Saturday 8 January 2011

एक रोशनी जिसके उजाले में हमें जीना है

जिंदगी की सारी जद्दोजहद ख़ुशी हासिल करने की होती है |आखिर क्या है ख़ुशी ,यह कहाँ रहती है | यह तो वैज्ञानिक अनुसंधानों और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हो चूका है की ख़ुशी वहां नहीं है जहाँ हमतलाशाते हैं |खास कर धनदौलत और सत्ता केन्द्रों में तो बिलकुल नहीं है |ख़ुशी रहती है प्रगाढ़ आत्मीय संबंधों में |नए साल पर हमारी एक ही चाह है इक हम आप सब खुश रहें | बचपन में जब हम बहुत छोटे थे न कोई धन की चाह थी और न ही वर्चस्व और मान सम्मान की भूख थी ,बस पेट भराकोईस्मानीतकलीफ नहीं तो खुशहै |हमने अपने बचपन का स्वाभाव खो दिया है और उस संसारिकता में डूब गए हैं जहाँ दुःख ही दुःख है जब कीमनुष्य के आलावा दुनिया के अन्य प्राणियों ने अपना वह स्वाभाव नहीं छोड़ा और वे हम से ज्यादा खुश है |यह कहाजा सकता है कि मनुष्य ने जितनी तरक्की कि है उतनी अन्य प्राणियों ने नहीं कि है पर किस कीमत पर |मनुष्यता को खो कर |पशुओं में हत्याएं ,बलात्कार और लूट जैसे अपराध नहीं होते |मनुष्यता को बचाने के लिए पशुओं क़ी नैतिकता उधर लेनी होगी |

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