Thursday, 15 September, 2011

अमेरिकी कंगाली का सच



भगवान स्वरूप कटियार
दुनियां पर अपनी धौंस और चौधराहट चलाने वाला अमेरिका आज फिर कंगाली की कगार पर खड़ा है . बड़ी मुश्किल से मंदी से उबर ही रहा था कि फिर से वह गहरे आर्थिक संकट फंसता दिखाई दे रहा है . खोखली अर्थव्य्ावस्थाओं का यही हश्र् होता है . जो अर्थव्यवस्था उत्पादन , रोजगार और घरेलू बाजार पर आधारित नहीं होती है उसका अन्तततोगत्वा यही परिणाम होता है ़ काष हमारे अर्थषास्त्री प्रधानमंत्री मनमोह्न सिंह अर्थषास्त्र के इस मर्म को समझ पाते. लिबरलाइज़ेशन ( उदारीकरण ) पूंजीवद को बढ़ावा देता है ,यह् गरीबी का समाधान नहीं है . गरीबी का समाधान है रोजगारपरक उत्पादनोन्मुख अर्थव्यवस्था जिससे दुनियां के अधिकाँश देश विमुख होते जा रहे हैं . मुनाफा और पूंजी व्यापारियों के सरोकार हो सकते हैं सरकारों के नहीं . सरकारों के सरोकार सीधे जनता के हितों से जुड़े होते हैं. रेटिंग एजेंसी स्टैन्डर्ड एण्ड पुअर द्वारा अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटाने से हड़कम्प मच गया और दुनियां का षेयर बाजार धड़ाम से औंधे मुंह नीचे गिरा . दुनियां की वे बैंके जो काले धन का कारोबार करती हैं कालाधन वापस करने पर राजी होती नजर आरही हैं , आखिर कहां लगायें काला धन जब षेयर बाजार का यह हाल है. दुनिया की अर्थव्यवस्था में जिस तरह का हड़कम्प मचा है उससे मंदी के संकट की आशंकाएं मडराने लगी हैं . जी-७ के देष विचार विमर्श में जुट गये हैं . अमेरिका अन्दरूनी और बाहरी कई संकटों से जूझ रहा है . भले ही रिपब्लिक और डेमोक्रेट में समझौते से सरकारी कर्ज की सीमा बढ़ाने का संकट हल हो जाय पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बजट घाटा कम करने और कर्ज अदायगी की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है क्योंकि अमेरिकी ट्रेजरी और डालर दुनियां में सबसे विश्वसनीय माने जाते हैं और इसी आधार पर अमेरिकी बांडों पर निवेश सबसे सुरक्षित माना जाता है . इस तरह हम कह सकते हैं कि द्वितीय विश्वयुध्द के बाद विश्वार्थाव्यवस्था के बने ढांचे को गहरा झटका लगा है और इसीलिए चीन जैसे देश ने डालर को विश्व की मानक मुद्रा मानने पर सवाल खड़ा कर दिया है .
जाहिर है कि बड़े आर्थिक संकट का डर् उभरने लगा हैं . लगता है कि मंदी की मार फिर से अमेरिका को तबाह करेगा . अपना बोया खुद को ही काटना पड़ता है , वही अमेरिका के साथ हो रहा है . ईराक को तबाह और बरबाद करने में अमेरिका ने अपने देष की अर्थ व्य्ावस्था दांव पर लगा दी उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी विष्व अर्थव्यवस्था में नये षक्ति केन्द्र उभर रहे हैं . भारत के षेयर बाजार में भी भारी गिरावट आयी है क्योंकि आज के दौर में सारी अर्थव्यवस्थाएं वैष्विक हैं और एक दुसरे से जुड़ी हैं . पर भारत पर षायद इसका इतना बुरा असर न पड़े क्योंकि भारत की अर्थ व्यवस्था घरेलू बाजार पर आधारित है . विष्व अर्थव्यवस्था में गिरावट हमारे निर्यात पर गहरा असर डालेगा. ४॰ अरब डालर भारत ने अमेरिका निवेष किये हैं इस कारण भारत को भी गहरा झट्का लग सकता है .मनमोहन सिंह की सारी पढ़ाई इस देष के काम न आयी .घरेलू कारणों से हमारी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा सकती है जैसे खेती की उत्पादकता और कृषि उत्पादों की वितरण की समस्या या फिर बुनियादी ढांचे की कमी और भ्रश्टाचार की काली कमाई आदि . इससे एक बात उभर कर सामने आयी जो अर्थव्यवस्थाएं घरेलू बाजार और बचत पर नहीं टिकी हैं उनका ढहना तय है . इस माह का पहला हफ्ता अमेरिका के राजनैतिक और आर्थिक इतिहास में एक शर्मनाक लमहे के रूप में याद किया जायेगा . भले ही रिपब्लिक और डैमोक्रेट के समझौते से अमेरिका डिफाल्टर होने से बच गया हो पर वैश्विक त्रासिदी तो आ ही गयी दुनियां भर के शेयर बाजार धराशायी हो गये . अमेरिका के दक्षिणपंथियों द्वारा खड़ा किया गया कर्जसीमा का यह संकट उतना मायने नहीं रखता जितना विष्वअर्थव्यव्स्था की खतरनाक संवेदनषीलता और योरुप का गहराता संकट रखता है . ऐसे में स्टैन्डर्ड एण्ड पुअर एजेंसी ने अमेरिका की रेटिंग कम करके अमेरिका की कर्ज चुकाने की क्षमता पर एक गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है गौरतलब है कि इसी एजेंसी ने अमेरिका की रेटिंग ट्रिपिल ए की थी और अब घटा कर डबल ए कर दी . अमेरिका को सरकारी कर्ज की सीमा बढ़ाने की बह्स में उलझने की बजाय कुछ ऐसा करना चाहिए था जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी था जैसे अमेरिका को अपना पूरा ध्यान रोजगार अवसर बढ़ाने और विकास दर की गति हासिल करने पर केन्द्रित करना चाहिए और घरेलू और बाहरी कर्ज के मामलों को गंभी्रता से हल करने की कोषिष करनी चाहिए जिसने लाखों परिवारों को तबाही की आग में झोंक दिया . अमेरिका को अपने नागरिकों की क्रयषक्ति बढ़ानी चाहिए थी तथा सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना चाहिए था न कि घटाना़ . अमेरिका की सरकारी कर्ज सीमा १४.३ ट्रिलियन डालर है और अगर इसे सेनेट द्वारा न बढ़ाया गया होता तो अमेरिकी सरकार डिफाल्ट हो जाती और उधारी नहीं ले पाती . यह उसकी कानूनी सीमा थी . काष भारत की भी कर्ज की कोई कानूनी सीमा होती और कर्ज लेने तथा न चुका पाने की जबाबदेही होती . सरकारी कर्ज का बोझ मह्गाई और टैक्स के रूप में देश के हर आम नागरिक पर पड़ता है जबकि फायदा सांसद ,मंत्री , नौकरशाह , व्यापारी उद्योगपति सब्सिडी और मोटी तनख्वाहों और रिष्वत के रूप में उठाते हैं . लगभग प्रतिवर्श सांसदनिधि और संासदों के भत्ते बढ.ाये जाते जिससे देष पर भारी आर्थिक बोझ बढ.ता है और मजे की बात यह कि सांसदों के भत्ते आयकर सीमा से बाहर हैं . कानून बनाने वाली हमारी संसद जनहितों और जनमत की उपेक्षा कर स्वार्थगत कानून बनाती है . संासद की यह सरासर संवैधानिक तानाषाही य जनता की भाषा में खुली गुंडई है . इस पर अंकुष लगाने का संवैधानिक अधिकार सीधे जनता के हांथ मे होना चाहिए ताकि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की लगाम अपने हांथ में रख सके और तथाकथित जनसेवक जनभक्षक न बन सकें . एक चौकाने वाला सच यह कि हमारे देष का राजस्व व्यय ६३ प्रतिशत है और पूंजीगत व्य्ाय मात्र ३७ प्रतिषत है . उल्लेखनीय है कि पूंजीगत व्यय से विकास योजनायें चलती हैं और राजस्व व्यय से सरकारी खर्च जबकि चीन में पूंजीगत व्यय राजस्व व्यय से अधिक है . ऐसा उन तमाम देषों में है जहां कि सरकारें ईमानदार हैं और जनहित को सर्वोपरि मानकर अपना कामकाज करती हैं .
भारत की तरह अमेरिका भी इस सच्चाई से मुंह मोड़ रहा है कि उसकी यह दुर्गति युध्द पर खरबों डालर आग में ईंधन की तरह झोंकने से तथा घाटे और कर्ज में डूबे कार्पोरेट कंपनियों और बैंकों के बेलआउट पर लुटाए खरबों डालर की बजह से हुई है . भारत की सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि भारत की तबाही की जड़ में मूल कारण भ्रश्टाचार है जिसके जनक सिर्फ और सिर्फ राजनेता हैं . राजनीत का अपराधीकरण भ्रश्टाचार के कारण हुआ और आज संसद और विधान सभाओं में बैठे सफेदपोश अधिकाँश दागी अपराधी और करोड़पति हैं . जनता सीधा एक सवाल पूछती है कि गरीब घरों, किसान परिवारों से आये मुलायम , लालू ,पासवान ,मायावती जैसे तमाम नेता जो मूलरूप से २ एकड़ से अधिक के जोतदार नहीं रहे अरब-खरब पति कैसे होगये जबकि इनका न कोई कारोबार है न कोई उद्योगधंधा . अमेरिका में आये इस संकट से यदि हमने समय रहते सबक न लिया तो हमारा जहाज भी बीच मझधार में डूबेगा और हम कुछ नहीं कर पायेंगे पछताने के सिवा .

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