Monday, 5 September, 2011

कटघरे में संसदीय राजनीत

भगवान स्वरूप कटियार
संसदीय लोकतंत्र की अवधारणा में देषवासियों ने मिलजुल कर बुना था सबकी खुषहाली का सपना . हमारी संसद देषवासियों के सपनों और आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी जिसका परिणाम है कि देष की संसदीय राजनीत जनता की अदालत के कटघरे में खड़ी है . इसके लिए कमोवेष देष के सभी राजनैतिक दल जिम्मेदार हैं . संसद बनती है सांसदों से . अगर संासदों को का चरित्र और चेहरा बदल जाय तो उसका प्रभाव संसद के कार्यकलापों और संसद की गरिमा पर पड़ना स्वाभाविक है .आजादी के बाद के षुरू के वर्शों में जो लोग संसद में चुन कर आये उनकी पृश्ठभूमि स्वतंत्रता संग्राम की थी . बाद के वर्शों में राजनीत एक लाभप्रद पेषा बन गयी जिसमें अधिकांष लोग सत्ता-सुख भोगने और कम समय में अधिक धन कमाने के लिए आने लगे. राजनीत करना और राजनीत चलाना अधिकाधिक मंहगा होता गया . चुनाव में काला धन का इस्तेमाल कर सफेद किया जाने लगा . एक लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए ५करोड़ से १॰करोड़ रुपये खर्च होते हैं जिसे सफेद धन से लड़ा जाना नामुमकिन है .हालाकि सभी लोग भ्रश्ट नहीं है पर परिस्थितियां उन्हें भ्रश्ट बनाती हैं . वर्तमान लोकसभा में ५४३ सांसदों में लगभग ३॰॰ करोड़पति हैं और लगभग १५॰ से १७५ सदस्य अपराधिक पृश्ठभूमि के है़ं . एक समय था जब संसद में राश्ट्रीय- अन्तर्राश्ट्रीय विशयों पर सारगर्भित बहस होती थी जबकि आजकल ज्यादातर बहस क्षेत्रीय मुद्दों पर होती है . कालान्तर में संसदीय राजनीत निरंतर संकुचित होती चली गयी.
संसद की कार्यवाही पर प्रतिदिन ६.३५ करोड़ रुपये खर्च होते हैं . वर्श २॰१॰ के षीतकालीन सत्र में संसद के पूरी तरह से ठप्प रहने के कारण सरकारी खजाने को करीब १५॰ करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ . आमतौर पर संसद के सत्र में १५-२॰ विधेयक पारित किये जाते हैं पर उस षीतकालीन सत्र में मात्र ५ विधेयक पास किये जा सके . संसद में सुचारु रूप से सत्र ना चल सकने के कारण संसद में८१ बिल लम्बित हैं . जरा याद करे जब लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सांसदों के व्यहार पर अपना गुस्सा इजहार करते हुए कहा था कि सांसद देष क ेप्रति अपने गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण एक पैसा पाने के भी हकदार नहीं हैं.आज जब देष की जनता ने सड़क पर उतर कर देष में भ्रश्टाचार को समाप्त करने के लिए एक कारगर् जनलोकपाल बिल लोकसभा में पारित कराने क ेलिए बीड़ा उठाया तो देष की पूरी राजनीत बदहवाष होती नजर आयी और संासद् संसद की गरिमा एवं संप्रभुता का ढोल पीटने लगे . अगर संसद का पुराना चरित्र और चेहरा वापस लाना है तो जनलोकपाल की तरह एक व्यापक चुनाव सुधार बिल पारित कराना होगा जो संसद में अपराधिक और भ्रश्ट पृवित्त के लोगों को रोके और अनिवार्य मतदान कराकर छù बहुमत पर अकुंष लगाये . सीधा सा सवाल है कि जनता जिन सांसदों को चुनकर भेजती है वे जनता के लिए काम करने के बजाय अपने स्वार्थगत लाभों में लिप्त होकर सांसदनिधि और भत्ते बढ़ाने के अलावा सवाल पूछने के लिए धन लेने जैसे दुश्कृत्यों में उलझे रहते हैं और सत्ता के लिए गठजोड़.की राजनीत करते हैं . भारतीय राजनीत में इस समय सिविल सोसाइटी बनाम संसद की बहस गूंज रही है . सच तो यह है कि देष की पूरी राजनीत जनता की अदालत के कटघरे में खड़ी है और उसके पास जनता के सवालों के जबाब नहीं है . एक बड़ा सवाल यह है कि यदि चुनी हुई संसद भ्रश्टाचार के साथ खडी़ होकर भ्रश्टाचार का बचाव करने लगे तो क्या देष की जनता को चुप बैठा रहना चाहिए जिसने संविधान और संसद दोनों बनाये हैं ? हम सब जानते और रोज देखते हैं कि संविधान और संसद की गरिमा की दुहाई देने वाले लालू और अमर सिंह जैसे तमाम सांसदों ने संविधान और संसद को रसातल में पहुंचा दिया है . सर्वदलीय बैठक में कुछ सांसदों को छोड़ कर अधिकांष ने जन लोकपाल बिल के प्रति जो ढुलमुल रुख अख्तियार करते हुए भ्रश्टाचार के मुद्दे को जिस तरह डायलूट करने की कोषिष की उससे सरकार और पूरी संसद अपनी नियत को लेकर कट्घरे मैं खड़ी है . यह संसद जो एक संवैधानिक संस्था है ,जनता के लिए उसके हितों के रास्ते में एक पत्थर बन कर खड़ी है . इसमें संसद का नहीं अधिकांष भ्रश्ट सांसदों का दोश है . एक तरफ सरकार कहती है कि भ्रश्टाचार समाप्त करने के लिए हमारे पास जादू की छड़ी नहीं है और जब् जनता एक मजबूत जन लोकपाल के रूप जदू की छड़ी देती है तब पूरी संसद उससे दूर भागती है . तभी अन्ना जनता की जमीनी भाशा में कहते हैं कि देष के ये काले अंग्रेज लोकतंत्र नहीं लूटतंत्र चला रहे हैं ,हुकुमषाही चला रहे हैं . गांधी जी और डा॰ लोहिया नेताओं के इस चरित्र को भांप गये थे और इसीलिए उन्होंने हमेषा संसद के बाहर जनता को जगाये रखने लिए आगाह किया था . लोहिया का तो पूरा जीवन ही संसद से बाहर की राजनीत में ही बीता ,सिर्फ एकबार संसद में चुन कर गये थे .
तथाकथित सिविल सोसाइटी ने अन्ना के नेतृत्व में भृश्टाचार के खिलाफ पूरे देष को एकजुट कर दिया है और इसे वे आजादी की दूसरी लड़ाई कहते हैं पर फिर भी सरकार और संसद के कान में जूं नहीं रेंग रही है . देष की जनता गैर संसदीय रास्ते का इस्तेमाल करते हुए व्यवस्था परिवर्तन करना चाहती है . हाल ही में मिस्र , ट्यूनीषिया , लीबिया सीरिया आदि देषों में इसी तरह स्वतः स्फूर्ति जनान्दोलनों ने सता के तख्ते पलट दिये और हिंसात्मक घटनाएं भी घटी . पर अन्ना का पूरा आन्दोलन अंहिसात्मक और व्यवस्था परिवर्तन का है ,सत्ता परिवर्तन का नहीं है . अन्ना के इस आन्दोलन ने जहां एक ओर जनता में उम्मीद और आकांक्षाएं जगायीं हैं वहीं राजनेताओं में भय जगाया है . राजनेता यह समझ रहे हैं कि यदि एक बार जनान्दोलन की आवाज को संसद में स्वीकृत मिल गयी तो चुनावी राजनीत निश्फल हो जायेगी . यह साफ दिखाई देता है कि गठजोड़ की राजनीत ने विचारधारा और मूल्यों की राजनीत को पीछे धकेल दिया है . भ्रश्टाचार का हाल यह है कि वह पूरे देष के लिए कैंसर बन गया है ्जिसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष लगभग एक जैसी भूमिका निभा रहे हैं क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे हैं और दोनों के दामन दागदार हैं . आंकड़ों के अनुसार ३१५ अरब ्रुपये हर साल्् भारतीयों को रिष्वत के रूप् में देने पड़ते हैं . १॰ खरब रुपये रिष्वत सालाना का टर्न ओवर पूरी दुनियां में है . भारतीय न्यायव्यवस्था में २३६॰ करोड़ की रिष्वत दी जाती है . एक साल में १॰॰॰ से ज्यादा भ्रश्टाचारियों को सजा नहीं मिल पाती है वर्तमान कानून से .लगभग १८॰॰ भ्रश्टाचार के मामले न्यायालय में लम्बित हैं . मात्र ३॰ फीसदी भ्रश्टाचार के मामले ही दर्ज हो पाते हैं और मात्र ५साल की सजा ही मिलती है भ्रश्टाचारी को . भारत सरकार द्वारा सब्सिडी दिये जाने वाले मिट्टी के तेल का ४॰ प्रतिषत हिस्सा ही लोगो तक पहुंचता है जबकि इस सब्सिडी के ९॰ अरब रुपये तेल माफियाओं को प्रति साल कमाई के रूप में जाते हैं .करप्सन वाच डाग और ग्लोबल फाइनेंसियल इन्टीग्रिटी के मुताबिक १९४८ से २॰॰८ के बीच २॰,७९॰॰॰ करोड़ रुपये अवैध तरीके से भारत के बाहर गये . स्विस बैंकिंग एसोसिएसन ने २॰॰८ की रिपोर्ट में यह खुलासा किया था कि भारतीयों का ८,५॰,९५॰ करोड़ रुपया ( १८९१ अरब अमेरिकी डालर ) जमा था . २ जी स्पेक्ट्रम के १,७६॰॰॰ करोड़ रुपये के घोटाले से ८॰॰॰ सोलर प्लान्ट चलाये जा सकते हैं . ट्रांन्सपेरेन्सी इन्टरनेषनल ने करप्सन परसैप्सन इन्डैक्स में ८७वें पायदान पर रखा है. अकेले सी बी आई के पास९९१॰ मामले ऐसे पड़ें है़ जिनकी जांच हो गयी है पर अभी तक किसी को सजा नहीं हुई है .एक अनुमान के मुताबिक महज १॰ घोटालेबाज २५ साल में ३॰ लाख करोड़ रुपये डकार गये . वर्श १९६८ में चौथी लोक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने लोकपाल बिधेयक पेष किया था . तब से लेकर १९७७, १९८५ ,१९८९, १९९६ ,१९९८, २॰॰१, २॰॰५ ,२॰॰८ और अब २॰११ में १॰वीं बार पेष किया गया है पर देष की यह महान संसद इसे पारित कराने की इच्छाषक्ति नहीं जुटा सकी और ना आज ही हिम्मत दिखा पा रही है . हांकाग हमारे सामने एक ज्वलन्त उदहरण है जहां १९७४ में इंडिपेन्डेन्ट कमीसन अगेंस्ट करप्सन( आई सी एसी ) बना कर करप्सन से निजात पाया गया . हाकांग आज ईमानदारी और पारदर्षिता क ेक्षेत्र में ट्रांस्पैरेंसी इन्टर्नेषनल की वैष्विक सूची में १३ पायेदान पर है . हमारे देष में यथास्थितवादी भ्रश्ट नेता जो यह कहते हैं कि भ्रश्टाचार विकास के साथ जुड़ा अपरिहार्य हैै जिससे निजात नहीं पाया जा सकता है उनके लिए हांकांग और सिंगापुर जैसे देष बतौर मिषाल हैं . हाकांग का यह आई सी एसी नगरपालिका के छोटे कर्मचारी से लेकर जजों , सांसदों , मंत्रियों ,के खिलाफ जांच करने के लिए अधिकृत है जिसके लिए उसे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं है . वर्श १९७३ में हांकांग के एक पुलिस प्रमुख पीटर गोडबर् द्वारा ६लाख डालर के भ्रश्टाचार से इसकी षुरुआत हुई जो घोटाला कर विदेष भाग गया था .
दुनियां के तमाम देषों में प्रि लेगिस्लेटिव डिस्कोर्स के जरिये कानून बनाने और कानून में संसोधन करने की स्वस्थ परम्परा है जिसकी षुरुआत यदि भारत में भी इस जन लोकपाल बिल के जरिये होती है तो हमारे लोकतंत्र को ताकत मिलेगी . कानून बनाने और देष चलाने में में जनता की सीधी भागेदारी की जनता की मांग जायज और लोकतांत्रिक है पर देष की भ्रश्ट राजनीत लोकषक्ति को लगातार नकार रही है जो लोकतंत्र और देष दोनों के लिए खतरनाक संकेत है .

No comments:

Post a Comment