुरी अ/िानि;म और बाद में भारती; संवि/ाान के अनुच्छेद 43 मे$ मेहनतक‘ा का जिक्र तो है लेकिन परिवार नदारद है- रा”ट्री; नमूना सर्वे{ा.ा के अनुसार ग्रामी.ा परिवाार में औसतन पांच सदस्; माने Û;े हैं लेकिन हमारी सारकार चार सदस्;ों को परिवार में ‘ाामिल करता है और उसमें भी दो बच्चों को ,क व;स्क मान कर तीन व;स्क सदस्;ों को ,क परिवर मान है-श्रम के मूल्; को निरन्तर दबा कर रखने के कार.ा खेती-किसानी ?ााटे का सौदा बानती Û;ी ।खेती लÛातार ?ााटे का सौदा होते जाने के कार.ा किसान कर्ज मे$ डूबते चले Û;े और आत्महत्;ा के कÛार पर पहुंच Û;े अब तक भरत में तीन लाख से ज्;ादा किसान आत्महत्;ा कर चुके हैं-दुनि;ां के किसी भी दे‘ा में किसानों ने इतनी आत्महत्;ा,ं नहीं की है$- दुनि;ां के सबसे बडे लोकतं= को ‘ार्म‘ाार करता है-खेती-किसानी के लि, कार्ज के कानूनों के तहत उस पर चक्रवृ/िद ब्;ाज नहीं लÛ सकता है -पर इस बात की जानकारी बहुत कम लोÛों को है और किसान लÛातार चक्रबृ/िद ब्;ाज के दलदल मे फंसा हुआ है-इतना ही नहीं केन्द्र सरकार ने 1984 मे$ कम्पनी अ/िानि;म में संसो/ान कर ,क न;ी /ाार और जोड दी जिसके तहत किसान कर्ज की ‘ार्तों् को अदालत में चुनौती नही दे सकता रा“ट्री; कृ“िा नीति के तहत सन 2000 में खेती को ?ााटे का सौदा बता;ा ेंÛ;ा जबकि दे‘ा की अ/िाकां‘ा जनता की अजीविका कृ“िा पर निर्भर् है-कुल सकल ?ारेलू उत्पाद में कृ“िा {ो= का ;ोग्दान कुल अळारह फीसदी है जबकि 60 फीसदी जनता कृ“िा पर निर्भर है- कृ“िा {ो= और Ûैरकृ“िा {ो= में प्रति व्;क्ति आ; के बीच बडी असमानता है- बिदम्बना ;ह कि खेती को ?ााटे का सौदा मानने के बाबजूद नीति निर्/ाार.ा मेंइसकी अनदेखी की Û;ी- कहना Ûलत न होÛा कि किसान को लÛातार Ûरीब बना;े रखने की साजि‘ा सरकारों }ार की जाती रही है-खेती किसानी के मामले में आजदी के तुरंन्त बाद से ही तात्कालिक राह्त की राजनीत चल रही है-उनके श्रम और तकनीकी कौ‘ाल का अवमूल्;न कर उनका Ûौरव चूर कि;ा और फिर उसे खैरात का मुरीद बना दि;ा-इसी का नमूना है कि किसान के बच्चों को स्कूल में मिड डे मील के नाम पर कटोरा ले कर खडा कर दि;ा जाता है और उनके भीतर् त्‘ाुरू से खैरात पर पलने वाले बो/ा को रोपा जा रहा है-दे‘ा का ख;ा पि;ा अ?ाा;ा वर्Û् अपनी नजर मे$ं किसान की छवि हमे‘ाा ;ाचक् की रखता है-भारात की अपे{ा अन्; दे‘ाों में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी बहुत अ/िाक है-भारत में प्रति किसान सब्सिडी 66 डलर है जबकि जापान में 26हजार् डालर, अमेरिका में 21 हजार डालर् और ;ूरोपी; दे‘ाों में 11 हजार डालर है- सरकारी आंकडों के मुताबिक 1947 में सकल रा“ट्री; आ; में खेती का हिस्सा 67 फीसदी था जो ?ाट् कर वर्तमान् मे$ 18 फीसदी रह Û;ा है-

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