Tuesday 7 December 2010

मेरी आखों से



मैं ख़त्म हो जाऊं गा यह तय है
हाँ यक़ीनन मैं मर जाऊं गा मैं ना घास बनू गा ,ना फूल
और ना ही कोई जीव |
जिस्मानी तौर से अस्तित्वहीन हो जाऊं गा
प्रकृति के चक्र में कोई जगह नहीं होगी मेरी |
फिर क्या खुद को भुलावा देना मेरी मिटटी बचे गी मैं नहीं |
गुलमोहर के पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं होगा मेरी कब्र पर
गुलमोहर के फूलों के सिवा |
तुम वहां आओ गी कुछ सोचती हुई कुछ पल रुको गी मेरी कब्र के पास
जिसके भीतर कुछ भी नहीं है |
और एक आंसू तुम्हारे चेहरे पर ढलक जाये गा
पर वह जो बच्चा मेरी कविता पढ़ रहा है
मेरी आँखों से दुनिया कों देखे गा |

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