Monday, 14 February, 2011

किसानो का शोक गीत



भगवान स्वरूप् कटियार्

अब सब यह मान चुके हैं कि आजादी के बाद देश में शासन करने वालों की चमडी का सिर्फ रंग बदला है.शोषण का दमन चक्र पुराने ढांचे मे़ नये जुमलों के साथ यथावत जारी है.संवैधानिक मूल्यों को अनदेखा कर विकास के लिए गैरबरबरी को अनिवार्य मान लिया गया है.देष के विकास की परिधि से सात लाख गांवों को हांसिये पर धकेल दिया गया है.कृषि प्रधान भारत में जहां आज भी 60 फीसदी जनता का जीवन खेती पर निर्भर् है वहां खेती किसानी को अकुशल श्रम की श्रेणी मे रखा गया है.खेती किसानी में आज भीे श्रम का औसतन् मूल्य् 30-50 रुपये रोज है जबकि छळे वेतन आयोग के बाद साधारण कर्मचारी 400 रुपये रोज का हकदार है.सन 1948 में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र में कहा गया था कि मेहनत की हकदारी इतनी तो होनी चाहिए कि मेहनतकश और उसके परिवार का अच्छी तरह भरण-पोषण हो सके.पर उसी वर्श बने भारत के न्युनतम मजदुरी अधिनियम और बाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 43 मे़ मेहनतकष का जिक्र तो है लेकिन परिवार नदारद है. राश्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण परिवाार में औसतन पांच सदस्य माने गये हैं लेकिन हमारी सरकार चार सदस्यों को परिवार में षामिल करता है और उसमें भी दो बच्चों को एक वयस्क मान कर तीन् वयस्क सदस्यों को एक परिवर मान है.श्रम के मूल्य को निरन्तर दबा कर रखने के कारण खेती-किसानी घाटे का सौदा बानती गयी ।खेती लगातार घाटे का सौदा होते जाने के कारण किसान कर्ज मे़ डूबते चले गये और आत्महत्या के कगार पर पहुंच गये अब तक भरत में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं.दुनियां के किसी भी देश में किसानों ने इतनी आत्महत्याएं नहीं की है़.यह स्थिति दुनियां के सबसे बडे लोकतंत्र को शर्मशार करती है.खेती-किसानी के लिए कर्ज के कानूनों के तहत उस पर चक्रवृध्दि ब्याज नहीं लग सकता. .पर इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है और किसान लगातार चक्रबृध्दि ब्याज के दलदल मे फंसा हुआ है.इतना ही नहीं केन्द्र सरकार ने 1984 मे़ कम्पनी अधिनियम में संसोधन कर एक नयी धारा और जोड दी जिसके तहत किसान कर्ज की शर्तों को अदालत में चुनौती नही दे सकता. राष्ट्रीय कृषि नीति के तहत सन 2000 में खेती को घाटे का सौदा बताया ेंगया जबकि देश की अधिकांश जनता की अजीविका कृषि पर निर्भर् है.कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान कुल 18 फीसदी है जबकि 60 फीसदी जनता कृशि पर निर्भर है. कृषि क्षेत्र और गैर कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय के बीच बडी असमानता है। बिड्म्बना यह है कि खेती को घाटे का सौदा मानने के बाबजूद नीति निर्धारण में इसकी अनदेखी की गयी. कहना गलत न होगा कि किसान को लगातार गरीब बनाये रखने की साजिश सरकारों द्वार की जाती रही है.खेती किसानी के मामले में आजदी के तुरंन्त बाद से ही तात्कालिक राह्त की राजनीत चल रही है.उनके श्रम और तकनीकी कौशल का अवमूल्यन कर उनका गौरव चूर किया और फिर उसे खैरात का मुरीद बना दिया.इसी का नमूना है कि किसान के बच्चों को स्कूल में मिड डे मील के नाम पर कटोरा ले कर खडा कर दिया जाता है और उनके भीतर् शुरू से खैरात पर पलने वाले बोध को रोपा जा रहा है.देष का खाया पिया अघाया वर्ग् अपनी नजर मे़ं किसान की छवि हमेशा याचक् की रखता है.भारत की अपेक्षा अन्य देषों में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी बहुत अधिक है.भारत में प्रति किसान सब्सिडी 66 डलर है जबकि जापान में 26हजार् डालर, अमेरिका में 21 हजार डालर् और यूरोपीय देषों में 11 हजार डालर है. सरकारी आंकडों के मुताबिक 1947 में सकल राष्ट्रीय आय में खेती का हिस्सा 67 फीसदी था जो घट् कर वर्तमान् मे़ 18 फीसदी रह गया है जबकि इस बीच् खेती किसानी का उत्पादन लगभग चार गुना हो गया.इस चार गुना उत्पादन का तुलनात्मक् मूल्य एक चौथाई रह गया.और इसी बीच मानव श्रम का प्रति एकड उपयोग घट्कर एक तिहाई रह गया इन विसंगतियों पर सरकारों की चिन्तित होने की बात तो दूर सन् 2020तक सरकारी अनुमान के अनुसार उदारीकरण के इस विकास माड्ल के चलते सकल राश्ट्रीय आय में कृशि उत्पाद का हिस्सा 6 फीसदी रह जाये गा.खेती किसानी के मुद्दों पर 20सालों से आन्दोलनरत रहे बी डी षर्मा का कहना है कि राष्ट्र की कुल आय कृषि उत्पाद का हिस्सा घटते जाने का कारण सरकारी नीतियां हैं़ मेहनत के मूल्य में की गयी नीतगत कटौती के कारण सकल राश्ट्रीय आय में कृशी उत्पाद का हिस्सा होना स्वाभाविक है.इसका पहला और सब्से भारी असर खेती के उपज के समर्थन उसमे मूल्य पर पड्ता है.उसमें किसान के अपने परिवार के और मजदूरों के श्रम क मूल्य आधा तिहाई य उसासे भी कम आंका जाता है अगर मेहनत के मूल्य का सही आकलन किया जाय तो सकल राश्ट्रीय आय में कृषि उत्पाद के हिस्से में करीब 12 फीसदी की बृध्दि तत्काल हो सकती है . राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार खेती को घाटे का धंधा मान कर 27 फीसदी किसान् खेती करना नापंसन्द करते हैं तथा 40 फीसदी किसान विकल्प की स्थिति में कोई दूसरा रोजगार पसंद करें गे.पिछले चार दसकों में उपलद्ध प्रति व्यक्ति भू स्वामित्व 60 फीसदी घटा है.सन 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की आंधी ने खेती के संकट को और गहरा दिया है.किसानों और प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करने वाले और उसी से जीवन यापन करने वाले समुदाय को कमजोर करने के हथियार के रूप में सेज,भूमि अधिग्रहण कानून,तथा बीज बिधेयक जैसे कानून बनाये जा रहे हैं.यह कानून जमीन पर कार्पोरेटी कब्जा करने का जरिया बन रहे हैं.इस कृषि प्रधान देश का किसान भला अपना और अपनी खेती का अस्तित्व कैसे बचा पाये गा.

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