Friday 16 September 2011

मेरी चार प्रेम कविताएं


भगवान स्वरूप कटियार
( एक )
खौफ के साये में प्रेम
नीम के पेड़ के नीचे
रात के अंधेरे में
हम दोनों मिलते हें
बिना बोले, बिना छुए
हमारे मूक प्रेम संवाद का साक्षी
यह नीम का पेड़
और इसके नीचे पड़ी पीली-पीली पड़ी पत्तियां.
खौफ से थर्राये हैं
हमारे भूमिगत शब्द
और डरी हुई हैं
हमारी अतृप्त प्रेम भावनाएं
क्योंकि कुछ दिनों पहले
इसी पेड़ से लटका कर
एक प्रेमी युगल को
दी गयई थी फांसी
जब कि उनका मजहब एक था
सिर्फ जाति अलग थी |
( दो )

प्रेम
जानते हो हांथों की उंगलियों के बीच खाली जगह क्यों होती है ?
ताकि कोई दूसरा आये
और अपनी उंगलियों से उसे भर सके |
उंगलियों का कसाव
और उसकी गरमी ही वह भाषा है
जिसके जरिए
जिन्दगी करती है संवाद | |
विचार और तर्क की रोशनी में

इस खाली जगह का भरा जाना

एक बड़ी लड़ाई की अहम शुरुआत है |
( तीन )
मेरी आखों से
मैं पूरी तरह खत्म हो जाऊं गा
हां यह तय है
हां यकीनन मैं मर जाऊंगा |

मैं ना घास बनूंगा , ना फूल और ना ही कोई जीव
जिस्मानी तौर से मैं अस्तित्वहीन हो जांऊंगा .....
प्रकृति के चक्र में
कोई जगह नहीं होगी मेरी |
फिर क्या खुद को भुलावा देना
मेरी मिट्टी बचेगी ,मैं नहीं
यह सच है
और सच्चाई से
आंखें मिलानी चाहिए |
गुलमोहर के पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं होगा
मेरी कब्र पर
गुलमोहर के फूलों के सिवा |
तुम वहां आओगी कुछ सोचती हुई
कुछ पल रुकोगी मेरी कब्र के पास
जिसके भीतर कुछ नहीं है
और एक आंसू तुम्हारे चेहरे पर
ढलक जायेगा |
पर वह बच्चा जो मेरी कविता पढ़ रहा है मेरी आंखों से दुनियां को देखेगा |
( चार )
प्रेम का तर्क
कोई मुझ से ईष्वर और स्त्री और के बीच चुनाव करने को कहे
तो मैं स्त्री को चुनूंगा

क्यंकि स्त्री प्रेम है
और ईष्वर आस्था |
प्रेम आग की तरह गरम ऊर्जावन
और मौसम की तरह
उमंग से भरा
जबकि आस्था बर्फ की तरह ठंडी , निस्तेज पत्थर |
आस्था में तर्क से आंख मिलाने का साहस नहीं होता
जबकि प्रेम हर पल
जूझता है चुनौतियों से |
ईश्वर और स्त्री दो सामान्तर शक्तियां हैं
एक काल्पनिक और दूसरी स्थूल जीवन से भरी |
आस्था गाय - बैल हांकू
संस्कृति की संवाहक है
और प्रेम क्रान्ति का पर्याय्

एक बहकावे का सूचक दूसरी जीवन का माध्यम | भगवान स्वरूप कटियार ( एक ) खौफ के साये में प्रेम नीम के पेड़ के नीचे रात के अंधेरे में हम दोनों मिलते हैं. बिना बोले, बिना छुए हमारे मूक प्रेम संवाद का साक्षी है यह नीम का पेड़ और इसके नीचे पड़ी पीली-पीली पड़ी पत्तियां. खौफ से थर्राये हैं हमारे भूमिगत शब्द और डरी हुई हैं हमारी अतृप्त प्रेम भावनाएं ़ क्योंकि कुछ दिनों पहले इसी पेड़ से लटका कर एक प्रेमी युगल को दी गयई थी फांसी जब कि उनका मजहब एक था सिर्फ जाति अलग थी . ( दो ) प्रेम जानते हो हांथों की उंगलियों के बीच खाली जगह क्यों होती है ? ताकि कोई दूसरा आये और अपनी उंगलियों से उसे भर सके | उंगलियों का कसाव और उसकी गरमी ही वह भाषा है जिसके जरिए जिन्दगी करती है सँवाद | विचार और तर्क की रोशनी में इस खाली जगह का भरा जाना एक बड़ी लड़ाई की अहम शुरुआत है | ( तीन ) मेरी आखों से मैं पूरी तरह खत्म हो जाऊं गा हां यह तय है हां यकीनन मैं मर जाऊंगा | मैं ना घास बनूंगा , ना फूल और ना ही कोई जीव जिस्मानी तौर से मैं अस्तित्वहीन हो जांऊंगा ..... प्रकृति के चक्र में कोई जगह नहीं होगी मेरी | फिर क्या खुद को भुलावा देना मेरी मिट्टी बचेगी ,मैं नहीं यह सच है और सच्चाई से आंखें मिलानी चाहिए | गुलमोहर के पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं होगा मेरी कब्र पर गुलमोहर के फूलों के सिवा | तुम वहां आओगी कुछ सोचती हुई कुछ पल रुकोगी मेरी कब्र के पास जिसके भीतर कुछ नहीं है और एक आंसू तुम्हारे चेहरे पर ढलक जायेगा | पर वह बच्चा जो मेरी कविता पढ़ रहा है मेरी आंखों से दुनियां को देखेगा | ( चार ) प्रेम का तर्क कोई मुझ से ईश्वर और स्त्री और के बीच चुनाव करने को कहे तो मैं स्त्री को चुनूंगा | क्यंकि स्त्री प्रेम है और ईश्वर आस्था | प्रेम आग की तरह गरम ऊर्जावन और मौसम की तरह उमंग से भरा जबकि आस्था बर्फ की तरह ठंडी , निस्तेज पत्थर | आस्था में तर्क से आंख मिलाने का साहस नहीं होता जबकि प्रेम हर पल जूझता है चुनौतियों से . ईश्वर और स्त्री दो सामान्तर शक्तियां हैं एक काल्पनिक और दूसरी स्थूल जीवन से भरी | आस्था गाय - बैल हांकू संस्कृति की संवाहक है और प्रेम क्रान्ति का पर्याय् एक बहकावे का सूचक दूसरी जीवन का माध्यम .

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