Monday 5 September 2011

व्यवस्था परिवर्तन बनाम चुनावी राजनीत

भगवान स्वरूप कटियार
मनुश्य हमेषा से बेहतर समाज और बेहतर सभ्यता के निर्माण और उसकी बेहतर आधार संरचना का हामी रहा है और उसके लिए निरंतर संघर्शरत भी रहा है . उसने जो कुछ गढ़ा और रचा ,कालान्तर में उसे ध्वस्त और नश्ट कर उससे बेहतर रचा और गढ़ा . यह प्रक्रिया आज भी जारी है और यही उसकी मुक्ति की आकांक्षा और पूर्णता प्राप्त करने की इच्छा का प्रतीक है . उसने जिन जीवन मूल्यों को जितनी सिद्दत से गढ़ा और रचा , वक़्त आने पर उन्हें उतनी सिद्दत से तोड़ा भी . दुनिया का पूरा इतिहास इसी प्रक्रिया की महागाथा है.हम जब ऐसा कर रहे होते हैं तब भी एक वर्ग इस ध्वस्तीकरण के विरुध्द खड़ा होकर उसे बचाने की कोषिष कर रहा होता है. जब साम्राज्यवाद की जड़ें दुनियां से उखाड़ी जारही थी तब भी उसे बचाने की हायतोबा मची थी . हर क्रान्ति के उद्देष्य ही उसकी विचारधारा बन जाते हैं और उनसे उसकी सैध्दांतिकी भी जन्म लेती है . फ्रांसीसी क्रान्ति निरंकुष राजतंत्र के खिलाफ समानता ,स्वतंत्रता और बन्धुत्व के उद्देष्य और आदर्ष लेकर घटित हुई . भले ही उसके आदर्ष पूर्ण रूप से धरती पर अभी तक फलित ना हुए हों पर जो हमें पसन्द नहीं था या जो हमारी सामूहिक खुषहाली के खिलाफ था उसे खत्म कर लोकतंत्रात्मक राजव्यवस्था का विकल्प स्थापित किया तबसे उसकी खामियों के हम विरुध्द निरंतर लड़ते आरहे है़ं . अन्ना के नेतृत्व में भ्रश्टाचार के विरुध्द उभरा यह जनान्दोलन उसी ओर इसारा करता है और इसे उसी सन्दर्भ में देखे जाने की जरूरत है . आजादी के पूरे लगभग २॰॰ वर्श के आन्दोलन में तमाम विचारधाराओं के बाबजूद देष की स्वतंत्रता के राश्ट्रीय मुद्दे पर सारा देष एकजुट और एकताबध्द होकर कांग्रेस के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन अपने लक्ष्य प्राप्त तक चलाता रहा .
अन्ना के आन्दोलन के भ्रश्टाचार के मुद्दे से किसी को असहमत नहीं है ना सरकार को और ना ही राजनेताओं को पर फिर भी विचारधारा और आन्दोलनों के संचालकों पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं . यह कैसी बिडंबना है जो कि संसदीय राजनीत और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि संसद और विधान सभाओं में बैठ कर जनता के हितों के साथ पूरे ६२ साल तक नाइंसाफी करते रहे ,संसद में बैठ कर असंसदीय जनविरोधी कारनामें करते रहे , देष को लूट कर अपना घर भरते रहे और देष को कंगाल कर अमीर बन कर काला धन विदेषों में जमा करते रहे तब देष की महान संसद की ना तो गरिमा आहत हुई और ना ही संवैधानिक नैतिकता और आचरण का उल्लघंन हुआ पर आज जब जनता अपने भ्रश्ट जनप्रतिनिधियों की आंख में उंगली डालकर अपने हकों और उनकी जिम्मेदारियों की याद दिला रही है और गला फाड़ कर पूरे सबूतों के साथ यह दावा कर रही कि सिर्फ तुमने और तुमने इस देष को बर्बादी के रसातल में पहुंचाया है जो कभी सोने की चिड़िया कहलाता था , तो संसद की दीवारों के पाये हिलने लगे और संविधान की पवित्रता पर आंच आने लगी . यह देष , इसकी संसद और संविधान उतना ही जनता का है जितना राजनेता इसे अपना समझते हैं बल्कि कई मायने में जनता का इन पर ज्यादा हक है क्योंकि जनता का खून पसीना ही इन सबकी बुनियाद में है. आज के दौर का सबसे बड़ा सवाल है कि यदि चुनी हुई संसद और विधान सभाएं तथा सरकारें जन विरोधी रुख अख्तियार करलें तो जनता को क्या करना चाहिए? एक बार मतदान करके वह ५ साल इंतजार करे और ५ साल बाद भी सत्ता परिवर्तन के नाम पर सिर्फ चेहरे बद्ले और कुछ ना बदले. ऐसे बदलाव से जनता को क्या हासिल होगा और अभी तक क्या हासिल हुआ , यह सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय विशय है . आज देष की पूरी राजनीत के लिए आत्ममंथन का दौर है कि आखिर जनता को यही सब झेलना था तो अंग्रेज क्या बुरे थे . जब अन्ना अपनी जमीनी भाशा में कहते हैं कि इन काले अंग्रेजों ने देष के षहीदों के बलिदान को भुला दिया और देष को लूट कर मिट्टी मे मिला दिया तब लालू प्रसाद जैसे नेता कहते हैं कि अन्ना को मेरे खिलाफ बोलने का किसने अधिकार दिया ,इनको किसने चुना आदि ?जनता द्वारा चुने हुए लोग जब जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी भुलाकर अपनी जबाबदेही से मुकरने लगते हैं तब जनता एकजुट संगठित होकर जनान्दोलन का रूप लेती है . जाति -धर्म में बंटे भारत जैसे देष ऐसा बहुत कम होता है और जब होता है तो उसके मायने होते हैं और असर भी . आन्दोलन का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण और संवेदनषील हो जाता है कि वह जनक्रोष और जनाकाक्षाओं की अभिव्यक्ति का सषक्त माध्यम बन जाता है . तब सारी विचारधाराएं और सिध्दान्त बेमानी लगने लगते हैं और आन्दोलन का मुद्दा ही विचारधारा की षक्ल लेलेता है . श्रीमती इन्दिरा गान्धी के खिलाफ चाहे जे॰पी॰ मूवमेन्ट हो या वी॰पी॰ सिंह का सोसल जस्टिस मूवमेन्ट ये सब स्वयं विचारधारा बन गये थे .
भ्रश्टाचार को लेकर अन्ना के नेतृत्व में उभरा अहिंसक जनान्दोलन की ध्वनि से साफ प्रकट होता है कि जनता व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन चाहती .वह अपने दुर्भाग्य या भाग्य के नाम पर दुर्व्याव्स्था को अब ढोना नहीं चाहती है. जनता के पास अपनी अपेक्षित जनाकांक्षाओं के अनुसार कल्पित व्यवस्था का पूरा खाका भी है और एजेन्डा भी.वह नेताओं के भरोसे अपने भाग्य को नहीं छोड़ना चाहती क्योंकि ६२ साल के दुनियां के सबसे बड़े परिपक्व लोकतंत्र को इतनी तमीज आगयी है कि वह अपनी जरूरत के कानून के विधेयक जनलोकपाल के रूप में पेष कर सकता है . जनता को अपने संविधान , अपनी संसद और व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका से कोई षिकायत नहीं है . षिकायत है तो सिर्फ इसमें बैठे भ्रश्ट लोगों से जिनके खिलाफ जनाक्रोष दिल्ली की संसद और सड़कों से लेकर पूरे देष की सड़कों पर दिखाई दिया .जनता अपनी संसद अपनी व्यवस्थापिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका का चेहरा बदलना चाहती है . वह चाहती है संसद में स्वच्च छवि के ईमानदार लोग पहुंचे और लोग जितने जिम्मेदार पदों पर हों उनकी उतनी ही जनता के प्रति जबाबदेही भी बने . यह कार्य चुनाव सुधारों तथा संसद के सत्रों के संचालन में कड़े और कारगर नियमों को बना कर किया जा सकता है . संसद की एक दिन की कार्यवाही पर प्रति दिन ६ करोड़ रुपये से अधिक खर्च होता जो जनता की घाड़ी कमाई का पैसा है . हम तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं , हमारी संसद को तो दुनियां की संसदीय व्यवस्था का रोलमाडल बनना चाहिए . पर होता ठीक इसके उलटा है . सीनिअर सांसद हमारी नयी पीढ़ी के आदर्ष नहीं बन पा रहे हैं . संसद के सत्रों में पूरे समय बैठना अनिवार्य किया जाय. लोग बोले भी और सुने भी . पूरी संसद देष की संसद के रूप संकुचित राजनैतिक हितों से ऊपर उठ कर व्यापक जनहितों के लिए काम करे . केवल मेजें थपथपा कर भत्ते और सांसदनिधि बढ़वाने की भूमिका में ही ना रहें . संसद और विधान सभाओं में गंभीर और सारगर्भित बातचीत हो जनता की सहमत से अच्छे कानून बने .देष के किसी भी कोने में अव्यवस्था हो संसद की निगाह वहां तक पहुंचे और सरकार को उसके निराकरण की हिदायत दे . संसद को देष में चल रही दोहरी षिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर गरीब अमीर के लिए एक जैसी समान षिक्षा व्यवस्था कायम करने की पहल करने की अगुवाई करनी चाहिऐ . निजी षिक्षण संस्थाएं व्यवसायिक अड्डे बन गयी है और चिकित्सा व्यवस्था भी गरीब अमीर दो खेमों में बंटी है इसे भी समाप्त करना होगा .मनरेगा की जगह राइट टू इम्प्ल्वायमेन्ट तथा एन एह आर एम की जगह राइट टू हैल्थ जैसे कानून लागू किये जांय तथा धन की कमी की पूर्ति विदेषों में जमंा काले धन की वापसी और भ्रश्टाचार समाप्त कर की जाय. इस तरह एक जनोन्मुख विकास माडल देष में लागू किया जाय जिससे भय भूख भ्रश्टाचार और अपराध अन्याय अत्याचार समाप्त हो सके और कर्जमुक्त आत्मनिर्भर देष का निर्माण हो सके . ऐसा ही सपना इस आन्दोलन की कोख में पल रहा है जिसके फलित होने का इंतजार इस देष और इस देष की महान जनता को है .

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