Friday, 16 September 2011

मेरी चार प्रेम कविताएं


भगवान स्वरूप कटियार
( एक )
खौफ के साये में प्रेम
नीम के पेड़ के नीचे
रात के अंधेरे में
हम दोनों मिलते हें
बिना बोले, बिना छुए
हमारे मूक प्रेम संवाद का साक्षी
यह नीम का पेड़
और इसके नीचे पड़ी पीली-पीली पड़ी पत्तियां.
खौफ से थर्राये हैं
हमारे भूमिगत शब्द
और डरी हुई हैं
हमारी अतृप्त प्रेम भावनाएं
क्योंकि कुछ दिनों पहले
इसी पेड़ से लटका कर
एक प्रेमी युगल को
दी गयई थी फांसी
जब कि उनका मजहब एक था
सिर्फ जाति अलग थी |
( दो )

प्रेम
जानते हो हांथों की उंगलियों के बीच खाली जगह क्यों होती है ?
ताकि कोई दूसरा आये
और अपनी उंगलियों से उसे भर सके |
उंगलियों का कसाव
और उसकी गरमी ही वह भाषा है
जिसके जरिए
जिन्दगी करती है संवाद | |
विचार और तर्क की रोशनी में

इस खाली जगह का भरा जाना

एक बड़ी लड़ाई की अहम शुरुआत है |
( तीन )
मेरी आखों से
मैं पूरी तरह खत्म हो जाऊं गा
हां यह तय है
हां यकीनन मैं मर जाऊंगा |

मैं ना घास बनूंगा , ना फूल और ना ही कोई जीव
जिस्मानी तौर से मैं अस्तित्वहीन हो जांऊंगा .....
प्रकृति के चक्र में
कोई जगह नहीं होगी मेरी |
फिर क्या खुद को भुलावा देना
मेरी मिट्टी बचेगी ,मैं नहीं
यह सच है
और सच्चाई से
आंखें मिलानी चाहिए |
गुलमोहर के पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं होगा
मेरी कब्र पर
गुलमोहर के फूलों के सिवा |
तुम वहां आओगी कुछ सोचती हुई
कुछ पल रुकोगी मेरी कब्र के पास
जिसके भीतर कुछ नहीं है
और एक आंसू तुम्हारे चेहरे पर
ढलक जायेगा |
पर वह बच्चा जो मेरी कविता पढ़ रहा है मेरी आंखों से दुनियां को देखेगा |
( चार )
प्रेम का तर्क
कोई मुझ से ईष्वर और स्त्री और के बीच चुनाव करने को कहे
तो मैं स्त्री को चुनूंगा

क्यंकि स्त्री प्रेम है
और ईष्वर आस्था |
प्रेम आग की तरह गरम ऊर्जावन
और मौसम की तरह
उमंग से भरा
जबकि आस्था बर्फ की तरह ठंडी , निस्तेज पत्थर |
आस्था में तर्क से आंख मिलाने का साहस नहीं होता
जबकि प्रेम हर पल
जूझता है चुनौतियों से |
ईश्वर और स्त्री दो सामान्तर शक्तियां हैं
एक काल्पनिक और दूसरी स्थूल जीवन से भरी |
आस्था गाय - बैल हांकू
संस्कृति की संवाहक है
और प्रेम क्रान्ति का पर्याय्

एक बहकावे का सूचक दूसरी जीवन का माध्यम | भगवान स्वरूप कटियार ( एक ) खौफ के साये में प्रेम नीम के पेड़ के नीचे रात के अंधेरे में हम दोनों मिलते हैं. बिना बोले, बिना छुए हमारे मूक प्रेम संवाद का साक्षी है यह नीम का पेड़ और इसके नीचे पड़ी पीली-पीली पड़ी पत्तियां. खौफ से थर्राये हैं हमारे भूमिगत शब्द और डरी हुई हैं हमारी अतृप्त प्रेम भावनाएं ़ क्योंकि कुछ दिनों पहले इसी पेड़ से लटका कर एक प्रेमी युगल को दी गयई थी फांसी जब कि उनका मजहब एक था सिर्फ जाति अलग थी . ( दो ) प्रेम जानते हो हांथों की उंगलियों के बीच खाली जगह क्यों होती है ? ताकि कोई दूसरा आये और अपनी उंगलियों से उसे भर सके | उंगलियों का कसाव और उसकी गरमी ही वह भाषा है जिसके जरिए जिन्दगी करती है सँवाद | विचार और तर्क की रोशनी में इस खाली जगह का भरा जाना एक बड़ी लड़ाई की अहम शुरुआत है | ( तीन ) मेरी आखों से मैं पूरी तरह खत्म हो जाऊं गा हां यह तय है हां यकीनन मैं मर जाऊंगा | मैं ना घास बनूंगा , ना फूल और ना ही कोई जीव जिस्मानी तौर से मैं अस्तित्वहीन हो जांऊंगा ..... प्रकृति के चक्र में कोई जगह नहीं होगी मेरी | फिर क्या खुद को भुलावा देना मेरी मिट्टी बचेगी ,मैं नहीं यह सच है और सच्चाई से आंखें मिलानी चाहिए | गुलमोहर के पेड़ के नीचे कुछ भी नहीं होगा मेरी कब्र पर गुलमोहर के फूलों के सिवा | तुम वहां आओगी कुछ सोचती हुई कुछ पल रुकोगी मेरी कब्र के पास जिसके भीतर कुछ नहीं है और एक आंसू तुम्हारे चेहरे पर ढलक जायेगा | पर वह बच्चा जो मेरी कविता पढ़ रहा है मेरी आंखों से दुनियां को देखेगा | ( चार ) प्रेम का तर्क कोई मुझ से ईश्वर और स्त्री और के बीच चुनाव करने को कहे तो मैं स्त्री को चुनूंगा | क्यंकि स्त्री प्रेम है और ईश्वर आस्था | प्रेम आग की तरह गरम ऊर्जावन और मौसम की तरह उमंग से भरा जबकि आस्था बर्फ की तरह ठंडी , निस्तेज पत्थर | आस्था में तर्क से आंख मिलाने का साहस नहीं होता जबकि प्रेम हर पल जूझता है चुनौतियों से . ईश्वर और स्त्री दो सामान्तर शक्तियां हैं एक काल्पनिक और दूसरी स्थूल जीवन से भरी | आस्था गाय - बैल हांकू संस्कृति की संवाहक है और प्रेम क्रान्ति का पर्याय् एक बहकावे का सूचक दूसरी जीवन का माध्यम .

जन आन्दोलन बनाम संसद


भगवान स्वरूप कटियार
यह कैसी बिडम्बना है कि जनता के द्वारा चुनी हुई संसद और सांसद जन आकांक्षा ( पीपुल विल ) पर सवाल खड़ा कर रहे हैं जब कि जन आकांक्षाओं का मन्दिर कही जाने वाली संसद आज स्वयं सवालों के घेरे में हैं . सारी परेशानी तब शुरू होती है जब लोग अपने निर्धारित दयित्यों से हट कर अपने स्वार्थगत कार्यों में लिप्त हो जाते हैं तब राजनीत, जनसरोकारों और जनकल्याणकारी कार्यों से अलग हटकर सीधे भ्रष्टाचार और लूट का अड्डा बन जाती है . ऐसे में चुनी हुई सरकारें और संसद जो राज्य के महत्वपूर्ण अंग हैं बेमानी और बोझ सबित होने लगते है़ं . तब जन आन्दोलन ही एक ऐसा पवित्र और धारदार हथियार ही विाक्ल्प के रूप में बचता है जिसे जनता अजमाती है जिससे भ्रश्ट राज्य व्यवस्था घबड़ाकर या तो जनता की नब्ज को पढ़ कर अपने को ठीक कर लेती है या फिर जनता उस भ्रश्ट व्यवस्था को खत्म कर नयी व्यवस्था की संरचना करती है . देष के वर्तमान हालात कुछ इसी ओर इसारा करते हैं . आज अंग्रेजी बोलने वाले केन्द्रीय मंत्री चिदम्बरम,कपिल सिब्बल,सलमान खुर्शीद,और स्वयं मनमोहन सिंह यह भूल जाते हैं कि अंग्रेजी में बोला हुआ झूठ , झूठ ही रहता है , अंग्रेजी में बोले जाने के कारण वह ्सच नहीं हो जाता . इस देश की जनता को षुरू से ही सन्देह् था कि सरकार की नियत किसी सख्त और कारगर लोकपाल बिल लाने की नहीं है . जन्तर - मन्तर पर दो महीने पहले अन्ना जी के समर्थकों का जन सैलाब देख कर सिर्फ इसे कुछ समय के लिए टालने और आन्दोलन की गति को कमजोर करने के लिए सरकार की ओर से ज्वाइन्ट ड्राफ्टिंग कमेटी का नाटक किया गया और सरकार ने सोचा शायद वह सिविल सोसाइटी के सदस्यों को अपनी चालाकी से डील करलेजायेंगे और नहीं तो जनान्दोलन की हवा तो निकल ही जायेगी क्योंकि इन कारपोरेट मिनिस्टर्स में अपनी डीलिंग क्षमता पर बड़ा भरोसा रहता है. सरकार के गले जनलोकपाल बिल का मसविदा नहीं उतरा . बेहतर होता सरकार संसद के पटल पर वायदे के मुताबिक दोनों ड्राफ्ट रख देती और संसद जिसे स्वीकार करना चाहती करती . यह भी अपनी तरह का एक नया प्रयोग होता .पर भ्रश्ट और नियत की खोटी सरकार ईमानदारी से बहुत घबड़ाती है और शायद इसीलिए सरकार ने बिना हाथ पैर और आंख दांत वाला लोकपाल बिल पेष कर अपना वादा निभाने की वाहवाही लूटने का नाटक किया . इस चालाक सरकार के मंत्रियों को यह नहीं पता कि इस देष की परिपक्व जनता उनकी हर चालाकी को भलीभांति जानती और समझती और वक्त आने पर उसका कड़ा जबाब भी देती है . आष्चर्य है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार दुनिया भर में चल रहे जन आन्दोलनों की इबारत को नहीं पढ़ पा रही है . ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया में जो कुछ घटा क्या उससे सबक लेते हुए जन आंकाक्षा का सम्मान नहीं किया जाना चाहिया था . अगर मौजूदा केन्द्र सरकार प्रस्तावित जनलोकपाल बिल संसद से पारित करा देती तो सरकार, संसद और स्वयं प्रधानमंत्री का मान बढ़ता . पर ईमानदार प्रधानमंत्री, बेईमान मंत्रियों और बेईमान सांसदों के दबाव में अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा सके.
संसद की संप्रभुता और उसकी गरिमा का ढिढोरा पीटने वाले षायद यह भूल रहे हैं कि संसद का स्रोत भी इस देष की जनता ही है और इसलिए यदि सांसद और सरकारें भ्रश्ट हो जायें तो उस पवित्र संसद में घुसे भ्रष्ट सांसदों की सफाई का काम भी जनता का ही है और यह जनान्दोलन उसी का प्रारूप है . देष की महान जनता अपनी महान संसद और पूरे संसदीय लोकतंत्र का बेहद सम्मान करती है . वह कभी संसद की सर्वोच्चता और संप्रभुता को चुनौती नहीं देती पर वह यह भी भलीभांति जानती और समझती है कि संविधान , सरकार ,संसद ,कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका यदि उसके गले का पत्थर बन गये हैं तो उन्हें उतार फेंकने में इस देश की जनता को कोई गुरेज नहीं है . संसद और सरकार की गरिमा को सबसे ज्यादा आहत तो सरकार में बैठे भ्रष्ट मंत्रियों और संसद में बैठे भ्रष्ट सांसदों ने किया है जहां कैश फौर वोट चलता है और अधिकाँश मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं . राज्य के उद्देश्य राज्य की अवधारणा में ही निहित हैं . जब यह कहा जाता है कि राज्य एक राजनैतिकरूप से संगठित लोगों की ऐसी संस्था है जो सामूहिक उद्देश्यों को पूरा करती हो और सामूहिक जनासंतोश के लिए काम करती है . इससे साफ जाहिर है कि किसी नागरिक को राजनैतिक होने के लिए किसी राजनैतिक दल की सदस्यता की जरूरत नहीं है .वह उसी तरह स्वाभाविकरूप से राजनैतिक व्यक्ति है जिस तरह वह स्वाभाविक रूप से सामाजिक व्यक्ति होता है और इसी के तहत वह सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों में समानरूप से भाग लेता है . उस लिहाज अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जनान्दोलन पूरी तरह और शुध्दरूप से राजनैतिक है पर राजनैतिक स्वार्थों से परे है .बिडम्बना यह है कि यहां उसी को राजनैतिक माना जाता है जो राजनैतिक स्वार्थों से युक्त् हों . राज्य की अवधारणा स्पश्टरूप से यह कहती है कि राज्य साध्य नहीं बल्कि जनता के हितों की पूर्ति का मह्त्वपूर्ण साधन है. साध्य तो जनता और उसके सामूहिक हित हैं और आगे राज्य के दायित्यों का निर्धारण करते हुए कहा गया है कि राज्य का दायित्व है कि वह राश्ट्रीय षक्ति विकसित करे , न्याय और कानून व्यवस्था कायम करे और जनता की सामाजिक आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करें और यदि राज्य इन उद्देश्यों को प्राप्त् करने में असफल है तो वह अस्तित्वहीन है . इस सन्दर्भ में एक बात एकदम स्पश्ट है कि कि राज्य के केन्द्र में जनता है और जनता ही राज्य का साध्य है तो फिर संप्रभुता और सर्वोच्चता जनता की ही हुई न कि जनता के हितों के लिए बनायी गयी संस्थाएं संसद ,विधायिका और न्यायपालिका आदि .ह्ां जनता भी इन संस्थाओं की विष्वसनीयता और गरिमा के लिए चिंतित है क्योंकि ये उसके सामूहिक हितों के महत्वपूर्ण साधन है और यह जनलोकपाल बिल इन संवैधानिक संस्थाओं को बचाये रखने और उनकी गरिमा के संरक्षण का कारगर समाधान है . आखिर क्या बात थी कि डा॰ अम्बेडकर ने स्वयं कहा था कि यदि संविधान लागू करने वालों की नियत में खोट है तो यह संविधन महज कागज का पुलिन्दा है और इसी के तह्त जब डा॰ अम्बेडकर हिन्दू कोड बिल लाये तो तत्कालीन सरकार को जनलोकपाल की तरह हजम नहीं हुआ और वे कानूनमंत्री पद से इस्तीफा देकर सरकार से अलग हो गये .हिन्दू्ू कोड बिल इस देष की हिन्दू महिलाओं को अधिकारसंपन्न बनाने का वह मह्त्वपूर्ण बिल था लेकिन तत्कालीन् सवर्णवादी सरकार को हिन्दू कोड बिल् उसी तरह हजम नहीं हुआ जिस प्रकार आज जनलोकपाल बिल वर्तमान भ्रश्ट केन्द्र सरकार और भ्रश्ट सांसदों को हजम नहीं हो रहा है .
सरकार और राजनैतिक दलों को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि कि महज लोकतंत्र के ढांचे को पकड़ कर बैठे रहने के दिन अब लद गये . अब जनता के प्रति व्यवस्था की जबाबदेही और लोकतंत्र मेॅ लोक की साझेदारी लगातार बढ़ाये जाने की जरूरत है.कोई संसद , न्यायपालिका ,व्यवस्थापिका लोक से बड़ी नहीं हो सकती . भारत का संविधान भी भारत की जनता ने ही बनाया है और खुद पर इसे लागू किया है ़ इसलिए अपनी अपनी मर्यादा में ये सभी सर्वोपरि हैं पर लोक यानी जनता जो सही अर्थों में देष है, से सर्वोपरि कोई नहीं है. संसद ,व्यवस्थापिका,न्यायपालिका और सरकार देश की व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग तो हैं पर स्वयं देश नहीं . देश तो सही अर्थों मे जनता ही है . इसलिए जनता की आवाज सांसदों के माध्यम से संसद में और संसद के बाहर जानान्दओलनों के माध्यम सरकार को सुननी ही होगी और उसके आशय को मूर्तिरूप भी देना होगा . सवालों की बाढ़ आयी है पर जबाबों का अकाल पड़ा है . अन्ना ह्जारे का आन्दोलन लोकतंत्र के विकास के पथ पर प्रशस्त है । सरकार ने यदि समझदारी से काम नहीं लिया तो सरकार और देष को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है ।

एशिया का वेनिस पटाया



भगवान स्वरूप कटियार
कभी समुद्र में गहरे उतरे हैं आप ? मौका मिले तो जरूर ऐसा कर के देखिए . अथाह लगने वाली गहराई में हम ज्यों ज्यों धसते चले जाते हैं , हर पल एक नयी दुनियां सामने आती जाती है . जहां सूरज की किरणें नहीं पहुंचती वहां एक समूची दुनियां सांस ले रही होती है . जल का अपना जीवन होता है . जीवन को जितना हिलाइए डुलाइए उसके सत्य ,तथ्य और कथ्य की वास्तविक्ताएं सतह पर तैरने लगती हैं जो चुप्पी लगाए हमारे दिलों की तह में बैठे रहती है . मुझे गत २२जून से ७ जुलाई(२॰११) के अपने दक्षिण -पूर्व एशिया की अपनी भ्रमण यात्रा के दौरान थाइलैण्ड में पटाया बीच का भ्रमण करते हुए कुछ ऐसी ही अनुभूति हुई . गत वर्श जब २॰१॰ में अपनी योरुप यात्रा के दौरान जब मैं वेनिस गया तो वेनिस के सौन्दर्य को देख कर ऐसा लग रहा था मानों कोई सपना देख रहे हों . एक ऐसा शहर जहां कोई मोटर वाहन नहीं . जहां कोई धुआं धक्कड़ नहीं और ना ही किसी तरह का प्रदूषण . आने जाने का साधन पैदल या छोटी छोटी गलीनुमा नहरों में बोट से ही आप दफ्तर , बाजार या घर आ जा सकते हैं . पानी पर तैरता एक खुबसूरत षहर . चारो तरफ फैली स्वच्छ पारदर्षी नीले रंग की एक विषाल जलराषि के मध्य एक आइलैण्ड (छोटा सा द्वीप ).मुझे यह भी बताया गया था कि इससे सुन्दर जगह दुनिया में कहीं नहीं है . दुनियां के महान नाविक और समुद्री यात्री कोलम्बस ने अपनी समुद्री यात्रा वेनिस से ही षुरू की थी .पर पटाया में नीले रंग के अन्तहीन् हिन्द महासागर की चिघ्घाड़ मारती ऊंची ऊंची लहरों पर हाई स्पीड से दौड़ती मोटर बोटों और समुद्री जहाजों को देख कर लगा जैसे यह एक अपने तरह का वेनिस है . पटाया को एषिया का वेनिस कहना कोई ज्यादती नहीं होगी . पटाया बीच दुनिया के खुबसूरत बीचों में से एक है . चारो ओर घने घने पाम और नारियल के बृक्षों से घिरा, उठती गिरती ऊंची ऊंची लहरों वाला नीले हिन्द महासागर की रेत में मीलों फैला शैलानियों का मेला , ऐसा लगता मानो पूरी दुनियां किसी उत्सव को मनाने यहां सिमट आयी हो . आराम कुर्सियों पर लेटे षैलानी ऐसा लगता मानों जीवन का उत्स लूटते जीवन का उत्सव मना रहे हों . स्त्री ,पुरुष बच्चे सब एक ही रंग में रंगे और एक रस में डूबे .वह था नैसर्गिक सौन्दर्य का रंग और रस . वहंा उम्र का दायरा बेमानी था .वाटर स्पोर्ट्स एन्ज्वाय करते छोटे छोटे बच्चे लगता जैसे पानी के बगीचे में सुन्दर रंगीन फूल खिले हों . ठंडी हवाएं बदन को छू कर माहौल को और रोमैंटिक बना देती हैं .
बैकांक एयरपोर्ट से पटाया का सफर लगभग २॰॰कि॰मी॰ का है जिसे कोचवैन से तय करने में ढाई-तीन घंटे लगे.इस ढाई घंटे के सफर में थाइलैण्ड के धान के खेतों की हरियाली और खेतों में नारियल और पाम की पत्तियों से बुने हैट लगाये किसान काम करते दिखे . वे इस सच्चाई की ओर इसारा कर रहे थे कि खेत और किसान के बिना कोई भी सभ्यता कभी पूर्ण नहीं हो सकती है । बल्कि सच तो यह है कि सभ्यता कि विकास यात्रा खेत और किसान से षुरू होकर खेत और किसान पर ही समाप्त होती है . थाइलैण्ड का चावल अपनी क़्वालिटी के लिए पूरी दुनियां में मशहूर है यहां पाम और नारियल के पेड़ो की हरियाली देखते ही बनती है .थाइलैण्ड चावल का निर्यातक देष है . पटाया समुद्र के मध्य बसा एक छोटा द्वीप जैसा है. लगता था मानों ऊंची उंची लहरों वाले विषाल जलराशि समेटे हिन्द महा सागर एक पिता की तरह अपनी बाहें फैलाये हमारा इन्तजार कर रहा था और कह रहा था आओ मेरी संतानों मेरी गोद में समा जाओ . तुम्हारे अवसाद ,तनाव और दुखों की सारी गर्मी खीच लूंगा . मैं सोच रहा था कि किसी के पिता बहादुर तो हो सकते है़ं पर इतने डरावने भी ?.बेषक पटाया में हिन्द महासागर जितना आकर्शक था उतना ही डरावना भी . पर सुखद आष्चर्य यह है कि हम इस डरावने विषाल जलराषि वाले ऊंची ऊंची लहरों पर हम १२॰कि॰मी॰प्रति घंटे की स्पीड से मोटर बोट से दौड़े . मानों पानी पर तेज दौड़ते घोड़े की सवारी कर रहे हों . नीले रंग के स्व्च्छ जलराशि वाला हिन्द महासागर इतना दिलकश कि नजरे हटने का नाम नहीं लेती. लहरों पर सैर करने का वह खुशनुमा यादगार पल मेरी जिन्दगी की बहुमूल्य धरोहर बन गया. अम्बै्रलों के साये में आराम कुर्सियों पर आराम फर्माते दुनिया भर के हजारों षैलानी अपनी निजी जिन्दगी को अपनी महबूबा की तरह बाहों में समेटे जिन्दगी का लुत्फ लेते धरती पर स्वर्ग उतर आने का अहसास दिला रहे थे . इस यात्रा में मैने अपने ट्रेनर की मदद से अन्डमान ओसिन में अंडर वाटर वाक किया . समुद्र के अन्दर पानी में लगभग सौ फुट की गहराई में चलते हुए लग रहा था मानों हम किसी स्वप्नलोक में घूम रहे हों . हमारे आसपास छोटी-छोटी रंगीन मछलियां तथा अन्य समुद्री जीव बहुत सुन्दर लग रहे थे . छोटी -छोटी पहाड़ी नुमा रंगीन समुद्री बनस्पतियों के ढेर खुबसूरत गुलदस्ते जैसे दिखते थे . पानी के अन्दर एक इतनी बड़ी खुबसूरत स्वतंत्र दुनिया भी है इसके बारे में पढ़ा और सुना जरूर था पर देखा कभी नहीं था. वहां हम अपने ट्रेनर के साथ तीन साथी थे जो आपस में एक दूसरे को देख तो सकते थे और स्पर्ष भी कर सकते थे पर एक दूसरे को सुन नहीं सकते थे . हम इसारों से एक दूसरे को समझ और समझा रहे थे . समुद्र की गहराई में सूखी रेत को हांथ में लेकर एक अजीब अनुभूत हो रही थी . दुनियां में इतना नैसर्गिक सौन्दर्य देखने को है कि यदि उसी को देखने को अपने जीवन का लक्ष्य बनालें तो आपसी ईर्शा द्वेश और झगड़ो के लिए वक़्त ही ना मिले . सच में लगभग एक घंटे समुद्र की आन्तरिक दुनियां के सान्निध्य में जीना जीवन के अमूल्य पल के रूप में सदैव स्मरण रहेगा . इसी तरह स्पीड मोटर बोट में बंधे पैराशूट के जरिए समुद्र में उड़ान भरना बेहद रोमांचक था और खतरनाक भी . पर असली जिन्दगी इन्हीं खतरों के बीच होती है जो हिम्मतवालों की किस्मत में ही होती है .बगैर दांव पर लगाये कुछ भी हासिल नहीं होता है .
पटाया, थाइलैण्ड का कमाऊ बेटा है जहां लाखों सैलानी दुनियां भर से आकर समुद्र के नैसर्गिक सौन्दर्य का सुख भोगने आते हैं . रात में रोशनी में नहाया पटाया बीच अमेरिका के लास बेगास जैसा सुन्दर लगता है . पटाया ही नहीं पूरा थाईलैण्ड अपनी सेक्स टूरिज्म की इमेज से मुक्त हो चुका है . थाई सरकार ने इसके लिए सख्त कानून बनाकर इस पर नियंत्रण पाया है . सेक्स टूरिज्म थाईलैण्ड में राजस्व अर्जित करने का मुख्य स्रोत है , यह एकदम झूठ और मिथ्या है . थाईलैन्ड विश्व व्यापार ,बैकिंग और अपने बन्दरगाहों के जरिये देश के अकूत सम्पदा कमाता है जो आय का मुख्य स्रोत है .बैंकाक और पटाया दोनों ही विश्व व्यपार और समुद्री परिवहन के बड़े केन्द्र है़ . थाईलैण्ड दुनिया बड़े चावल उत्पादक और निर्यातक देषों में से एक है . थाईलैण्ड का चावल पूरी दुनियां में मशहूर है . पटाया में जेम्स फैक्ट्री है जहां खानों से हीरे निकाल कर उन्हें साफ और तराशकर पूरी दुनियां में निर्यात किया जाता है . जेम्स फैक्ट्री में एक जेम्स गैलरी और जेम्स मार्केट भी है . जेम्स गैलरी थाईलैण्ड के हीरा उद्योग का सचित्र सजीव इतिहास है जो शिक्षाप्रद और प्रेरणाप्रद दोनों है . जेम्स मार्केट में हीरों की खरीद होती है जहां दुनियां भर के हीरा व्यापारी और शैलानी हीरे खरीदकर लेजाते हैं .बेशक यह एक मंहगा व्यवसाय है पर हीरों के दीवानों की भी एक दुनियां है . सम्राट अषोक ने दक्षिण - पूर्व एशिया में बौध्द धर्म का प्रसार किया और वहां के लोगों को बुध्द की करुणा , प्रज्ञा और जरूरत से अधिक संग्रह ना करने के उपदेष ने इतना प्रभावित किया कि उसे थाइलैण्ड के लोगों ने जीवन में पूरी तौर पर आत्मसात कर लिया है . वे बुध्द से रष्मी तौर से नहीं बल्कि पूरे दिलोदिमाग से प्रेम करते हैं और हार्दिक श्रध्दा रखते हैं. थाईलैण्ड, थाई मसाज और थाई बाक्सिंग के लिए दुनियां भर में जाना जाता है . लगभग ७-८ करोड़ की आबादी वाला यह छोटा सा देष अपनी षालीनता और षिश्ट व्यवहार के कारण दुनियां के षैलानियों को अपनी ओर आकर्शित करता है . थाईलैण्ड का पुराना नाम स्याम है और हाथियों के लिए भी थाईलैण्ड की अपनी अलग पहचान है . हांथी माल ढोने का महत्वपूर्ण परिवाहन का साधन भी है . थाईवासियों का पर्यावरण और वन्यजीव प्रेम अनूठा है . थाईलैण्ड की चार राजधानियां रही हैं . बैंकाक चौथी राजधानी है . पहली राजधानी सुखोथाई , दूसरी राजधानी अयुद्धया और तीसरी राजधानी थनपुपली रही है . बैंकांक जो थाईलैण्ड की वर्तमान राजधानी है सिंगापुर की तरह विष्व व्यापार का महत्वपूर्ण केन्द्र है . नई और पुरानी दिल्ली की तरह ओल्ड और न्यू बैंकाक भी है . यहां आटो रिक्सा को टुक टुक कहा जाता है . थाईवासी अपनी करैंसी बाट का बहुत सम्मान करते हैं क्योंकि उसमें राजा की तस्वीर होती है. उस पर पैर रखना अपराध माना जाता है . थाईलैण्ड भी एक लोकतांत्रिक देष है जहां पार्लियामेन्ट और सुप्रीमकोर्ट जैसी वैधानिक संसथाएं है . वहां भी प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल के साथ देश की शासन व्यवस्था का संचालन करता है . थाई लोकतंत्र एक लम्बे संघर्ष के दौर से गुजरा है . सन १९३२ में ब्रिटिश माडल पर संवैधानिक राजतंत्र के आभ्युदय के बाद थाईलैण्ड अपने लोकतांत्रिक अस्तित्व केलिए संघर्ष रत रहा . वर्श २॰॰६ में भ्रश्ट प्रधानमंत्री तक्सिन शिनावात्रा के तख्ता पलट के बाद वहां दो राजनैतिक संघठन पी ए डी (प्यूपुल एलाइंस फोर डेमोक्रेसी ) और यू डी डी (यूनाइटिड फ्रन्ट फौर डेमोक्रेसी अगेंन्स्ट दिक्तेतार्शिप) उभर कर आये . पी डी को पीली शर्ट और यू डी डी को लाल शर्ट के नाम से लोकप्रियता मिली . थाईलैण्ड में चक्रि वंश का वारिस ही राजा होता रहा है यह परम्परा अभी भी कायम है.थाईलैण्ड का लोकतंत्र निरंतर परिपक्व हो रहा . थाईवासियों का व्यवस्था के सतत बदलाव में भ्रपूर यकीन है इसीलिए कहा जाता है कि थाईलैण्ड क े४५ वर्शों् के लोकतांत्रिक जीवन में४॰ बार् चुनाव हुए . वे किसी भी दुर्व्यावस्था को सहन करते रहने में यकीन नहीं रखते हैं . ऊपर नीचे लाल सफेद तथा बीच में चौड़ी नीली पट्टी वाला राष्ट्रीय ध्वज थाइलैण्ड की शान है जिसे वे अपने केशरिया रंग के धर्म ध्वज के साथ लगाते हैं . बौध्द धर्म वहां का राष्ट्रीय धर्म पर हर किसी को अपने मजहब की आजादी है और उसका समान स्तर और सम्मान है .
थाईलैण्ड के लोग खुशमिजाज स्वभाव के होते हैं .वे दुख में भी खुश रहने और खुश दिखने में यकीन रखते हैं . इसलिए वहां हमेषा उत्सवी माहौल रहता है . वहा थियेटर बहुतायत संख्या में हैं जहां सांस्कृतिक आयोजन निरंतर दिन और रात में चलते रहते हैं . पटाया का टिफिनी षो और बैकांक में एलीफैन्ट शो दर्शकों को बेहद भाता है . भारतीय फिल्मों के गाने वहां षो में अवष्य सुनने को मिल जाते हैं . बैंकाक में ४॰॰ से अधिक छोटे - बड़े बौध्द मन्दिर है़ और हिन्दू मन्दिर भी हैं . यहां २१ एकड़ क्षेत्रफल में फैला स्लीपिंग बुध्दा का विशाल मन्दिर है जिसमें बुध्द की प्रतिमा की लम्बाई ६७ मीटर है .इसी तरह गोल्डेन और राइजिंग बुध्दा के मशहूर भव्य मन्दिर हैं . बैंकाक षहर के मध्य में एक लोकतंत्र का भव्य स्मारक है जो थाईवासियों की लोकतंत्र में अटूट आस्था का प्रतीक है . यहां एक ऐसा चिड़िया घर है जहां टाइगर ,शेर , तेन्दुआ ,भालू ,जिराफ जैसे सभी जानवर कट्घरों या बाड़ों में नहीं बल्कि खुले आसमान के नीचे खुले मैदान में रहते हैं . यहां दर्षकों कोन बन्द वैन में घूमना पड़ता है . यहां भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी के नाम पर इन्दिरा स्क्वायर भी है जहां शापिंग माल से लेकर होटल और रेस्ट्रां भी हैं . थाईलैण्ड की ७५ प्रतिषत आबादी थाई है जो देष के उत्तर , दक्षिण तथा मध्य क्षेत्र से आते हैं . षेश आबादी में १४ प्रतिशत चीनी हैं तथा षेश में मलई ,खेमेर लाओस म्यामार आदि देषों के लोग रहते है़ .थाईलैण्ड अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ साथ अपनी शालीनता के लिए भी दुनियां के शैलानियों को अपनी धरती पर खींच लाता है . बेषक पर्यटन थाईलैण्ड की आय का बहुत बड़ा स्रोत है . पटाया सचमुच एशिया का वेनिस है और यहां बहुत कुछ ऐसा भी है जो वेनिस में नहीं है . क्षेत्र का फैलाव अधिक होने के कारण होटल्स और बाजार अधिक समृध्द हैं .

Thursday, 15 September 2011

विश्व शांति बनाम हथियारों का कारोबार



भगवान स्वरूप कटियार
दुनिया की सबसे बडी ताकत अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को गत वर्श विष्व शान्ति के नोबेल पुरश्कार से नबाजा गया.यह बार बार सिध्द हो रहा है कि व्यक्ति, कुर्सी का चरित्र और चेहरा नहीं बदल बाता पर कुर्सी व्यक्ति का चेहरा बदल देती है.विश्व शान्ति पुरस्कार से नबाजे गये अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देष में हथियारों के कारोबार को लगातार बढावा दे रहे . उसके पीछे सोची समझीे चाल यह है कि दुनियां के गरीब देष विकास करें और आत्म निर्भर बनने की बजाय हथियार खरीदे और आपस में लडे और अमेरिका का हथियार कारोबार फले फूले और उसकी चौधराहट दुनियां में बरकरार रहे.जरा देखें गत पांच वर्शों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढ गया है और पाकिस्तान का हथियार आयात इस बीच १२८ गुना बढा है. यह कैसा मजाक है कि जिन देशों के पास लोगों का पेट भरने के लिए भर पेट भोजन नहीं है वहां की सरकारें हथियारों की हवस पर जनता क पैसा फूंके जा रही है. विडम्बना देखिए कि नोबेल षान्ति पुरस्कार से नवाजे जाने के तुरन्त बाद साउदी अरब के साथ ६॰ अराब डालर के हथियार बेचने का सौदा किया.पिछले तीन दषक का यह सबसे बड हथियार सौदा है. इस सौदे से बोइंग कम्पनी के एफ-१५ बनाने वाले विभाग को आने वाले समय २॰१८ तक के लिए रषन पानी मिल गया. जबकि इस सौदे से पह्ले इसी बोइंग कम्पनी जो दुनियां की सबसे बडी हथियार निर्माता कम्पनी है के प्रबंन्धन और कर्मचारियों में बहश चल रही थी कि बोइंग प्रबंन्धन एफ-१५ लडाकू विमान युनिट के ४४ हजार कर्मचारियों की छटनी करने जारहा था क्योंकि लम्बे समय से इस जेट विमान के खरीददार नहीं मिल रहे थे.मगर बदलाव के नारे के साथ वाइट हाउस में प्रवेश करने के साथ ही ओबामा के हस्तक्षेप के बाद घटनाक्रम् में यह बदलाव तेजी से आया.छटनी की योजना बना रहे बोइंग कंम्पनी अब नये कर्म्चारी भरती करने जारही है और विशेषज्ञों का कहना है कि ओबामा द्वारा साउदी अरब के साथ किया गया यह सौदा हथियार बनाने की इस सबसे बडी कंम्पनी में ७७ हजार नौकरियां सुरक्षित करेगा.
बिडंम्बना देखिए कि साउदी अरब को बेचे जाने वाले एफ-१५ विमान अब पुराने पड चुके हैं.शीतयुध्द के दौरान रूस के मिग विमानोंका मुकाबला करने के लिए इनका निर्माण् किया गया था. आखिर अमेरिका के इस कचरे से साउदी अरब किससे मुकाबला करेगा.तेल के बल पर कमाये अकूत् धन का दुरुपयोग कर अमेरिका जैसे विकसित देश खाडी देशों को पुराने हथियारों को खपाने के अड्डों में तब्दील कर रहे हैं. आतंकवाद से लडाई और सुरक्षा के नाम पर गरीब देषों के पैसे से विकसित देशों की तिजोरियां भरी जा रही हैं.दुनियां का हथियार उद्योग डेढ खरब डालर का है जो वैश्विक जीडीपी का २.७ प्रतिशत है और इस अमानवीय उद्योग पर ९॰ प्रतिशत कब्जा पश्चिमी विकसित देशों का है और उसमें भी ५॰ फीसदी पर अमेरिका का कब्जा है.दुनियां की तीन सबसे बडी हथियार निर्माता कंम्पनियां अमेरिका की हैं। दो धु्रवीय दुनियां के जमाने में अपने अपने खेमें के देशों को हथियारों की आपूर्ति करने में अमेरिका और सोवियतसंघ में होड रहती थी. पर सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनियां भर में हथियारों की आपूर्ति और खपत् में कमी आयी जिसके परिणामस्वरूप बोइंग,
रेथ्योन और लाकहीड जैसी बडी हथियार कंम्पनियों की बैलेंसशीट गडबडा गयी. इन्तारानेशानल पीस रिसर्च गु्रप (सिपरी ) स्टाकहोम के आंकडे भी इस बात पर मोहर लगाते हैं. ओबामा से दुनियां को बहुत उम्मीदें थीं. एक तो अष्वेत हैं इसलिए यह समझा जाता है कि उन्हें तीसरी दूनिया की बेहतर जानकारी है और उनकी समस्याओं के प्रति वे प्रतिबध्द और निष्ठावान होंगे. पर जिस तरह से वाशिंगटन नीतकारों ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के हथियार खपाने के लिए आग से खेलना षुरू कर दिया है. यह क्डुवी सच्चाई है कि अमेरिका चाहे लाख घोषणा करे पर अलकायदा,हमास,से लेकर लिट्टे तक के आतंकवादी संघळन उसी के हथियारों पर पलें हैं. अमेरिकी हथियारों की खपत बढे इसके लिए जरूरी था कि अलग थलग पडे देषों में आपसी झगडे बढें. अमेरिका ने दुत्कार और पुचकार की नीत अपना कर अपना अभियान चला रहा है .पकिस्तान-भारत- अफगानिस्तान,मध्य-पूर्व,खाडी और अफ्रीकी देशों के उलझे तनावपूर्ण संम्बन्धों अमेरिका की भुमिका छिपी नहीं है।नब्बे के दषक में तीसरी दुनियां की कई अर्थव्यवस्थाओं ने मैकडोनाल्ड और कोका कोला के साथ ही बोइंग जैसी कंम्पनी के लिए रास्ता साफ कर दिया था.एक रपट में यह भी खुलासा किया गया कि अमेरिकी कंम्पनियां अन्तरराश्ट्रीय कानून से परे जाकर २८ से ज्यादा आतंकवादी संगळनों को हथियार बेंच रही हैं.हम भले ही यह समझें कि अमेरिका स्तर पर् आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रहा है पर इस आड में उसने अकूत धन कमाया है. अमेरिका के रक्षा विभाग ने गत वर्श अमेरिकी काग्रेस को दी गयी सूचना में खुलासा किया है कि १९९५ से रक्षा सौदों में हर साल १३ अरब डालर की बढोत्तरी हो रही है.२॰॰१ के बाद से रक्षा सौदों की रफ्तार तीन गुनी हो गयी है.भारत पहले हथियार रूस से खरीदता था पर २॰॰१ में बुश प्रशासन के समय से शुरू हुई दोस्ती ने अमेरिकी हथियार कंपनियों के लिए दिल्ली के दरवाजे खुल गये हैं.गत २॰॰९ में भारत ने बोंइंग से निगरानी विमान खरीदने के लिए २.१ अरब डालर का समझौता किया था और हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरा राष्ट्रपति ओबामा ने ४.१ अरब डालर का सौदा विमान आपूर्ति के लिए किया.सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आगामी एक दशक में भारत अपने सैनिक साजो सामान पर १॰॰ अरब डालर की भारी भरकम रकम खर्च कर सकता है जिसका सबसे बडा हिस्सा अमेरिकी हथियार कंपनियों को जाने वाला है.ऐसे में दक्षिण एशिया में शान्ति की अमेरिकी कवायतों को समझा जा सकता है.विकीलीक्स द्वारा फरबरी २॰१॰ मे़् जारी की गयी एक केबल में मैसाचुसेटस के सीनेटर जान कैरी अमेरिकी हथियार कंम्पनियों के लिए लाबिंग करते नजर आ रहे हैं.यद्यपि अमेरिकी दूतावासों पर राजनैतिक दखलंदाजी और हथियार कंपनियओं के हित साधने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं ब्राजील और नार्वे की विकीलीक्स केबलें भी की हथियार दलाली की बात प्रमाणित करती है.
शान्ति का मशीहा भारत हथियार खरीदने में सबसे आगे है. स्टाकहोम की संस्था इन्तारानेशानल पीस रिसर्च इन्स्तीत्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने दुनियां में सबसे अधिक हथियार आयात किये हैं. दुनियां के हथियार उधोग का ९ फीसदी कारोबार भारत द्वारा किया गया और पिछ्ले ५ सालों में भारत का हथियार आयात २१ गुना बढा और इसी अवधि में पाकिस्तान का हथियार आयात १२८ गुना बढा.यह कैसी बिडंम्बना है कि जिन देशों में जनता को भर पेट रोटी मयस्सर ना हो वहां हथियारों कि हवस पर सरकारें जनता का पैसा वेमुरौअत फूंक रही हैं.दुनियां के १॰ बडे हथियार निर्यातक देश चीन को छोड कर पश्चिमी देश हैं.जी-८ के देशों वैश्विक हथियार कारोबार के ९३ फीसदी हिस्से पर कब्जा है शेष ७ फीसदी में तीसरी दुनियां के देष् हैं.भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अन्तरराश्टीय संस्था त्रनास्पेरेंसी इन्टरनेषनल के अनुसार अंतरराष्ट्रीय हथियार उद्योग दुनियां के तीन महाभ्रष्ट उद्योगों मंे एक हैअमेरिका
हथियार उद्योग को बढावा देते हुए विश्व शान्ति का मशीहा नहीं् बन सकता .कम से भारत जैसा दुनियां का सबसे लोकतंत्र को तो यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए.

अमेरिकी कंगाली का सच



भगवान स्वरूप कटियार
दुनियां पर अपनी धौंस और चौधराहट चलाने वाला अमेरिका आज फिर कंगाली की कगार पर खड़ा है . बड़ी मुश्किल से मंदी से उबर ही रहा था कि फिर से वह गहरे आर्थिक संकट फंसता दिखाई दे रहा है . खोखली अर्थव्य्ावस्थाओं का यही हश्र् होता है . जो अर्थव्यवस्था उत्पादन , रोजगार और घरेलू बाजार पर आधारित नहीं होती है उसका अन्तततोगत्वा यही परिणाम होता है ़ काष हमारे अर्थषास्त्री प्रधानमंत्री मनमोह्न सिंह अर्थषास्त्र के इस मर्म को समझ पाते. लिबरलाइज़ेशन ( उदारीकरण ) पूंजीवद को बढ़ावा देता है ,यह् गरीबी का समाधान नहीं है . गरीबी का समाधान है रोजगारपरक उत्पादनोन्मुख अर्थव्यवस्था जिससे दुनियां के अधिकाँश देश विमुख होते जा रहे हैं . मुनाफा और पूंजी व्यापारियों के सरोकार हो सकते हैं सरकारों के नहीं . सरकारों के सरोकार सीधे जनता के हितों से जुड़े होते हैं. रेटिंग एजेंसी स्टैन्डर्ड एण्ड पुअर द्वारा अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटाने से हड़कम्प मच गया और दुनियां का षेयर बाजार धड़ाम से औंधे मुंह नीचे गिरा . दुनियां की वे बैंके जो काले धन का कारोबार करती हैं कालाधन वापस करने पर राजी होती नजर आरही हैं , आखिर कहां लगायें काला धन जब षेयर बाजार का यह हाल है. दुनिया की अर्थव्यवस्था में जिस तरह का हड़कम्प मचा है उससे मंदी के संकट की आशंकाएं मडराने लगी हैं . जी-७ के देष विचार विमर्श में जुट गये हैं . अमेरिका अन्दरूनी और बाहरी कई संकटों से जूझ रहा है . भले ही रिपब्लिक और डेमोक्रेट में समझौते से सरकारी कर्ज की सीमा बढ़ाने का संकट हल हो जाय पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बजट घाटा कम करने और कर्ज अदायगी की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है क्योंकि अमेरिकी ट्रेजरी और डालर दुनियां में सबसे विश्वसनीय माने जाते हैं और इसी आधार पर अमेरिकी बांडों पर निवेश सबसे सुरक्षित माना जाता है . इस तरह हम कह सकते हैं कि द्वितीय विश्वयुध्द के बाद विश्वार्थाव्यवस्था के बने ढांचे को गहरा झटका लगा है और इसीलिए चीन जैसे देश ने डालर को विश्व की मानक मुद्रा मानने पर सवाल खड़ा कर दिया है .
जाहिर है कि बड़े आर्थिक संकट का डर् उभरने लगा हैं . लगता है कि मंदी की मार फिर से अमेरिका को तबाह करेगा . अपना बोया खुद को ही काटना पड़ता है , वही अमेरिका के साथ हो रहा है . ईराक को तबाह और बरबाद करने में अमेरिका ने अपने देष की अर्थ व्य्ावस्था दांव पर लगा दी उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी विष्व अर्थव्यवस्था में नये षक्ति केन्द्र उभर रहे हैं . भारत के षेयर बाजार में भी भारी गिरावट आयी है क्योंकि आज के दौर में सारी अर्थव्यवस्थाएं वैष्विक हैं और एक दुसरे से जुड़ी हैं . पर भारत पर षायद इसका इतना बुरा असर न पड़े क्योंकि भारत की अर्थ व्यवस्था घरेलू बाजार पर आधारित है . विष्व अर्थव्यवस्था में गिरावट हमारे निर्यात पर गहरा असर डालेगा. ४॰ अरब डालर भारत ने अमेरिका निवेष किये हैं इस कारण भारत को भी गहरा झट्का लग सकता है .मनमोहन सिंह की सारी पढ़ाई इस देष के काम न आयी .घरेलू कारणों से हमारी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा सकती है जैसे खेती की उत्पादकता और कृषि उत्पादों की वितरण की समस्या या फिर बुनियादी ढांचे की कमी और भ्रश्टाचार की काली कमाई आदि . इससे एक बात उभर कर सामने आयी जो अर्थव्यवस्थाएं घरेलू बाजार और बचत पर नहीं टिकी हैं उनका ढहना तय है . इस माह का पहला हफ्ता अमेरिका के राजनैतिक और आर्थिक इतिहास में एक शर्मनाक लमहे के रूप में याद किया जायेगा . भले ही रिपब्लिक और डैमोक्रेट के समझौते से अमेरिका डिफाल्टर होने से बच गया हो पर वैश्विक त्रासिदी तो आ ही गयी दुनियां भर के शेयर बाजार धराशायी हो गये . अमेरिका के दक्षिणपंथियों द्वारा खड़ा किया गया कर्जसीमा का यह संकट उतना मायने नहीं रखता जितना विष्वअर्थव्यव्स्था की खतरनाक संवेदनषीलता और योरुप का गहराता संकट रखता है . ऐसे में स्टैन्डर्ड एण्ड पुअर एजेंसी ने अमेरिका की रेटिंग कम करके अमेरिका की कर्ज चुकाने की क्षमता पर एक गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है गौरतलब है कि इसी एजेंसी ने अमेरिका की रेटिंग ट्रिपिल ए की थी और अब घटा कर डबल ए कर दी . अमेरिका को सरकारी कर्ज की सीमा बढ़ाने की बह्स में उलझने की बजाय कुछ ऐसा करना चाहिए था जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी था जैसे अमेरिका को अपना पूरा ध्यान रोजगार अवसर बढ़ाने और विकास दर की गति हासिल करने पर केन्द्रित करना चाहिए और घरेलू और बाहरी कर्ज के मामलों को गंभी्रता से हल करने की कोषिष करनी चाहिए जिसने लाखों परिवारों को तबाही की आग में झोंक दिया . अमेरिका को अपने नागरिकों की क्रयषक्ति बढ़ानी चाहिए थी तथा सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना चाहिए था न कि घटाना़ . अमेरिका की सरकारी कर्ज सीमा १४.३ ट्रिलियन डालर है और अगर इसे सेनेट द्वारा न बढ़ाया गया होता तो अमेरिकी सरकार डिफाल्ट हो जाती और उधारी नहीं ले पाती . यह उसकी कानूनी सीमा थी . काष भारत की भी कर्ज की कोई कानूनी सीमा होती और कर्ज लेने तथा न चुका पाने की जबाबदेही होती . सरकारी कर्ज का बोझ मह्गाई और टैक्स के रूप में देश के हर आम नागरिक पर पड़ता है जबकि फायदा सांसद ,मंत्री , नौकरशाह , व्यापारी उद्योगपति सब्सिडी और मोटी तनख्वाहों और रिष्वत के रूप में उठाते हैं . लगभग प्रतिवर्श सांसदनिधि और संासदों के भत्ते बढ.ाये जाते जिससे देष पर भारी आर्थिक बोझ बढ.ता है और मजे की बात यह कि सांसदों के भत्ते आयकर सीमा से बाहर हैं . कानून बनाने वाली हमारी संसद जनहितों और जनमत की उपेक्षा कर स्वार्थगत कानून बनाती है . संासद की यह सरासर संवैधानिक तानाषाही य जनता की भाषा में खुली गुंडई है . इस पर अंकुष लगाने का संवैधानिक अधिकार सीधे जनता के हांथ मे होना चाहिए ताकि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की लगाम अपने हांथ में रख सके और तथाकथित जनसेवक जनभक्षक न बन सकें . एक चौकाने वाला सच यह कि हमारे देष का राजस्व व्यय ६३ प्रतिशत है और पूंजीगत व्य्ाय मात्र ३७ प्रतिषत है . उल्लेखनीय है कि पूंजीगत व्यय से विकास योजनायें चलती हैं और राजस्व व्यय से सरकारी खर्च जबकि चीन में पूंजीगत व्यय राजस्व व्यय से अधिक है . ऐसा उन तमाम देषों में है जहां कि सरकारें ईमानदार हैं और जनहित को सर्वोपरि मानकर अपना कामकाज करती हैं .
भारत की तरह अमेरिका भी इस सच्चाई से मुंह मोड़ रहा है कि उसकी यह दुर्गति युध्द पर खरबों डालर आग में ईंधन की तरह झोंकने से तथा घाटे और कर्ज में डूबे कार्पोरेट कंपनियों और बैंकों के बेलआउट पर लुटाए खरबों डालर की बजह से हुई है . भारत की सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि भारत की तबाही की जड़ में मूल कारण भ्रश्टाचार है जिसके जनक सिर्फ और सिर्फ राजनेता हैं . राजनीत का अपराधीकरण भ्रश्टाचार के कारण हुआ और आज संसद और विधान सभाओं में बैठे सफेदपोश अधिकाँश दागी अपराधी और करोड़पति हैं . जनता सीधा एक सवाल पूछती है कि गरीब घरों, किसान परिवारों से आये मुलायम , लालू ,पासवान ,मायावती जैसे तमाम नेता जो मूलरूप से २ एकड़ से अधिक के जोतदार नहीं रहे अरब-खरब पति कैसे होगये जबकि इनका न कोई कारोबार है न कोई उद्योगधंधा . अमेरिका में आये इस संकट से यदि हमने समय रहते सबक न लिया तो हमारा जहाज भी बीच मझधार में डूबेगा और हम कुछ नहीं कर पायेंगे पछताने के सिवा .

जबाबदेह लोकतंत्र के लिए चुनाव सूधार जरुरी


भागवान स्वरूप कटियार
आजादी के बाद के ६४-६५ सालों में संसदीय लोकतंत्र ने देशवासियों को जिस तरह निराशा और हताशा किया उससे एक बात तो साफ है कि जनता ने जिन्हें चुन कर संसद और विधान सभाओं में भेजा वे देशवासीयों की कसौटी पर खरे नहीं उतरे । भ्रष्ट राजनीत और भ्रष्ट नौकरशाही के गठजोड़ ने देश को एक उपनिवेश में तब्दील कर दिया जहां भ्रश्टाचार के साम्राज्य में जनता की कोई आवाज नहीं होती . जनता तो महज मतदान तक सीमत है जैसे कोई गरीब साहूकार की बही में अंगूठा लगा कर जिनदगी भर के लिए बन्धक हो जाता है ़ लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है पर हिन्दुस्तान में उसकी स्थिति नौकर से भी बदतर हो है हमारी चुनावी प्रक्रिया में ही ऐसी खामियां हैं जिसके कारण धनबल और बाहुबल का सहारा लेकर संसद और विधान सभाओं में घटीया और भ्रष्ट - अपराधी लोग चुन लिये जाते हैं पर् स्वच्छ छवि वाले,ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ तथा देशभक्त लोग चुन कर नहीं आपाते . यही बजह है देष में व्यवस्था नहीं बदलती सिर्फ सत्ता बदलती है .भ्रष्टाचार में आंकठ डूबा यह देश आंतकी हमलों तथा आंन्तरिक खतरों और बाह्य सुरक्षा के खतरों से जूझ रह है . महगाई ने लोगों का जीना दूभर कर दिया और हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि उनके पास जादू की छड़ी नहीं . मतदान के द्वारा जनता का भरोसा और विष्वास की षक्ति अगर उनकी जादू की छड़ी नहीं बन सकती तो यह उनकी राजनैतिक इच्छाशक्ति का दिवालियापन है .
चुनाव सुधार से हमारी अपेक्षाए क्या हैं ,इसी से तय होंगी चुनाव सुधार की षर्ते और व्यवस्थाएं . सबसे पहले तो हम अनिवार्य मतदान के प्रावधान के जरिये सभी देशवासियों को जबाबदेह् सरकार और जबाबदेह विपक्ष चुनने में भागीदार बनायें ताकि छù बहुमत क ेबल पर अल्पमत की सरकारें ना चुनी जा सकें . अपराधी और अपराधी छवि के लोग चुनाव में प्रत्याषियों के रूप में हिस्सा ना ले सकें इसके लिए भी कानून बना कर वन्दिश लगाये जाने सख्त जरूरत है . आस्ट्रेलिया जैसे अनेक देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है जहां मतदान के दिन कोई अवकाश नहीं होता है . वहां यह चुनाव प्रक्रिया एक सप्ताह तक चलतीन है . बीमार अथवा चलने फिरने में असमर्थ व्यक्ति के घर जाकर मतदान संम्पन्न कराया जाता है .दृढ़ इच्छाषक्ति से सबकुछ संभव है . बेहतर हो चुनाव सरकारी खर्चे पर हो अर्थत किसी भी राजनैतिकदल को चुनाव में किसी भी रूप में धन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाय ताकि धन उगाही का मूल स्रोत ही खत्म हो जाय, और धनबल पूर्णरूपेण रोक लगायी जा सके. सभी पार्टियों में आन्तरिक लोक्तंत्र सुनिश्चित किया जाय जिसके लिए नियमित चुनाव चुनाव आयोग के अधीन करवाये जांय जिसमें कर्मठ और सक्रिय कार्यकरताओं को भी अवसर मिल सके और परिवारवाद पर रोक लगे और ल्ग नीचे चुन कर ऊपर तक पहुंचें .सभी पार्टियां चुनाव आयोग द्वाारा निर्धारित सदस्यता षुल्क के आधार पर सदस्य बनायें और उस सदस्यता धनराशी का सरकारी आडिट हो और चुनाव आयोग के माध्यम से सभी दलों की आडिट रिपोर्ट संसद में पेष की जाय ताकि देशवासी भी राजनैतिक पार्टियों की हकीकत से वाकिफ हो सकें . गांन्धी जी के अनुसार राजनीत को सहज और सादगीपूर्ण बनाया जाय ताकि आम आदमी भी राजनीत में अपनी सक्रिय भागीदारी कर सके . हर पार्टी का लिखित सिध्दान्त एवं संविधान हो और देश के लिए कार्यक्रम की रूपरेखा भी हो जो चुनाव आयोग के यहां पंजीकृत हो और किसी भी तरह के विचलन या उनके उल्लघन पर आयोग को कार्यवाही का अधिकार हो . सांसदनिधि और विधायकनिधि पूर्णरूप से समाप्त की जाय क्योंकि इसके दुरुपयोग के परिणाम हम रोज भोग रहे हैं . सांसदों के अनापसनाप वेतन और सुविधाएं उन्हें लालची और सामन्ती प्रवृत्ति का बनाती हैं जबकि सही मायनें में वे जनता के सेवक हैं पर उनका व्यवहार शासकों जैसा होता है . जनप्रतिनिधियों से सुरक्षाव्यवस्था तुरन्त हटा लेना चाहिए ताकि जनता और उनके बीच नजदीकियां विकसित हो सके जैसा कि आजादी के बाद के एक दो दसकों में एक पारस्परिक रिष्ता रहा है . लोकषाही को मजबूत और देश के लिए उपयोगी बनाने के लिए लोक का सषक्तीकरण बेहद जरूरी है . जनप्रतिनिधियों की जबाबदेही संसद और विधान सभाओं के साथ साथ जनता के प्रति भी होना चाहिए ताकि जनता उन्हे अपना सच्चा प्रतिनिधि महसूस कर सके . संसद और विधान सभाओं के प्रत्याशी अपने जन्म स्थान वाले चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़े . अन्य किसी चुनाव क्षेत्र से चुनाव लडना राजनीतिक बेईमानी है. और इसी प्रकार राज्य सभा के सदस्य को प्रधानमंत्री और विधान परिषद् के सदस्य को मुख्यमंत्री चुननें की पात्रता में ना रखा जाय . संसद और विधान सभाओं की की कार्यवाही सत्रों की मीटिंग्स की संख्या और बढ़ाई जानी चाहिए तथा नियमों में सुधार कर सभी बैठकों में सभी सदस्यों की उपस्थिति को अनिवार्य किया जाय . आखिर उसके लिए उन्हें सरकारी खजाने से खासी मोटी रकम भुगतान की जाती है जो जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है . संसद और विधान सभाओं का बहिश्कार तथा उनको अवरुध्द करने को गैर कानूनी बनाया जाय ताकि अधिक से अधिक काम को अंजाम दिया जा सके . कोशिश की जानी चाहिए कि सत्तापक्ष और विपक्ष एक सौहार्दपूर्ण ढंग से सकारात्मक दृश्टिकोण से सदन के संचालन में सहयोग करें आखिर वे सब भी तो देश के प्रति प्रतिबध्द है़ं . निराधार और मिथ्या आरोप - प्रत्यारोप और महज आलोचना के लिए आलोचना से बचा जाना चाहिए . हम दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं ,हमें तो दुनियां का रोल माडल बनना चाहिए . संसद या विधान सभाओं में सदस्यों के योगदान तथा सामूहिकरूप से संसद और विधान सभाओं के योगदान का लेखाजोखा पटल पर पेश किया जाना चाहिए ताकि देश की जनता उनकी औकात आंक सके और चुनाव क्षेत्रों में जाने पर पूंछ सके कि फला मुद्दे पर आप चुप क्यों रहे या ऐसा बोलने के बजाय ऐसा क्यौं बोले क्योंकि आखिर वे हैं तो अपने मतदाताओं की ही आवाज .आज संसद बनाम सड़क की बहस छिड़ी है जो बेजह और बेबुनियाद है . संसद ,संसद है और सड़क यानी जनता ,जनता है . पर दोनों की सर्वोच्चता अपनी अपनी जगह है और सर्वोच्च्तताओं को टकराने की बजाय समन्वय और सहयोग से काम करने की जरूरत है . आखिर दोनों का केन्द्रक तो देश और् देशहित ही है . जब देश ही नहीं होगा तो दोनों का अस्तित्व भी नहीं होगा . आज संसद और विधान सभाओं में जिस तरह के लोग चुन कर आरहे हैं और स्वार्थपरिता में लिप्त होकर देश को दरकिनार कर रहे हैं ,सारा संकट उसी से खड़ा हुआ और उसी ने संसद और संसदीय राजनीत की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा किया है . जिससे पूरा राजनैतिक समाज मुंह चुरा रहा है . जब कोई स्वतःस्फूर्ति जनान्दोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए अंहिसकरूप में सड़कों पर उतर आता है तब संसद की दीवारें हिलने लगती हैं और उसे संसद विरोधी और संविधानविरोधी कहा जाने लगता है . जबकि वह आन्दोलन सिर्फ और सिर्फ भ्रष्ट और निरंकुश सत्ता के विरोध में एक सकारात्मक बदलाव के लिए खड़ा होता है . गान्धी जी बराबर कहते रहे कि असली लोकशाही संसद और विधान सभाओं से बाहर जनता के बीच रहती है और उसे मजबूत करने की जरूरत है ताकि संवैधानिक संस्थाओं को जबाबदेह , पारदर्शी और जनोन्मोख बनाया जा सके . और डा॰ लोहिया इसीलिए ताजिन्दगी जनान्दोलन की राजनीत करते रहे और महज एक बार संसद में चुनकर गये . आचार्य नरेन्द्र देव जैसे देश भक्त को चुनाव में कैसे मात दी जाती है किसी से छिपा नहीं है .
अमेरिका ,कनाडा और डेनमार्क ,स्वीडन ,स्विटजरलैंड , आस्ट्रेलिया , जापान तथा सिंगापुर आदि देषों से हमें सीखना चाहिए कि दुर्व्यावस्था को कैसे एक कारगर व्यवस्था में तब्दील किया जाय ना कि यह कह कर छुट्टी पा ली जाय कि सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं है . चुनाव प्रक्रिया में राइट टू रिजेक्ट और राइट तू रिकाल के प्रावधानों के साथ साथ ऐसे प्रावधान भी किये जांय कि संसद के बाहर से भी जनता की आवाज सुनी जाय और उन्हें आउटसाइडर कहकर उपेक्षित या बहिष्कृत ना किया जाय . राश्ट्रीयव्यापी मुद्दों पर रिफरेंन्डम और प्रिलेगिस्लेटिव डिस्कोर्स की भी व्यवस्था का प्राविधान लोकशाही को मजबूत बनायेगा .इन सभी महत्व्पूर्ण मुद्दों पार राश्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस की जरूरत है .पर संसद और संसदीय राजनीत का चेहरा बदलने के लिए चुनाव सुधार समय की मांग है हमारी जरूरत भी .

Monday, 5 September 2011

व्यवस्था परिवर्तन बनाम सत्ता परिवर्तन

भगवान स्वरूप कटियार
हम ६२-६३ सलों से चुनाव के जरिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन कर रहे हैं,जबकि समय का तकाजा है व्यवस्था परिवर्तन का . वैसे सत्ता परिवर्तन से भी व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है बषर्ते सत्ता में बैठे लोगों के अन्दर व्यवस्था परिवर्तन की इच्छा षक्ति ,प्रतिबद्धता और जनसरोकारों के प्रति ईमानदारी हो . हमारे ताजे राजनैतिक इतिहास में दो ऐसे उदाहरण दिखाई देते हैं जब व्यवस्था परिवर्तन की पहल की गयी और उन्हे अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी . डा॰ अम्बेड्कर जब कानून मंत्री की हैसियत से हिन्दू कोड बिल संसद में लाये तो उसे स्वीकार नहीं किया गया और उन्होंने कानून मंत्री पद से स्तीफा दे दिया . हिन्दू कोड बिल हिन्दू समाज की स्त्रियों की सामाजिक - आर्थिक स्थिति सुधारने का बुनियादी समाधान था . जिसे बाद की सरकारों ने टुकड़ो-टुकड़ो में कमजोर तरह से उसके प्रविधानों को लागू किया . जनता से चुनी गयीं सत्ताएं जनता को अधिकार और सत्ता सौपने में बहुत डरतीं हैं . दूसरा उदाहरण है जब वी॰पी॰ सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिसें लागू करने का फैसला लिया ,जैसे भुचाल आ गया . क्या क्या नहीं सहा सामाजिक न्याय के उस महानायक ने ़ किसी के पास मंडल के विरोध में ठोस तर्क नहीं थे . दबी कुचली कौमों को उठाने का काम क्यों किया जाय वे तो सिर्फ षासित होने के लिए हैं .पर बिडम्बना देखिए कि कंमडलवादियों ने भी अपनी राजनीत का सबसे अधिक राजनीतीकरण किया जिसके तहत कल्याण सिंह, उमा भारती ,विनय कटियार ,गोपीनाथ मुन्डे जैसे नेता स्थापित हुए.यह अलग बात है कि कंमडलवादी उन्हें हजम नहीं कर पाये . आज जन लोकपाल कानून का मुद्दा भी व्यवस्था परिवर्तन का मुद्दा है जिसे कोई भी राजनैतिक दल हजम नहीं कर पा रहा है . वे सिर्फ चुनाव को ही लोक्तंत्र मानते है और उसे वहीं तक सीमित भी रखना चाहते हैं . जनता को मतदान का अधिकार देकर सरकार के जनता कए प्रति सारे दायित्व समाप्त हो जाते हैं . सरकार में बैठे लोग सोचते हैं कि संसद ही सर्वोपरि है . यह बात कानून पास कराने तक तो सच है ,उसके लिए तो संसद या विधायिका सर्वोपरि हो सकती है . पर जनता के द्वारा चुनी गयी संसद और उसके प्रतिनिधि संासद जनता से ऊपर कैसे हो सकती . लोकतंत्र में तो जनता और उसके सामूहिक हित ही सर्वोपरि होते हैं . इस तरह संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देना अंहकार है और इसी अंहकार के कारण सभी क्षेत्रों में भ्रश्टाचार फैला है .
लालू, मुलायम,और मायावती जब लोकतंत्र की दुहाई देते हुए कहते हैं कि यदि लोकतंत्र ना होता तो उनके जैसे लोगों को कभी सत्ता नसीब नहीं होती , पर उनसे लोकतंत्र को क्या मिला-भ्रश्टाचार और राजनीत का अपराधीकरण. क्या यही थे डा॰ अम्ब्रडकर और डा॰ लोहिया के आदर्ष और सपने . क्या लोकतंत्र का फलना फूलना भ्रश्टाचार का फलना फूलना है ,राजनीत का अपराधीकरण होना है. तो लानत है ऐसे लोकतंत्र पर और हम गुलाम बेहतर थे कमसेकम एक व्यवस्था तो थी और हम अफसोस कर लेते थे कि क्या करें हम परतंत्र थे . आज जरूरत है लोकषक्ति को मजबूत करने की क्योंकि लोकषक्ति ही लोकषाही की असली ताकत है और इसी लोकषक्ति से निरंकुष सत्ता की बांह मरोड़ी जा सक्ती है . सत्ता परिवर्तन को गांधी ने कभी आजादी नहीं माना . इसीलिए उन्होंने आजादी के बाद कंग्रेस को खत्म कर लोकसेवक संघ बनाने की बात कही थी . वे चाहते थे कुछ अच्छे लोग जनता के बीच रहें क्योंकि असली सत्ता तो जनता की है . जयप्रकाष नारायण भी लोकषक्ति मजबूत करने के लिए संघर्शरत रहे .जवाहरलाल नेहरू उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाना चाहते थे पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया और ताजिन्दगी जनता के बीच जनता की लड़ाई लड़ते रहे़.
देष में एक प्रभावी और स्वायत्त लोकपाल देष में एक बुनियादी परिवर्तन कारगर उपाय है जिससे भले ही व्यवस्था पूरी तरह न बदले पर परिवर्तन की संभावनाओं का सषक्त मार्ग प्रषस्त हो सकता है और परिवतन के बहुत सारे दरवाजे खुल सकते हैं . वैसे व्यस्था में आमूल चूल परिवर्तन के लिए तो इस पूंजीवादी व्यवस्था के सारे ढांचे को ही ढहाना होगा और उसकी स्थान पर श्रम की सर्वोच्च सत्ता कायम करनी होगी . यही था हमारे क्रान्तिकारियों का सपना जिसके लिए उन्होंने षहादत दी . आखिर स्वयत्त और प्रभावी लोकपाल से डर कौन रहा है? भ्रश्टाचार से दुखी कौन है? आम आदमी ना कि भ्रश्टाचार में लिप्त सत्ता वर्ग और उसके कृपापाात्र .जिस समय देष में बहस होनी चाहिए कि कैसा लोकपाल चाहिए पर मुद्दे से भटकाने के लिए बहस की जा रही संसद की गरिमा पर , प्रधानमंत्री और न्यायपालिका की गरिमा और विष्वसनीयता पर . षायद वे भूल रहे हैं इन पवित्र संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और विष्वसनीयता को सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों ने ध्वस्त किया है जो उसकी दुहाई दे रही है.
संसद की गरिमा और प्रधानमंत्री तथा न्याय्ापालिका की विष्वसनीयता यदि आज बची होती तो षायद लोकपाल जैसी संस्था के बारे में सोचने की जरूरत ही ना पड़ती और उसे पुनः जीवित करने के ले ही एक स्वायत्त और प्रभावी लोकपाल संवैधानिक संस्था की जरूरत महसूस की जा रही ताकि अंहिसक तरीकों से देष को भ्रश्ट काले अंग्रेजों से मुक्त कराया जा सका . और इसके लिए यदि संविधान में संसोधन और धन की आवष्यकता है तो उससे गुरेज क्यों है . लोकपाल के गठन से भ्ररश्टाचार पर प्रभावी अंकुष लगेगा उससे देष को राजस्व की एक बड़ी धनराषि अर्जित होगी . इसी के साथ आम आदमी से जुड़े मुद्दे जैसे एक जैसी निषुल्क षिक्षा, चिकित्सा,न्याय और रोजगार व्यव्स्था के लिए संघर्श को भी आजादी की इस दूसरी लड़ाई से जोड़ने की जरूरत है़ ़ आज कोई भी राजनैतिक दल खुल कर अण्णा हजारे के मसौदे के साथ
खड़ा नहीं दिखता सिर्फ कुछ वामपंथी दलों के . सामाजिक न्याय के नेता जैसे रामविलास पासवन , मुलायम सिंह यादव ,मायावती के पैरों के नीचे की धरती ही खिसक गयी हो . गरीब किसान परिवार से आये इन नेताओं से बड़ी उम्मीदें थीं . डा॰ अम्बेडकर और डा॰ लोहिया के नाम पर ये सब एक बड़ी लानत हैं . सामाजिक न्याय के ये सब अपराधि हैं और जनता तथा इतिहास इन्हें कभी मांफ नहीं करेगा . आखिर गरीब घरों के इन नेताओं के पास अरबों रुपयों की सम्पत्ति आयी कहां से? ये सब देषद्रोही है और स्वाय्ात्त लोकपाल इन सबको जेल का रास्ता दिखायेगा . इसलिए लालू जी कहते हैं कि लोकपाल तो नेताओं पर अफ्सर बैठाने की साजिष है . नेता क्या कानून से ऊपर है लालू जी जो उसे घोटाले पर घोटाले करने की छूट देदी जाय .
समझनेकी पहली बात यह है कि अण्णा हजारे का प्रस्तावित लोकपाल कानून कोई व्यक्ति नहीं एक पूरी संवैधानिक संस्था है . इसमें जांच विभाग और अदालत में मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन विभाग और इन सबकी निगरानी रखने के लिए अध्यक्ष सहित ग्यारह सदस्यों का पैनल होगा . यह व्यवस्था केन्द्र सरकार के ४॰ लाख कर्मचारियों के लिए होगी और इसी तर्ज पर हर एक राज्य में लोकायुक्त संस्था होगी . देष का कोई भी नागरिक लोकपाल या लोकायुक्त के पास केन्द्र या राज्य के किसी कर्मचारी या प्रतिनिधि के भ्रश्टाचार की षिकायत लेकर जा सकेगा . पूरी पारदर्षिता से समयबध्द ढंग से जांच कर संम्धित को दंडित किया जायेगा . अगर जांच प्रधनमंत्री , जजों और सांसदों के विरुध्द है तो जांच षुरू होने से पहले लोकपाल की सात सदस्यीय पीठ जिस्में विधिक पृश्ठभूमि के सदस्य होंगे तय करें गे कि जाांच होनी चाहिए या नहीं. . लोकपाल सरकार के प्रति नहीं बल्कि जनता के प्रति जबाबदेह होगी इसलिए लोकपाल को किसी की भी षिकायत पर सर्वोच्च न्यायालय के आधाार पर दंडित किया जा सकेगा . देष आज बेहद नाजुक दौर में है .देष के रक्षक ही देष के दुष्मन हैं .यह लड़ाई जटिल और कठिन पर लड़नी तो है और लड़ी भी जायेगी .