Friday, 16 September, 2011

जन आन्दोलन बनाम संसद


भगवान स्वरूप कटियार
यह कैसी बिडम्बना है कि जनता के द्वारा चुनी हुई संसद और सांसद जन आकांक्षा ( पीपुल विल ) पर सवाल खड़ा कर रहे हैं जब कि जन आकांक्षाओं का मन्दिर कही जाने वाली संसद आज स्वयं सवालों के घेरे में हैं . सारी परेशानी तब शुरू होती है जब लोग अपने निर्धारित दयित्यों से हट कर अपने स्वार्थगत कार्यों में लिप्त हो जाते हैं तब राजनीत, जनसरोकारों और जनकल्याणकारी कार्यों से अलग हटकर सीधे भ्रष्टाचार और लूट का अड्डा बन जाती है . ऐसे में चुनी हुई सरकारें और संसद जो राज्य के महत्वपूर्ण अंग हैं बेमानी और बोझ सबित होने लगते है़ं . तब जन आन्दोलन ही एक ऐसा पवित्र और धारदार हथियार ही विाक्ल्प के रूप में बचता है जिसे जनता अजमाती है जिससे भ्रश्ट राज्य व्यवस्था घबड़ाकर या तो जनता की नब्ज को पढ़ कर अपने को ठीक कर लेती है या फिर जनता उस भ्रश्ट व्यवस्था को खत्म कर नयी व्यवस्था की संरचना करती है . देष के वर्तमान हालात कुछ इसी ओर इसारा करते हैं . आज अंग्रेजी बोलने वाले केन्द्रीय मंत्री चिदम्बरम,कपिल सिब्बल,सलमान खुर्शीद,और स्वयं मनमोहन सिंह यह भूल जाते हैं कि अंग्रेजी में बोला हुआ झूठ , झूठ ही रहता है , अंग्रेजी में बोले जाने के कारण वह ्सच नहीं हो जाता . इस देश की जनता को षुरू से ही सन्देह् था कि सरकार की नियत किसी सख्त और कारगर लोकपाल बिल लाने की नहीं है . जन्तर - मन्तर पर दो महीने पहले अन्ना जी के समर्थकों का जन सैलाब देख कर सिर्फ इसे कुछ समय के लिए टालने और आन्दोलन की गति को कमजोर करने के लिए सरकार की ओर से ज्वाइन्ट ड्राफ्टिंग कमेटी का नाटक किया गया और सरकार ने सोचा शायद वह सिविल सोसाइटी के सदस्यों को अपनी चालाकी से डील करलेजायेंगे और नहीं तो जनान्दोलन की हवा तो निकल ही जायेगी क्योंकि इन कारपोरेट मिनिस्टर्स में अपनी डीलिंग क्षमता पर बड़ा भरोसा रहता है. सरकार के गले जनलोकपाल बिल का मसविदा नहीं उतरा . बेहतर होता सरकार संसद के पटल पर वायदे के मुताबिक दोनों ड्राफ्ट रख देती और संसद जिसे स्वीकार करना चाहती करती . यह भी अपनी तरह का एक नया प्रयोग होता .पर भ्रश्ट और नियत की खोटी सरकार ईमानदारी से बहुत घबड़ाती है और शायद इसीलिए सरकार ने बिना हाथ पैर और आंख दांत वाला लोकपाल बिल पेष कर अपना वादा निभाने की वाहवाही लूटने का नाटक किया . इस चालाक सरकार के मंत्रियों को यह नहीं पता कि इस देष की परिपक्व जनता उनकी हर चालाकी को भलीभांति जानती और समझती और वक्त आने पर उसका कड़ा जबाब भी देती है . आष्चर्य है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार दुनिया भर में चल रहे जन आन्दोलनों की इबारत को नहीं पढ़ पा रही है . ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया में जो कुछ घटा क्या उससे सबक लेते हुए जन आंकाक्षा का सम्मान नहीं किया जाना चाहिया था . अगर मौजूदा केन्द्र सरकार प्रस्तावित जनलोकपाल बिल संसद से पारित करा देती तो सरकार, संसद और स्वयं प्रधानमंत्री का मान बढ़ता . पर ईमानदार प्रधानमंत्री, बेईमान मंत्रियों और बेईमान सांसदों के दबाव में अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा सके.
संसद की संप्रभुता और उसकी गरिमा का ढिढोरा पीटने वाले षायद यह भूल रहे हैं कि संसद का स्रोत भी इस देष की जनता ही है और इसलिए यदि सांसद और सरकारें भ्रश्ट हो जायें तो उस पवित्र संसद में घुसे भ्रष्ट सांसदों की सफाई का काम भी जनता का ही है और यह जनान्दोलन उसी का प्रारूप है . देष की महान जनता अपनी महान संसद और पूरे संसदीय लोकतंत्र का बेहद सम्मान करती है . वह कभी संसद की सर्वोच्चता और संप्रभुता को चुनौती नहीं देती पर वह यह भी भलीभांति जानती और समझती है कि संविधान , सरकार ,संसद ,कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका यदि उसके गले का पत्थर बन गये हैं तो उन्हें उतार फेंकने में इस देश की जनता को कोई गुरेज नहीं है . संसद और सरकार की गरिमा को सबसे ज्यादा आहत तो सरकार में बैठे भ्रष्ट मंत्रियों और संसद में बैठे भ्रष्ट सांसदों ने किया है जहां कैश फौर वोट चलता है और अधिकाँश मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं . राज्य के उद्देश्य राज्य की अवधारणा में ही निहित हैं . जब यह कहा जाता है कि राज्य एक राजनैतिकरूप से संगठित लोगों की ऐसी संस्था है जो सामूहिक उद्देश्यों को पूरा करती हो और सामूहिक जनासंतोश के लिए काम करती है . इससे साफ जाहिर है कि किसी नागरिक को राजनैतिक होने के लिए किसी राजनैतिक दल की सदस्यता की जरूरत नहीं है .वह उसी तरह स्वाभाविकरूप से राजनैतिक व्यक्ति है जिस तरह वह स्वाभाविक रूप से सामाजिक व्यक्ति होता है और इसी के तहत वह सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों में समानरूप से भाग लेता है . उस लिहाज अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जनान्दोलन पूरी तरह और शुध्दरूप से राजनैतिक है पर राजनैतिक स्वार्थों से परे है .बिडम्बना यह है कि यहां उसी को राजनैतिक माना जाता है जो राजनैतिक स्वार्थों से युक्त् हों . राज्य की अवधारणा स्पश्टरूप से यह कहती है कि राज्य साध्य नहीं बल्कि जनता के हितों की पूर्ति का मह्त्वपूर्ण साधन है. साध्य तो जनता और उसके सामूहिक हित हैं और आगे राज्य के दायित्यों का निर्धारण करते हुए कहा गया है कि राज्य का दायित्व है कि वह राश्ट्रीय षक्ति विकसित करे , न्याय और कानून व्यवस्था कायम करे और जनता की सामाजिक आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करें और यदि राज्य इन उद्देश्यों को प्राप्त् करने में असफल है तो वह अस्तित्वहीन है . इस सन्दर्भ में एक बात एकदम स्पश्ट है कि कि राज्य के केन्द्र में जनता है और जनता ही राज्य का साध्य है तो फिर संप्रभुता और सर्वोच्चता जनता की ही हुई न कि जनता के हितों के लिए बनायी गयी संस्थाएं संसद ,विधायिका और न्यायपालिका आदि .ह्ां जनता भी इन संस्थाओं की विष्वसनीयता और गरिमा के लिए चिंतित है क्योंकि ये उसके सामूहिक हितों के महत्वपूर्ण साधन है और यह जनलोकपाल बिल इन संवैधानिक संस्थाओं को बचाये रखने और उनकी गरिमा के संरक्षण का कारगर समाधान है . आखिर क्या बात थी कि डा॰ अम्बेडकर ने स्वयं कहा था कि यदि संविधान लागू करने वालों की नियत में खोट है तो यह संविधन महज कागज का पुलिन्दा है और इसी के तह्त जब डा॰ अम्बेडकर हिन्दू कोड बिल लाये तो तत्कालीन सरकार को जनलोकपाल की तरह हजम नहीं हुआ और वे कानूनमंत्री पद से इस्तीफा देकर सरकार से अलग हो गये .हिन्दू्ू कोड बिल इस देष की हिन्दू महिलाओं को अधिकारसंपन्न बनाने का वह मह्त्वपूर्ण बिल था लेकिन तत्कालीन् सवर्णवादी सरकार को हिन्दू कोड बिल् उसी तरह हजम नहीं हुआ जिस प्रकार आज जनलोकपाल बिल वर्तमान भ्रश्ट केन्द्र सरकार और भ्रश्ट सांसदों को हजम नहीं हो रहा है .
सरकार और राजनैतिक दलों को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि कि महज लोकतंत्र के ढांचे को पकड़ कर बैठे रहने के दिन अब लद गये . अब जनता के प्रति व्यवस्था की जबाबदेही और लोकतंत्र मेॅ लोक की साझेदारी लगातार बढ़ाये जाने की जरूरत है.कोई संसद , न्यायपालिका ,व्यवस्थापिका लोक से बड़ी नहीं हो सकती . भारत का संविधान भी भारत की जनता ने ही बनाया है और खुद पर इसे लागू किया है ़ इसलिए अपनी अपनी मर्यादा में ये सभी सर्वोपरि हैं पर लोक यानी जनता जो सही अर्थों में देष है, से सर्वोपरि कोई नहीं है. संसद ,व्यवस्थापिका,न्यायपालिका और सरकार देश की व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग तो हैं पर स्वयं देश नहीं . देश तो सही अर्थों मे जनता ही है . इसलिए जनता की आवाज सांसदों के माध्यम से संसद में और संसद के बाहर जानान्दओलनों के माध्यम सरकार को सुननी ही होगी और उसके आशय को मूर्तिरूप भी देना होगा . सवालों की बाढ़ आयी है पर जबाबों का अकाल पड़ा है . अन्ना ह्जारे का आन्दोलन लोकतंत्र के विकास के पथ पर प्रशस्त है । सरकार ने यदि समझदारी से काम नहीं लिया तो सरकार और देष को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है ।

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