Friday 17 December 2010

पिंडारी ग्लासिएर की जोखिम भरी यात्रा






भगवान स्वरूप कटियार
हिमालय की बर्फ से ढकी ऊँची-ऊँची चोटियों और उसकी हरी-भरी वादियों के बीच मेरे मन को जो सुकून और शांति मिलती है वह शायद और कहीं नहीं मिल सकती है। हिमालय मुझे सदैव पिता के तरह लगते है जो अपनी बांहे फैलाये मुझे दुनियाबी झंझटो और तनाव से मुक्त कर अपनी बांहों में समेट लेना चाहते है। हिमालय की ऊँचाइयों को चढ़ने के रास्ते भले ही दुर्गम और कठिन हों, किन्तु उन ऊँचाइयों पर पहुंच कर तथा नैसर्गिक सौन्दर्य में डूबकर शरीर की सारी थकावट और दुर्गम किन्तु सुहावने रास्तों का कष्ट फ़ना हो जाता है। पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा के सपने ने वर्ष 2006 में मेरी ‘कैलाश मानसरोवर’ यात्रा के दौरान ही जन्म ले लिया था। जून 2008 में मैने पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा करने का निर्णय लिया और कार्ययोजना बनाई। इस यात्रा की सबसे पहली कठिनाई यह थी कि कैलाश यात्रा की तरह मेरे साथ कोई ग्रुप (दल) नही था। हिमालय की ऊँचाइयों पर पथरीले और चढ़ाइयों पर अकेले यात्रा करना इसलिए खतरनाक होता है किसी दुर्घटना के समय न तो कोई मदद कर सकता है और न ही उस दुर्घटना की कोई सूचना ही दी जा सकती है। फिर भी यात्राओं के लिए पागल दृढ़निश्चयी यात्री कभी इनकी परवाह नही करते। पिंडारी यात्रा करते समय मैं बार-बार सोच रहा था कि हिमालय की इन दुर्गम ऊँचाइयों पर पहुंचकर प्रकृति के स्वाभाविक नैसर्गिक सौन्दर्य को देखने और उनकी अनुभूतियों को मन में संजोने के साहित्यक-सांस्कृतिक संदर्भ क्या हो सकते हैं। यह तो नितान्त निजी यात्रा है। फिर सोचता हूँ जहां जीवन है और समाज है वह समाज चाहे पशु-पक्षियों अथवा निर्जन जंगल का ही क्यों न हो, वहां संस्कृति तो दूब की तरह स्वतः ही स्वाभाविक रूप में प्रस्फुटित होती है। पिंडारी यात्रा मंे तो गांव भी मिलते हैं और पुश-पक्षियों के साथ बच्चे, वृद्ध, जवान लोेगों से भी भेंट होती है। मुनाल पक्षी की आवाज एक स्वागतकर्ता की तरह यात्रियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। वहां के निवासी हम यात्रियों को परदेसी के रूप में अचरज से देखते और हम उन्हें हिमालय के निवासी के रूप में अचरज से देखते। दुनियाबी आपाधापी और गलाकाट सभ्यता से दूर पेट भर रोटी के लिए जी रहे यहां के भोले- भाले निवासी कितने निश्छल और स्वाभाविक हैं। प्रकृति ने तो सिर्फ एक भूख ही समस्या पैदा की है, जिसे ये सब लोग स्वाभाविक रूप से हल कर लेते हैं। इनका आदर भाव और प्रेम अनमोल है। जिन चढ़ाइयों को चढ़ते हुए हम हाफ जाते हैं उसके वे आदी हो चुके हैं। प्रकृति के कोप जैसे: भूस्खलन, ग्लेशियर धसना अथवा सर्दी के दिनों में भीषण बर्फबारी और ठण्डी तूफानी हवाएं उन्हें भी उतना ही कष्ट पहुंचाती हैं जितना हम यात्रियों को। किन्तु हिमालय उनकी मातृभूमि है। इसलिए यह सब सहना उनके लिए बड़ा सहज और स्वाभाविक सा हो जाता है। मनुष्य की प्राकृतिक स्वाभाविकता यहां सर्वत्र दिखाई दी, जो प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ स्वयं में अद्भुत है। प्रकृति की तरह यहां के लोग भी निश्छल और स्वाभाविक सौन्दर्य से भरे हैं। यही हिमालय की यात्राओं का अद्वितीय आकर्षण है, जो यात्रा के यादों में हमेशा-हमेशा के लिए समा जाता है। यात्राओं में प्रकृति का सानिध्य हमे दुनियाबी बन्धनो से मुक्त करता है।
मैं दिनांक 15 जून 2008 को लगभग 350 कि0मी0 की यात्रा नैनीताल एक्सप्रेस से तय करते हुए लखनऊ से लालकुआं पहुंचा और लालकुआं से अगले दिन यानी 16 जून 2008 को जीप द्वारा काठगोदाम, भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा, कौसानी, कोसी होते हुए लगभग दो सौ किलोमीटर की पर्वतीय यात्रा तय कर चार बजे बागेश्वर कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के गेस्ट हाउस पहुंचा। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के एक अनुभवी कर्मचारी श्री इन्दर सिंह से यात्रा के पहले मेरी दूरभाष पर बातचीत हो चुकी थी और उन्होने आश्वस्त किया था कि यहां से कोई न कोई ट्रेकर पिंडारी के लिए अवश्य मिल जायेगा। बागेश्वर पहुंचने पर यह पता चला कि कि 15 जून के बाद पिंडारी की ट्रेकिंग के लिए टेªकर्स आना बन्द कर देते हैं और इस वर्ष मानसून जल्दी आ जाने के कारण पिंडारी जाने के लिए ट्रेकिंग और भी दुर्गम हो जाने की सम्भावना है। दिन भर लगातार यात्रा की थकान के कारण शरीर वैसे भी टूट चुका था और पिंडारी जाने के लिए कोई ट्रेकर साथी न मिलने की सूचना ने मेरे मनोबल को तोड़कर रख दिया था। अकेले कमरे में पड़ा हुआ बहुत देर तक यही सोचता रहा कि क्या पिंडारी की यात्रा स्थगित करनी पड़ेगी ? क्योंकि अकेले सिर्फ पोर्टर-गाइड के भरोसे यह यात्रा न सिर्फ कठिन होगी बल्कि बोझिल भी होगी। यात्रा के लिए साथी नितान्त जरूरी होता है, चाहे वह जीवन की यात्रा हो या पिंडारी की यात्रा। मन में एक बार यह भी आया कि यदि पिंडारी की यात्रा नही कर पाया तो हिमालय के इसी क्षेत्र के अन्य नैसर्गिक सौन्दर्य के पर्यटन स्थलों का भ्रमण कर घर लौट जाऊँगा। शाम को आठ बजे गेस्ट हाउस के रिसेप्शन पर पता चला कि पोलैण्ड के दो ट्रैकर्स पिंडारी जाने के लिए तैयार हैं जो सुबह छह बजे निकलेंगे। मन में उम्मीद की एक किरण जगी और लगा कि पिंडारी यात्रा का सपना पूरा होने की सूरते बन रही हैं। अगले दिन यानी 17.6.2008 को मैं जल्दी ही प्रातः पांच बजे नहा-धोकर तथा सामान की पैकिंग कर नित्य की भांति मार्निग वाक के लिए निकल गया। लौट कर जब मैं गेस्ट हाउस के रिसेेप्शन पर आया तो पोलैण्ड के दोनो नौजवान साथी मिस्टर लुकाज ( 23 वर्षीय ) और मिस ऐनिया ( 20 वर्ष ) पिंडारी ट्रेकिंग के लिए तैयार खड़े थे। मैने उनका अभिवादन करते हुए अंग्रेजी में पूछा कि क्या आप लोग पिंडारी ट्रेकिंग पर जा रहे हैं। उन्होने उत्तर दिया, ‘हां’। मैने कहा मैं भी चल रहा हँ। पिंडारी ट्रैकिंग जाने के मेरे कार्यक्रम को सुनकर पोलैण्ड के दोनो नौजवान नागरिक खुशी से उछल पड़े और एक बार फिर गर्मजोशी से हाथ मिलाया।
सांग जाने वाले बस स्टैण्ड तक जाने के लिए पैदल ही जाना था, जो गेस्ट हाउस से लगभग तीन किलोमीटर था और यह रास्ता सामान लादकर पैदल ही तय करना था। पिंडारी ग्लेशियर की टेªकिंग की यह पहली परीक्षा की घड़ी थी, क्योंकि इतना सामान लादकर पैदल चलना वह भी पहाड़ी शहर की सीढ़ियों को चढ़ना-उतरना स्वयं में एक कठिन कार्य था। लेकिन हम तीनों कठिन कार्य के लिए ही आये थे, इसलिए कठिनाई का सामना करने में न तो कोई हिचक थी और न ही कोई डर। सांग जाने वाले बस अड्डे पर लगभग प्रातः सात बजे हम लोग एक जीप में बैठकर भडारी पहुंचे। रास्ते में पानी बरस रहा था। आठ बजे भडारी पहुंचने के बाद हमें वहां से फिर दूसरी जीप में शिफ्ट होकर सांग पहुंचना था। हम लोग लगभग नौ बजे सांग पहुंच गये, जहां हमारे गाइड गोलू और गोविन्द हमारे स्वागत के लिए इंतजार कर रहे थे। हम तीनो साथियों में किसी भी तरह के अजनबीपन जैसी अनुभूति नही हो रही थी। पहन लिए और गरम-गरम चाय पीकर और कैमरों से प्रकृति के मनोरम दृश्यों के चित्र खींचते हुए ट्रैकिंग के लिए चल पड़े। मेरा अनुमान था कि ट्रैकिंग की शुरूआत पहले किसी पहाड़ी पगडंडी से होगी और फिर चढ़ाई आयेगी। पर शुरूआत ही सीढ़ियों से हुई और लगभग दो किलोमीटर तक सीढ़ियां दर सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ा, जिसमें फेफड़ों की हालत यात्रा की शुरूआत में ही ऐसी हो गयी जैसे किसी धावक को दस किलोमीटर दौड़ने का कमाण्ड मिले, जिसे बिना रुके पूरा करना हो। शरीर पसीने से तरबतर हो गया था। तीन किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई करने के बाद लोहार खेत एक गांव आया, जहां पी0डब्ल्यू0डी0 का गेस्ट हाउस था। हम लोग वहां करीब 15-20 मिनट के लिए रुके। लोहार खेत से धाकुरी का सफर 14 किलोमीटर का है, जो अत्यंत दुर्गम चढ़ाई भरा पथरीले रास्तों का है और बरसात के कारण यह रास्ता और भी दुर्गम हो गया। इन सारी कठिनाइयों के बावजूद रास्ते में हरियाली और पहाड़ों के मनोरम दृश्य इतने लुभावने थे कि दुर्गम रास्तों की कठिनाइयां और रास्ता तय करने की थकान का एहसास भी नही होता था। तरह-तरह की वनस्पतियां, लम्बे-लम्बे विशालकाय वृक्ष, फूलों से लदी झाड़ियां मन को बड़ा सुकून दे रहे थे।
पोलैण्ड के दोनो साथी लुकाज और एनिया और हमारे दोनो पोर्टर गाइड आपस में इतने घुलमिल गये थे कि भाषा का कोई गतिरोध हमारे बीच नही रह गया था। हमारे गाइड भी काम चलाऊ अंग्रेजी बोल लेते थे और सबसे बड़ी बात यह थी कि दुख और सुख की भाषा समझने में सिर्फ भावनाओं के एहसास की जरूरत होती है जो हम सबको भलीभांति था। हरे-भरे पहाड़ों से घिरे छोटे-छोटे गांव और बाल सुलभ क्रीड़ा करती हुई कलकल बहती नदी हमेशा के लिए वहां ट्रैकिंग करने वाले यात्रियों को अपने मोहपाश में बांध लेती है। यह देखकर ताज्जुब होता है कि पिंडारी जाने वाले इस रास्ते पर कहीं भी हिमालय के अन्य क्षेत्रों की तरह चीड़, देवदार तथा अलपाइन के वृक्ष नही मिलते जबकि बांस, बुरांश और खरशु के पेड़ काफी मात्रा में पाये जाते हैं। धाकुरी में ओक के वृक्ष अपना ही सौन्दर्य बिखेरते हैं। लोहार खेत से धाकुरी तक का रास्ता तय करने में लगभग छह घण्टे का समय लगा और पूरी यात्रा चढ़ाई भरी थी। जगह-जगह झरने और नाले थे जिन्हें पार करने में भी कठिनाई तो थी ही, उसमे फिसल जाने का एक डर भी था।
धाकुरी जाने वाले रास्ते में घास के बड़े-बड़े मैदान भी देखने को मिले जहां भेड़ों के बड़े-बड़े झुंड लिए वहां के स्थानीय चरवाहे भेड़ों को चरा रहे थे। पूछने पर पता चला कि ये चरवाहे बरसात के दिनों में पहाड़ की ऊँचाइयों पर आ जाते हैं और इन्हीं चारागाहों में अपने पशुओं को चराते हैं तथा सर्दी शुरू होते ही अर्थात अक्टूबर-नवम्बर में ये लोग फिर नीचे चले जाते हैं। धाकुरी जाने वाले रास्ते में हमें एक जर्मन यात्री की समाधि मिली, जिस पर लिखा था ‘पीटर कोस्ट’। उनका जन्म 1944 में हुआ था और पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा करते हुए धाकुरी पहुंचने के तीन-चार किलोमीटर पहले ही हृदयगति रुक जाने के कारण सन् 2000 में निधन हो गया। उनकी कब्र पर लिखा हुआ था कि ‘पैराडाइज इज अहेड सो गो आनॅ एण्ड आई एम हियर।’ धाकुरी हम लोग शाम को चार बजे पहुच गये थे। थकान से बुरा हाल था, किन्तु गेस्ट हाउस देखते ही ऐसा लगा जैसे वर्षो से कोई मेरा इंतजार कर रहा हो। गेस्ट हाउस के बरामदे में पड़ी कुर्सियों पर बैठकर एक राहत की सांस ली। बरामदे में बैठकर मैं लुकाज और एनिया धाकुरी के नैसर्गिक सौन्दर्य की छटा को देख रहे थे और अलग-अलग कोण से हिमालय के सौन्दर्य के चित्रों को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे। लुकाज बार-बार यह कहता था, ‘इण्दियन माउण्तेन आर वेरी ब्यूतीफुल।’ उसका पोलिश अंग्रेजी उच्चारण भी एक बच्चे की तुतलाहट जैसा आकर्षक, मोहक और मासूमियत भरा लगता था। धाकुरी समुद्र तल से लगभग 9000 फुट ऊँचाई पर है, यहां का मौसम बहुत ठंडा नही था, किन्तु फिर भी सुबह और शाम गर्म कपड़े पहनने पड़ते थे। लोहार खेत से धाकुरी आने में वहां के स्थानीय निवासियों से भी भेंट हुई, जिनसे वहां के जीवन के बारे में जानने और समझने का मौका मिला। धाकुरी से दो किलोमीटर पहले मोबाइल पर घर पर गुड़िया से बात हुई। इसके बाद सारा कम्यूनिकेशन बन्द हो गया। समुद्रतल से लगभग 9000 फुट की उंचाई पर स्थित धाकुरी पहुंचते ही स्वर्ग लोक पहुंचने का अहसास होने लगता है। चारों तरफ दूर-दूर तक फैली हरियाली और दूर दिखायी देती मकतोली पवांलीद्वार 20000 फुट, नंदाखाट 19000 फुट तथा नंदाकोट 21000 फुट की ऊँचाई वाली बर्फ से ढकी चोटियां हिमालय के सौन्दर्य की छटा बिखेर रही थीं। नीले आकाश के नीचे फैला यह हिम संसार अपने अलौकिक सौन्दर्य से यहां आने वाले पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर देता है। साल भर गहरी नींद में सोया रहने वाला यह स्थान यात्रा के दिनों में चहक उठता है। कठिन चढ़ाई के पश्चात अकल्पनीय सौन्दर्य से परिपूर्ण धाकुरी आंखों के सामने ऐसे आ जाता है मानों किसी नव वधू ने स्वयं अपना घूंघट उठा दिया हो। चांदनी रात में दूर-दूर तक फैला दूधिया उजाला पर्यटकों को अभिभूत कर देता।
रास्ते में ऊँचे-ऊँचे वृक्षों की जड़ें जमीन से निकलकर धरातल पर आ गयी थीं और वो इतनी कठोर और उनका रंग भी पत्थरों के रंग जैसा हो गया था। कई बार पत्थर और जड़ों को पहचानना मुश्किल हो जाता था। रास्ते में अंगार पेड़ के छोटे-छोटे सफेद फूल मोतियों की तरह बिखरे मिले। अजीब आश्चर्य हो रहा था कि पेड़ का नाम अंगार है और उससे मोतियों जैसे फूल झर रहे हैं जबकि अंगार तो आग उगलते हैं। हमारे दोनो पोलैण्ड साथियों का इस दुर्गम यात्रा के लिए उनका साहस, सौम्य स्वभाव और खुलापन बहुत अच्छा लग रहा था और सोच रहा था कि दोस्त ऐसे ही अचानक मिलते हैं और हमेशा के लिए अपना बना लेते हैं। इस दोस्ती ने जाति धर्म तो दूर भौगोलिक सीमाओं को भी पार कर लिया था और भाषा ने तो यह अहसास ही नहीं दिलाया कि वे किसी दूसरे देश के अजनबी हैं। धाकुरी में 17 जून 08 की रात्रि गुजारने के बाद प्रातः 18 जून को यात्रा के अगले चरण की तैयारी शुरू कर दी, यानी समान की पैकिंग करके और सुबह की चाय और हल्का नाश्ता लेकर हम लोगा साढ़े आठ बजे धाकुरी से खाती होते हुए द्वाली जाने के लिए चल पड़े। धाकुरी से द्वाली पहुंचने की दूरी (19 कि0मी0) थी। यह रास्ता भी पूर्व की भांति पथरीला, किन्तु उतराई (डाउनिंग) वाला था। उतराई का रास्ता भी उतना ही कठिन होता है जितना चढ़ाई का, क्योंकि उतराई में सारा जोर घुटनो और पंजो पर पड़ता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि जैसे जूते पैरों में पहने ही नही हैं, सीधे पत्थरों पर चल रहे हैं। इतने कठोर और धारदार पत्थरों पर चलना पड़ता था कि कई बार यह भी डर लगता था कि जरा सा संतुलन बिगड़ा तो सम्भालना मुश्किल होगा। ट्रैकिंग में थकावट के कारण रात को नींद अच्छी आती थी।
वैसे पिंडारी जाने वाले यात्री द्वाली पहुंचने के पहले खाती में एक दिन का ब्रेक लेते हैं, क्योंकि 19 किलोमीटर का सफर थोड़ा मुश्किल होता है। किन्तु हम लोग अभी तक यह तय नही कर पाये थे हमे द्वाली आज ही पहुचना है या खाती मंे ही आज रुकना है। यह निर्णय खाती पहुंचने के बाद ही लिया जाना था। धाकुरी और खाती के बीच के रास्ते में अनेक मनोरम दृश्य देखने को मिले। पेड़ो पर उगी हुई फर्न तथा पत्थरों पर जगह-जगह उगी हुई घास एक अजीब सौन्दर्य भरा दृश्य प्रस्तुत कर रही थी जिसे हमने अपने कैमरे में कैद किया। खाती जाने वाले रास्ते में एक लम्बी दूरी हमे नदी के अन्दर से तय करनी पड़ी। यद्यपि नदी में पानी नही था, किन्तु रास्ता बहुत ही पथरीला और दुर्गम था। खाती पहुंचने के एक किलोमीटर पहले एक चाय की दुकान पर हम लोग रुके और चाय पीने के बाद खाती के लिए चल पड़े। इस रास्ते में गांव के निवासी, छोटे-छोटे बच्चे, गाय, कुत्ते, भेड़े और हरे-भरे खेत देखने को मिले। वहां की हरियाली तो इतना आकर्षित करती थी कि समय के अभाव के बावजूद बगैर उन्हें देखे आगे बढ़ने का दिल ही नही करता था। सुखद आश्चर्य इस बात पर था कि जिस कौतुहल और व्यग्रता से हम हिमालय की उस दुनिया को देख रहे थे उसी व्यग्रता और कौतुहल से वहां के लोग हमें भी देख, समझ और सुन रहे थे। पहुचते ही रास्ते में बच्चे, बूढ़े और स्त्रियां नमस्ते के संबोधन से अभिवादन करते और पूछते कहां से आये हैं। एनिया बहुत सुन्दर है। लुकाज और एनिया का अच्छा मैच है। दोनो अच्छे दोस्त हैं, सिर्फ दोस्त। दोस्ती के इस रिश्ते के साथ उनका भारत आना और भारत के सौन्दर्य में खो जाना मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा था। मैं इस मामले में परम सौभाग्यशाली था कि नैसर्गिक सौन्दर्य और मानवीय सौन्दर्य दोनो मेरे साथ थे। वे तन-मन दोनो से सुन्दर थे। धाकुरी से 15 कि0मी0 दूरी पर है द्वाली जहां यात्री-पर्यटक एक दिन विश्राम कर दूसरे दिन पिंडारी ग्लेशियर के लिए आगे बढ़ते हैं। यहां से शुरू होती है लंबी ढलान जहां पहाड़ों पर उतरना भी उतना ही कठिन है जितना उन पर चढ़ना। धाकुरी से पिंडर नदी नजर आती है। एक ओर विशाल ऊँचे पहाड़ हैं तो दूसरी ओर गहराई लिये खाइ। मालूम नहीं पड़ता कि इसमें कहां पिंडर नदी खो गयी है। रास्ते में एक छोटा गांव मिलता है खाती। खाती से जल प्रपातों को जो सिलसिला शुरू होता है वह अनवरत बढ़ता ही जाता है। द्वाली से ठीक पहले काफनी तथा पिंडर नदियों के संगम पर स्थित एक झरना जो इतना ऊंचा है कि पर्वत के मूल से पर्वत शिखर तक पूरा प्रपात एक नजर में नहीं दिख सकता। खाती से एक रास्ता सुंदरढूंगा ग्लेशियर को जाता है। द्वाली से पिंडारी ग्लेशियर की दूरी 12 किलोमीटर है परंतु रास्ता काफी जोखिम भरा व चुनौतीपूर्ण है। रास्ते में लुप्त हो रहे भोज वृक्ष भी पाये जाते हैं परंतु आज इनकी संख्या उंगलियों में गिनने लायक रह गयी है। कभी इन्हीं भोज पत्रों पर हमारे मनीषियों ने ग्रंथों की रचना की थी लेकिन आज लोगों की अज्ञानता एवं अदूरदर्शिता ने इन वृक्षों के अस्तित्व को समाप्ति के कगार तक पहुंचा दिया है। रास्ते में मिलने वाले बच्चे तुरन्त फोटो खींचने की जिद करते और टाफी मांगते। यह संयोग ही था कि हमारे पोलैण्ड के साथियों के पास टाफियों से भरे पैकेट थे जो रास्ते में बच्चों का बांटते चले। वहां के निवासियों ने हम लोगों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान और साथ फोटो खिंचवाने में भरपूर सहयोग किया।
खाती पहुंचकर चाय की एक दुकान पर हम लोग रुके। वह दुकान सिर्फ चाय की दुकान ही नही थी, बल्कि एक छोटा-मोटा रेस्टोरेण्ट था जहां भोजन से लेकर खाने-पीने का सब सामान मिलता था। खाती से हमारे साथ एक पुर्तगाल का साथी जोश ग्रेन्शा भी हमारे दल में शामिल हो गया और उसने हम सबको द्वाली चलने के लिए उकसाया, और हम सब द्वाली के लिए चल पड़े। रास्ता उसी तरह चढ़ाई भरा दुर्गम था, किन्तु जब चलना है तो चलना है। रास्ते में ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के मीलो लम्बे कोरीडोर (गलियारों) से होकर गुजरे, जहां झरनो के नाले बार-बार हमारा रास्ता रोक लेते थे। उन नालो को पार करना अपने आप में चुनौती भरा था। इस यात्रा में चुनौतियां तो हर कदम पर थी। चलते-चलते हम साथी एक दूसरे से काफी दूर हो जाते थे। तब मन में एक उलझन और डर भर जाता था। पुल से द्वाली गेस्ट हाउस एक किलोमीटर ऊँचाई पर था और यह चढ़ाई भी अपने आप में इतनी दुर्गम और कष्टप्रद थी कि गेस्ट हाउस पहुंचते-पहुंचते ठंडक भरे मौसम में पसीने से लस्त-पस्त हो गया। गेस्ट हाउस में सामान रखते ही हमारे उन्हीं दोनो द्वाली गेस्ट हाउस के कर्मचारियों ने गरम-गरम चाय पिलायी और थकावट के कारण बरामदे की कुर्सियों पर थकावट से चूर शरीर को लेकर निढाल हो गये। द्वाली से लगभग पांच किलोमीटर दूर है फुरकिया, समुद्रतल से 13000 फुट की ऊंचाई पर स्थित फुरकिया में पिंडारी ग्लेशियर के रास्ते का अंतिम विश्रामगृह है। यहां लागबुक के रूप में एक अदभुत दस्तावेज सुरक्षित है जिसमें वर्षो से यहां आने वाले यात्री अपने रोचक अनुभवों को लिखते रहे हैं। इस लागबुक में प्रथम प्रविष्टि सन् 1893 की हैं और तब से आज तक अनगिनत प्रवृष्टियां इसमें दर्ज हो चुकी हैं। अधिकांश पर्यटकों का मानना है कि चांदनी रात में धवल हिमानी चोटियों का एक अदभुत सौन्दर्य देखने को मन उद्वेलित हो उठता है पर भयानक ठंड और सर्द हवा बार-बार लक्ष्मण रेखा का काम करती है। इस सीमा को पार करना अथवा सीमा में रहना दोनों ही मन में कसमसाहट पैदा करते हैं। अगले दिन यानी दिनांक 19 जून 2008 को हम लोगों को द्वाली से फुरकिया का सात किलोमीटर का सफर तय करने में लगभग तीन घण्टे लगे। द्वाली से हम लोग प्रातः नौ बजे चले थे। रास्ते में हरियाली बहुत थी किन्तु ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का सिलसिला धीरे-धीरे कम हो गया था। आक्सीजन का घनत्व कम होने के कारण इतनी ऊँचाई पर बड़े पेड़ तैयार नही हो पाते। यात्रा प्रारंभ करते ही बरसात शुरू हो गयी थी। रास्ते मेें झरनो के तेज प्रवाह वाले नालो को पार करना बहुत मुश्किल होता था। ऐसी जगहों पर हमारे गाइड हमारा मार्गदर्शन करने के साथ-साथ हमारी सहायता भी करते थे। दूर तक फैली फूलों की घाटी जैसा नजारा था। किन्तु फूल अभी कलियों की शक्ल मंे थे। सितम्बर मंे यह इलाका फूलों के खिलने से चहक उठेगा। मन में ख्याल आया कि काश ये यात्रा सितम्बर में की होती। फिर भी अधखिली कलियां और कहीं-कहीं खिले फूल खुशी से मन को उद्वेलित कर रहे थे। यही हिमालय का स्वर्ग है। यदि दृष्टि हो इसे देखने और समझने की और हिम्मत हो हिमालय की इस ऊँचाई तक यहां आने की। रास्ते में बीच-बीच में भेड़े चराने वाले चरवाहों के कुत्तों से भी साबका पड़ा। किन्तु उन्होने परेशान नही किया। देखने में वे इतने डरावने और भारी-भरकम थे कि डर लगता था कि कहीं हमला न कर दें। फुरकिया हम लोग 12 बजे पहुंचे। पता चला गेस्ट हाउस बन्द है। चौकीदार ताला बन्द करके खाती चला गया। रात कहां और कैसे गुजारेंगे, अजीब चिंता हो रही थी। पता चला चौकीदार दो दिन पहले गया था, शायद आज आ जाये। हम लोग बरामदे में बैठकर अपने भीगे कपड़ों को सुखाने लगे जबकि बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। साथ में लाये हुए बिस्किट औैर ड्राइ फ्रूट खाये और ग्रुप फोटोग्राफी की। हिमालय की ऊँचाई के उस निर्जन में हम भारतीय और पोलैण्ड के साथी वैश्विक मैत्री के प्रतीक थे।
गेस्ट हाउस के ताले खुलवाकर फुरकिया में विश्राम किया गया। लकड़ी मंगाकर आग जलाई गई जिससे सर्दी दूर हुई और कुछ राहत महसूस हुई। शाम को छह बजे बरसात थमी और थोड़ा सूरज चमका। पिंडारी ग्लेशियर दिखायी पड़ने लगा। बड़ा मोहक दृश्य था। पूरा ग्लेशियर एक विशाल रूई के ढेर जैसा मखमली दिख रहा था। कैमरे ने अपना काम किया और एक अद्भुत खुशी की अनुभूति हुई। शाम को हमारे गाइड और वहां के कर्मचारियों ने मिलकर लकड़ी के चूल्हे पर स्वादिस्ट दाल, चावल और रोटी पकाई जिसे हम सभी साथियों ने भरपेट खाया। कमरे में जलाई गयी लकड़ी की आंच से कमरे काफी गर्म हो चुका था। रोशनी के नाम पर सिर्फ मोमबत्ती थी। बिस्तर भी बहुत सुविधाजनक नही था। किन्तु हिमालय की 13000 फुट की ऊँचाई पर इतनी सुविधाएं भी कम नही थी। 20 जून 2008 को प्रातः सात बजे हम लोग फुरकिया से पिंडारी के लिए चल पड़े। बरसात थमी थी। ऊँचाई पर होने के कारण ठण्ड काफी तेज थी। हम सभी साथी गरम कपड़ों में थे। फुरकिया से पिंडारी सात किलोमीटर है और पिंडारी से जीरो प्वाइन्ट दो किलोमीटर आगे है। इस प्रकार ग्लेशियर तक पहुंचने के लिए हमें फुरकिया से आठ या नौ किलोमीटर की यात्रा करनी होती है। मौसम साफ होने के कारण ग्लेशियर साफ दिख रहा था। हम हर कदम अपनी मंजिल के करीब पहुंच रहे थे। ठण्ड के बावजूद चढ़ाई और उतराई भरे रास्ते के कारण पसीने से लस्त-पस्त थे।
यह संयोग ही था कि बरसात के मौसम के बावजूद सूरज साफ चमक रहा था और हम सबका यह परम सौभाग्य था कि पचास किलोमीटर के दुर्गम रास्तों को पार करने की तपस्या सफल हुई। लगभग दस-साढ़े दस बजे पिंडारी पहुंचकर बाबा धर्मानन्द की कुटी में प्रवेश किया। नौजवान स्वामी धर्मानन्द यही कोई 40 वर्ष के रहे होंगे जो हिमालय की ऊँचाई पर हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों की परम्परा तप और ध्यान में रमे हुए हैं। बाबाजी ने हम सब यात्रियों का स्वागत किया और हमारा अभिवादन स्वीकार किया। उन्होने हम सबको गरम-गरम चाय पिलाई और बिस्किट खिलाये। धूप तेज थी और हमारी आंखों के सामने हमारा साकार सपना पिंडारी ग्लेशियर सूरज की किरणों से तेज चमक रहा था। चाय पीकर हम लोग अपने-अपने कैमरे लेकर जीरो प्वाइन्ट की ओर चल पड़े, जो पास में ही मात्र दो किलोमीटर दूर था। वहां से पिंडर नदी पिंडारी ग्लेशियर पिघल कर निकलती साफ दिखाई देती है। रास्ता भी आसान था और रास्ते में फूल और हरियाली बहुत थी। पिंडारी ग्लेशियर पर अनुसंधान करने आये लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा0 बाली तथा डा0 नवाज से भी भेंट हुई, जिनका वहां कैम्प लगा हुआ था और सात खच्चरों पर अपना सामान लेकर पिंडारी ग्लेशियर का जियोलोजिकल अध्ययन कर रहे थे। दो घण्टे तक प्राकृतिक सौन्दर्य के वैभव को हृदयंगम कर हम खुशी से मुग्ध थे। दूर-दूर तक सिर्फ नैसर्गिक सौन्दर्य और दूध की सफेदी लिए हिम का एक विशाल ढेर पिंडारी ग्लेशियर। लुकाज और एनिया इसे देखकर बार-बार भारत के सौन्दर्य पर मुग्ध होते और भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा करते। यहां पर दिमाग को यह सवाल परेशान करता कि क्या कोई देश सिर्फ देशवासियों के लिए ही महत्वपूर्ण होता है, तो फिर ये विदेशी नागरिक भारत के सौन्दर्य के इतने प्रशंसक क्यों। इससे साफ जाहिर है कि नैसर्गिक सौन्दर्य भौगोलिक सीमाओं की कैद से परे है।
अब हमारी यात्रा की वापसी थी। बराबर मन में यह ख्याल आ रहा था कि काश एक या दो दिन यहां रुकने का बंदोबस्त होता तो पिंडारी ग्लेशियर के सौन्दर्य को दिन और रात के हर कोण से अवलोकित करने का सुख अनुभव कर सकता। अनुसंधानकर्ता हमारे साथी प्रोफेसर डा0 बाली और प्रोफेसर डा0 नवाज अपने कैम्प में रहकर इस सुख के भागीदार हैं। पिंडारी से फुरकिया के लिए हम लोग एक बजे चले और चार बजे फुरकिया पहुंच गये। बीच-बीच में रास्ते में थोड़ी बहुत बरसात हुई। फुरकिया गेस्ट हाउस में हम अपना जो सामान पिंडारी जाते वक्त छोड़ गये थे उसे लेकर फुरकिया से द्वाली के लिए रवाना हो गये। रास्ता वही कहीं चढ़ाई, कहीं उतराई किन्तु हरियाली और फूलों की कलियों से भरा था। बीच-बीच में झरनो के नाले परेशानिया पैदा करते थे। हम लोग शाम छह बजे द्वाली पहुंचे। आज पूरे दिन में लगभग 21-22 किलोमीटर का सफर तय किया, इसलिए काफी थक गये थे। द्वाली जाने पर पता चला कि पिंडर नदी का थोड़ा-बहुत जो पुल बचा था लगातार बरसात के कारण वह भी बह गया। किन्तु अगले दिन यानी 21 जून 08 के सफर की चिंता मन में पहले से ही व्याप्त थी कि उसी टूटे हुए पुल से खतरा मोल लेकर दुबारा निकलना है।
दिनांक 21 जून 08 को प्रातः साढ़े आठ बजे नास्ता करके खाती होते हुए धाकुरी चलने की तैयारी शुरू कर दी। उसी पुल से फिर गुजरना था। हम लोग पुल के पास इकट्ठे हुए और उन्हीं स्थानीय के.एम.वी.एन. के कर्मचारियों ने पिछले बार की तरह एक-एक का हाथ पकड़कर पुल पार कराया। पुल पार करते समय बराबर यही लग रहा था कि कहीं यह कमजोर पुल हमारा साथ देने से मुकर गया तो हमारा परिवार हमेशा-हमेशा के लिए हमसे बिछड़ जायेगा, और ये विदेशी साथी जो अपना देश छोड़कर यहां आये हुए हैं? एक अजीब संशय और डर दिमाग में भरा हुआ था। लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक निपट गया। पुल पार कर राहत की सांस ली और ऐसा लगा जैसे मौत ने हमे किसी खास वजह से बख़्स दिया हो। द्वाली से 11 कि.मी. खाती पहुंचने का वही पुराना रास्ता तय करते हुए हम लोग दो बजे खाती पहुंचे। वहां आधा घण्टे का अल्प विश्राम और चाय पीने के बाद हम लोग धाकुरी के लिए चल दिए। यद्यपि हमारे गाइडों की यह मंशा थी कि आज रात खाती में ही बिताई जाय और कल धाकुरी चला जाय। लेकिन हम लोगांे ने उनके निर्णय से सहमति नही जतायी। अंततः हम सब छह बजे धाकुरी पहुंच गये। रास्ते में बरसात के वजह से बहुत मुशिकले आयी। दो घण्टे की पूरी ट्रैकिंग भीगते हुए की और धाकुरी पहुंचने पर हम पूरी तरह भीगे हुए थे और ठण्ड से कांप रहे थे। तुरंत कपड़े बदलकर कम्बल लेकर बाहर कुर्सी में बैठे और चाय पी। खाना खाकर थके होने के कारण गहरी नींद में सो गये और सुबह यानी दिनांक 22 जून 2008 को लोहार खेत के लिए चल पड़े। धाकुरी से लोहार खेत के लिए शुरू के तीन-चार किलोमीटर की यात्रा बहुत कठिन और दुर्गम थी। चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते फेफड़े जवाब देने लगे थे। रास्ते में वही हरे-भरे चारागाह, ऊँचे-ऊँचे पेड़ तथा झरनो का मंजर एक बार फिर नजरो के सामने से गुजरा।
लोेहार खेत से सांग का सफर सिर्फ तीन किलोमीटर का था और दो बजे तक सांग पहुंचकर जीप द्वारा हमे बागेश्वर पहुंचना था। लोहार खेत से सांग का तीन कि.मी. का सफर उतराई का था और रास्ता सीढ़ियोंदार पथरीला था, इसलिए चलने में काफी कठिनाई हो रही थी और घुटनो पर दबाव पड़ने के कारण पैरों में खासा दर्द हो रहा था। किन्तु रास्ते में हरे-भरे खेत, ऊँचे-ऊँचे पेड़ और खेतों में काम करते हुए स्थानीय लोग हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते थे और पूरे मंजर को सुहाना बनाते थे। रास्ते में बच्चे अपना अलग ही बाल सुलभ सौन्दर्य बिखेर रहे थे। दो बजे सांग पहुंचकर जीप द्वारा बागेश्वर के लिए रवाना हुए और हम लोग चार बजे बागेश्वर पहुंच गये और वहां से समान अपनी पीठ पर लादकर पांच बजे बागेश्वर गेस्ट हाउस पहुंचे। दिनांक 23 जून 08 को प्रातः आठ बजे हम कौसानी जाने के लिए कौसानी बस अड्डे पहुंचे। जबकि हमारे पोलैण्ड के दोनो साथियों ने बागेश्वर में ही आराम करने का निर्णय लिया और अगले दिन यानी 24 जून 2008 को कौसानी पहुंचने का कार्यक्रम बनाया। मैं कौसानी लगभग 12 बजे पहुंच गया और कौसानी पहुंचकर मैं पहले के0एम0वी0एन0 गेस्ट हाउस गया, किन्तु वहां पर एकोमेडेशन (कमरा) न मिल पाने के कारण मैं शिवम गेस्ट हाउस में रुका। आराम करने और लंच के बाद मैं कौसानी घूमने निकल गया और शाम को मैं गांधी जी का अनासक्त आश्रम और कौसानी का सन सेट (सूर्यास्त) देखा। बादलों के कारण सन सेट (सूर्यास्त) बहुत स्पष्ट नही दिख सका। शाम को अपने गेस्ट हाउस आकर आराम किया और सुबह पांच बजे ही जगकर सनराइज देखने के लिए अपने गेस्ट हाउस की छत पर कुर्सी पर बैठ गया और वहां जितने भी यात्री थे गेस्ट हाउस की छत पर पड़ी कुर्सियों पर बैठकर सूर्योदय के नैसर्गिक सौन्दर्य को देखने की प्रतीक्षा कर रहे थे। धीरे-धीरे सूरज की किरणें अपनी लालिमा से बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों को लाल रंग से पेंट कर रही थी। जो चोटियां अभी तक सफेद दिख रही थी उनका रंग धीरे-धीरे लाल हो रहा था। कैमरे ने इस पूरी प्रक्रिया को कैद कर लिया। किन्तु इस पूरी प्रक्रिया को बदलने में पूरा समय नही लगा और घने बादलो ने प्रातःकालीन इस सौन्दर्य को अपने अंधेरे से ढक दिया। कौसानी जाने का सबसे उपयुक्त समय या तो फरवरी-मार्च का महीना है या सितम्बर, अक्टॅूबर। उस वक्त सनराइज और सनसेट (सूर्यास्त) स्पष्ट दिखाई देते हैं। अगले दिन प्रातः दस बजे जब मैं कौसानी शहर की तरफ घूमने गया तो पुनः लुकाज और एनिया मुझे बस स्टैण्ड पर ही मिल गये। इस पुनर्मिलन से हम तीनो बेहद खुश थे। उन्होने बस स्टैण्ड के पास ही होटल में एक कमरा लिया और सामान रखकर तुरंत चाय के बागान (टी गार्डन) देखने का कार्यक्रम बना डाला। हम लोगों ने कौसानी के चाय के बागान (टी गार्डन) देखे जो कौसानी से लगभग तीन किलोमीटर बागेशवर रोड पर थे। चाय के बागान (टी गार्डन) और नास्पातियों के बगीचे बहुत ही मोहक और आकर्षक लग रहे थे। वहां हम लोगों ने चाय पी और कौसानी की चाय के कुछ पैकेट खरीद कर लाये। वहां पर कौसानी के ऊनी शाल बनाने के हैण्डलूम के छोटे-छोटे कारखाने हैं, जिसे हम लोगों ने देखा और कुछ ऊनी कपड़े भी खरीदे। वहां से हम लोेग फिर कौसानी लौटे और एनिया और लुकाज के साथ अनासक्त आश्रम को एक बार फिर देखा। लुकाज और एनिया गांधी के व्यक्तित्व और उनकी सोच से बहुत प्रभावित थे और मैंने यह भी देखा और महसूस किया कि इतनी कम उम्र में उन्हें गांधी के बारे में बहुत कुछ जानकारी थी और वह गांधी के प्रति काफी आस्थावान थे। इसके बाद मैं अपने गेस्ट हाउस की ओर चल दिया और लुकाज और एनिया अपने कमरे की ओर चल दिए। यही हम लोगों की आखिरी मुलाकात थी और हम एक दूसरे के एलबम और यादों में हमेशा के लिए बस गये।

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