Thursday, 5 May 2011

समय की आवाज


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जनक्रान्ति की इबारत के निहितार्थ



भगवान स्वरूप कटियार
कोई भी बडा जनाक्रोश किसी बडे बदलाव के लिए प्रसवपीडा की तरह होता है जिसकी कोख से जनक्रान्ति जन्म लेती है .ऐसा भी हो सकता है कि कोई जनक्रान्ति दिखने में एकदम अराजक लगे पर उसके पीछे छिपी जनभावना प्रक्रिया की प्रष्ट भूमि में बदलाव के असली कारण छिपे होते हैं. अरब देशों में भडके जनाक्रोष से तानाषाहों की हिलती जडों ने भारत की शक्ति को भी सोचने को मजबूर कर दिया. चुने हुए तानाषाहों और सडे हुए भ्रष्ट सिस्टम के शिकंजे से देष को कैसे निकाला जाय यह अकुलाहट कमोवेष हर आमजन में जन्म ले चुकी थी. यही बजह थी कि कि दिल्ली के जन्तर-मन्तर में आमरण अनशन पर बैळे अन्नाहजारे के समर्थन में देष हर कोने में आमरण अनषन और कैन्डिल जुलूष षुरू हो गये थे. वैसे भारत में भी एक बडे आन्दोलन की सुगबुगाह्ट तो बहुत दिनो से चल रही थी. अस्तित्व और अस्मिता की लडाई,जल जंगल और जमीन बचाने की लडाई,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा देष को उपनिवेश बनाये जाने की लडाई किसी ना किसी रूप में चल रही थी. देश की जनता राजनीत और नेताओं को घ्रणा की द्दष्टि से देखने लगी थी. जनता समझ लगी थी की चुनाव से सिर्फ चेहरे बदलते हैं व्यवस्था नहीं.जितना गान्धीवादियों ने निराष किया था उतना ही निराश कमोवेश कमंडवादियों,समाजवदियों,साम्यवादियों और अम्बेडकरवादियों ने भी किया. गावों के किसान परिवारों से राजनीत में आये पासवान,लालू,मुलायम और मायावती जैसे नेताओं ने राजनीत और लोकतंत्र को अविष्वसनीय बना दिया.लोकतंत्र उनके लिए सिर्फ लूटतंत्र बन गया और देश की निरीह जनता उनकी बंधुआ मतदाता जिसके लिए किसी ना किसी चोर लुटेरे को चुनना उसकी मजबूरी बन गयी.भारतीय जनता पार्टी जितने जोरषोर से भ्रश्टाचार के खिलाफ भाशण देती है उतनी षिद्दत से भ्रश्टाचार में फंसे अपने नेताओं को बचाती भि है.कोई भी नेता कुछ अपवादों को छोड कर इस रजनैतिक यथास्थितवाद को खत्म नहीं करना चाहता है,क्यों कि हर किसी की इसी में भलाई है.सांसदों के भत्तों में बृध्दि हो सांसद निधि में बृध्दि सब एक साथ संसद में मेजें थपथपाते है. यही बजह है अन्ना की इस मुहिम में कुछ को छोड कर सभी राजनैतिक दल चुप्पी साधे है़ं.
आखिर क्या है क्रान्ति जिसकी हमें बार बार जरूरत पड्ती है.एक जन विरोधी व्यवस्था के खिलाफ जनता का गुस्सा जनाक्रोश और उस व्यवस्था को तत्काल बदलने की अकुलाहट को जनता की सरल भाषा में क्रान्ति कह सक्ते हैं. अर्थात पूर्वनिर्धारित मूल्यों का व्यापक मानवहित में पुनर्निधारण का नाम ही क्रान्ति है.व्यापक मानवहित में इस पुनर्निर्धारण में वे षक्तियां गतिरोध पैदा करती हैं जिनके स्वार्थ बाधित होते हैं. उदाहरण के कर्लिए सवर्ण जातियां कभी वर्णव्यवस्था समाप्त नहीं करना चाहती हैं क्योंकि ऊंचनीच की इस गैरबराबरी वाली सामाजिक व्यवथा में उनका स्वार्थ निहित है.क्रान्तियों के इतिहास को पलट कर देखें तो हर जनक्रान्ति अपने साथ बद्लाव की मंशा के साथ साथ बदलाव की पूरी रूपरेखा ले कर आती है.रोमनक्रान्ति से इटली का एकीकरण हुआ, अमेरिकी क्रान्ति से अमेरिका अजाद हुआ और 1789 में घटित हुई फ्रांसीसी क्रांन्ति ने स्वतंत्रता-समता-बन्धुत्व के नये स्वप्नों और नयी अवधारणाओं के साथ पूरी दुनियां में,दबे कुचले लोगों ने राजसत्ताओं की ओर अधिकार भरी निगाहों से देखना षुरू कर दिया था जिसने पूरी दुनिया में लोकशाही शंखनाद किया.गत 5 अप्रैल से 10 अप्रैल ( 2011 ) के बीच अर्थात पांच दिनों में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रश्टाचार के खिलाफ देष भर में उमडे जन सैलाब ने यह साबित कर दिया कि देश की पूरी व्यवस्था में कोई बहुत बडी गडबडी है जिसे जनता तत्काल निजात चाह्ती है.इस बात से सभी सहमत हैं कि भ्रष्टाचार सारी समस्याओं की जड है जो गत 60-62 सालों से देश को घुन की तरह चाट रहा है.कुछ लोग इसे संसदीय प्रक्रिया को चुनौती देने की बात कहते हैं. अंग्रेज भी हमारे स्वाधीनता आन्दोलन को कुछ इसी तरह से आरोपित कर हमारा दमन करता था पर हम कहां रुके.यद्यपि हमे जो आजादी मिली खंडित और अधूरी है़. डा़. अम्बेडकर की देष को संविधान सौपते वक़्त जो शंकाए थी वे पूरी तरह फलीभूत हो रही है.इस भ्रश्टाचार की आशंका उन्हे पूरी तरह थी.इसीलिए वे संविधान में दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं भूमि का राष्ट्रीयकरण और समान स्तरीय निशुलक शिक्षा व्यवस्था हेतु शिक्षा के राश्ट्रीयकरण लाना चाहते थे पर यह कह कर रोक दिया गया कि देश अभी इतना परिपक्व नहीं है.सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त सांमन्ती अवशेष भला क्यों ऐसा चाहेंगे जैसे आज भी अधिकाँश राजनैतिक द्ल लोकतंत्र के हिमायती तो अवष्य पर भ्रष्टाचार समूल नश्ट हो यह वे कथी नहीं चाह्ते.लोकशाही की खेती में वे भ्रष्टाचार की फसले कटते रहना चाह्ते हैं. डा. अम्बेडकर ने कहा था कि यह संविधनान तभी महत्वपूर्ण और देष के लिए उपयोगी सिध्द हो सकता है जब इसके संचालक देषभक्त,संवेदनशील,सदचरित्र और योग्य हों वरना यह महज कागज का एक पुलिन्दा और कुछ नहीं . उन्होंने यह भी कहा था कि यह देश सदियों से सामाजिक सांस्कृतिक अन्तर्विरोधों का देष रहा है और इन अन्तरविरोधों को हम अभी तक् दूर नहीं कर पाये हैं और हम विभिन्न विचारधाराओं वाले बहु दलीय लोकतंत्र में प्रवेष कर रहे हैं. अगर हम सचेत और सजग ना रहे तो यह लोक्तंत्र बच पायगा मुझे संदेह है. आज वही सब देख रहा है. भारत का लोकतंत्र जिसे हम दुनियां का सब्से बडा लोकतंत्र कहते हुए छाती ठोकते हैं वह इस देश के भ्रष्ट नेताओं,भ्रष्ट नौकरशाहों,पूंजीपतियों, कापोरेट घरानों और अपराधिक तत्वों का गळ््जोड है. यह वह लोकतंत्र् तो कतई नहीं जिसकी परिकल्पना करके संविधान लिखा गया था आमजन की जन इच्छा फलीभूत हो सके.सच यह यह घोर हताषा और निराषा की घडी है जहां जनता मन्अपने ही लोगोंके हाथों ळगी जा रही है. यह जनाक्रोश उसी का उबाल है.
अन्ना हजारे के अनषन की सफलता भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है. आन्दोलन ने संकेत दिया कि लोक्षक्ति सत्ता क झुका सकती है. अगर यह आन्दोलन विफल हो जाता तो ना जाने कितने देशवासियों का मन टूटता और ना जाने कितने युवक यह मान बैठते कि भ्रष्टाचार से निजात पाना सम्भव नहीं है. पर हमें इस आन्दोलन की इबारत के पीछे छिपी पूरी मंशा और आशय को समझना चाहिये जो सिर्फ जनलोकपाल विधेयक तक सीमित नहीं है. उसके एक व्यापक मायने और गहरे अर्थ हैं.कह्ने में हम भले ही हिचकें पर यह आन्दोलन जल,जंगल,जमीन और अपने अस्तितत्व के लिए लम्बे समय से लड रहे मावोवादियों की जन इच्छा को कहीं ना समाहित किये हुए है. अनशन की तरह शायद हथियार उळाना उनकी भी बेवशी ही है. नर्मदा आन्दोलन की गूंज भी इसमें भी इसमें समाहित है.इसमे संसद पर मुम्बई में हुए आतंकी हमले का दर्द और आक्रोश भी समाहित है. कुल इस आन्दोलन की इबारत चीख चीख कर यह रही है कि हमें शहीदों के सपनों का ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान और पूरी गरिमा के साथ जीने की सूनिश्चित गारन्टी हो.जिसमें सबके लिए समान स्तरीय निषुल्क षिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था की गारन्टी हो.रोजगार की सुनिष्चत् गारन्टी के साथ साथ भूख से ना मरने की भी गारन्टी हो. जात पात,ऊंच नीच और धर्म के भेदभाव जड से समाप्त किये जांय.मनरेगा और राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिषन जैसे रियायती कार्यक्रमों की जगह पूर्ण रोजगार और पूर्ण शिक्षा चिकित्सा गारन्टी कार्यक्रम चाहिए. यदि हमारी संसद, विधान सभाएं,न्यायपालिका,व्यव्स्थापिका,चौथा स्तम्भ यानी प्रेस और यहां तक कि संविधान भी आन्दोलन की मंषा के अपेक्षित व्यवस्था देने में सक्षम नहीं हैम तो हम इन्हें बदलेंगे.बेखौफ बदलेंगे,कितना भी दुरूह,दुश्कर,जटिल और कळिन क्यों ना हो. आाखिर आजादी की दो ढाई सौ वर्शोम की लडाई कम जटिल और दुरूह नहीं थीं.जरूरत पड्ने पर षहादतें भी दी जायेंगी पर फैज की जुबान में डेरे अब मंजिल पर ही पडेगे कट्ने को हमारे पास हांथ भी बहुत हैं और सर भी. आन्दोलन की इस इबारत को देश के हुक्मरान अच्छी तरह पढ लें.यह आन्दोलन महज अन्ना का नहीम पूरे देष का है जिसमें षामिल हर व्यक्ति अन्ना है.हमारी सजगता और सचेष्टता इसमें है कि हम इसे सम्पूर्ण क्राति की तरह अपहृत ना होनेदें.

कार्ल मार्क्स और उनका चिन्तन


( ५ मई जन्म दिवस पर विषेश ) भगवान स्वरूप कटियार
मार्क्सवादी विचारधारा के अस्तित्व में आने के बाद दुनियां मार्क्सावादी तथा गैरमाक्सर्वादी दो धु्रवीय विचारधारा में विभाजित हो गयी या यों कि कहें कि पूंजीवादी और गैरपूंजीवादी यानी समाजवादी.दुनिया के समृध्द और विकसित देष पूंजीवादी खेमें में एकताबध्द हुए जिसके मुखिया अमेरिका और इंग्लैण्ड जैसे षक्ति सम्पन्न देष बने और तीसरी दुनिया के गरीब देषों का नेतृत्व तत्कालीन सोवियतसंघ यानी रूस ने संभाला जो मार्क्सवादी चिन्तन को हथियार बना कर अक्तूबर क्रान्ति के जरिये पूंजीवाद और सामन्तवाद के खिलाफ एक ताकत बन कर उभरा था.सोवियत संघ के विघटन के बाद भले ही यह कहा जाने लगा हो कि दुनिया एक धु्रवीय हो गयी है पर सच्चई तो यह कि वैचारिक रूप से दुनिया आज भी दो धु्रवीय ही है और जब तक पूंजीवाद है, दुनिया दो धु्रवीय ही रहेगी. भले ही पूंजीवाद किसी भी षक्ल में क्यों ना हो .लैटिन अमेरिकी देषों में वामपंथ की बढती लहर इस बात का ज्वलन्त सबूत है .गत दिनों आयी वैश्विक मन्दी ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण की हवा निकाल कर रख दी और अन्ततः समाधान के लिए मार्क्सवाद की षरण जाना पडा और अर्थषस्त्रियों को मार्क्स की प्रसिध्द पुस्तक ”पूंजी“ के सफे पढने पढे. पूंजीवाद का जितना अच्छा अध्यय्न और विश्लेषण मार्क्स ने किया उतना और किसी ने अभी तक नहीं किया. मार्क्स ने उस नैतिक और सांस्कृतिक विध्वंस की ओर ध्यान दिलाया , पूंजीवाद जिसे अपने साथ लाता है. मार्क्स ने पूरे तर्कों के साथ बताया कि मनुश्य जब पहली बार शोषित वर्ग का सदस्य बनता है तो वह अपने मानवीय सारतत्व से वंचित हो जाता है और पुंजीवाद के अधीन वह अपने अन्दर समूची मानवता का विध्वंष होते देखता है. पूंजीवाद लालच और लालचियों के बीच लडी जाने वाली लडाई है जो संपूर्ण मानवजाति को अपने शिकंजे में जकड कर बाजार की अंधी ताकतों के रहमोंकरम पर छोड देती है. मनुश्य की मुक्ति के मुख्य आधार सृजनात्मक आत्मक्रियाषीलता को ,श्रम को और स्वयं मनुष्य को माल में तब्दील कर देता है. पूंजीवाद् मनुश्य को मनुश्य से अलग कर देता है .पूंजीवाद मनुश्यों के बीच सभी जेनुइन रिशतोंको तोड देता है और मनुष्यों के संसार को एक दूसरे के शत्रुओं के संसार में बदल् देता है।यह मनुश्य मनुश्य के बीच नंगे स्वार्थ , कठोर नगद भुगतान के अलावा रिष्ते का और कोई आधार नहीं छोडता.मानव- जीवन का हर पहलू खरीदने और बेचने की वस्तु बन जाता है.प्रेम, निश्ळा,ज्ञान, अंतरआत्मा,गुण आदि जो कभी संप्रेषित की जाती थीं लेकिन बदली नहीं जाती थीं,बेची खरीदी नहीं जाती थीं , सब बाजारू हो कर वणिज्य के क्षेत्र में प्रवेश कर जाती हैं. पूंजी सभी मानवीय और प्राकृतिक गुणों को बाजार में लाकर पराजित कर देती है. मार्क्स ने इस ओर खास तौर से ध्यान आकर्षित करते हुए आगाह किया कि हमारी शानदार संवेदनाओ के बदले पूंजीवाद सिर्फ अमूर्त संवेदना सम्पत्तिबोध को प्रस्तावित करता है जो मानवीय व्यक्तित्व का विध्वंश कर देती है, मनुष्य को लालची समाज की बीमारी से ग्रसित कर देती है.मनुष्य को उस असीम दरिद्रता में धकेला जाता है कि ताकि वह अपनी आन्तरिक संपत्ति को बाहरी दुनियां के हाथों सौंप सके. पूंजीवादी व्यवस्था में धनी व्यक्ति भी वास्त्विक जीवन से वंचित और अपनी अंतरआत्मा से अपंग दीन-हीन हो जाता है.जिसकी संपत्ति जितनी बडी होती है वह अंतरआत्मा के स्तर पर् उतना ही छोटा होता जाता है.उसने इस बात पर जोर दिया कि “निजी संम्पत्ति का अतिक्रमण ही सभी मानवीय संवेदनाओं और और गुणों की पूर्ण मुक्ति है़् .
जर्मनी के राइन प्रदेश प्रशा के त्रियेर नगर में ५मई १८१८ में एक यहूदी परिवार के वकील के घर में जन्में कार्ल मार्क्स ने अपने क्रान्तिकारी विचारों से दुनियां को सबसे अधिक प्रभावित किया.सामाजिक और आर्थिक चिन्तन के क्षेत्र में मार्क्स के बाद् एक युगान्तकारी परिवर्तन आना शुरू हुआ.चार्ल्स डार्विन और कार्ल मार्क्स ने दुनिया के बारे में सोचने ,समझने और देखने का नया नजरिया पेष किया. डार्विन ने मनुश्य की उत्पत्ति के विकास की वैज्ञानिक अवधारणा पेष की तो मार्क्स ने समाज की उत्पत्ति की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक अवधारणा पेश की.मार्क्स ने प्रतिपादित किया कि “दुनियां का संम्पूर्ण इतिहास वर्ग संघर्श का इतिहास है. अपने मित्र और जीवन के सहयात्री फ्रेड्रिक एंगेल के साथ लिखा गयी मशहूर पुस्तक कम्युनिस्ट घोशणा-पत्र1890 के दशक में आश्चर्यजनक ढंग से बेस्ट सेलर साबित हुई और बीसवीं सदी के आरम्भ में बीबीसी ने “ उन्हें सर्वकालिक महान दार्शनिक “ चुना।उन्होंने कहा कि “ दार्शनिकों ने केवल दुनियां की व्याख्या की है ,पर सवाल इसे बदलने का है“ यहीं से मार्क्स एक दार्षनिक से क्रान्तिकारी विचारक में रूपान्तरित होने लगते हैं।मार्क्स के पिता हेनरिख मार्क्स पेशे से वकील और कुलीन यहूदी परिवार थे और उन पर फ्रांसीसी क्रान्ति का गहरा प्रभाव था।उन पर वाल्टेयर और रूसो का गहरा प्रभाव था और उन्होंने अपना धर्म बदल कर प्रोटेस्टेन्ट हो गये.कार्ल मार्क्स पर अपने पिता की गहरी छाप थी.उन्होंने लिखा है कि मेरे पिता का चरित्र निश्छल और निष्कपट था और कानून के क्षेत्र के प्रतिभावान हस्ती थे.मार्क्स की मां हेनिरिएटा हालैण्ड के एक घरेलू परिवार की साधारण महिला थीं.१८३॰ से १८३५ तक मार्क्स त्रिएर के जिम्नेजियम में पढे.इसी समय मार्क्स का वैचारिक विकास प्रारम्भ हो चुका था जिसकी झलक उनके द्वारा “व्यवसाय के चयन पर एक तरूण के विचार“ विशय पर लिखे गये निबन्ध से साफ झलकती है.उन पर उनके पिता के मित्र लुडविग वान का भी प्रभाव थे जिसके कारण षुरू में उन्होंने कवितएं , नाटक और उपन्यास भी लिखे.षेक्सपियर उनके प्रिय लेखक थे. जेनी वान वेस्टफालेन लुड्विग की ही बेटी थी जिनसे मार्क्स बचपन से बेहद प्यार करते थे और १८४३ में जेनी मार्क्स की जीवन संगनी बनी.मार्क्स को मार्क्स बनाने में उनकी पत्नी जेनी,उनके मित्र फ्रेड्रिक एंगेल और उनकी घरेलू सहायक हेलेन की अहम भूमिका थी. अगर कहा जाय कि मार्क्स इन्हीं तीनों अवयवों का विकसित मिश्रण थे तो अतिशयोक्ति न होगा.
.१८३५ में मार्क्स ने बोन विष्वविद्यालय के विधि संकाय में दाखिला लिया.मार्क्स की दर्षन और् इतिहास में गहरी रुचि थी पर वह सिर्फ अकादमिक नहीं थी.उन दिनों की बहषों में महान दार्षनिक हेगेल का गहरा प्रभाव था.हेगेल पर फ्रांसीसी क्रान्ति का गहरा असर था और उनका मानना था कि मानवीय सभ्यता के न्यायपूर्ण विकास के लिए नये युग का सूत्र्ापात है.लेकिन जब मार्क्स हेगेल के विचारों से परिचित हुए तब तक हेगेल पूर्णरूपेण यथास्थितिवादी बन गये थे और वे यह मानने लगे थे कि “ईश्वर ही चेतना का सर्वोच्च प्रतीक है“.मार्क्स के लिए समाज को वर्गों के आधार पर समझने की प्रक्रिया का प्रस्थान विन्दु था.कार्ल मार्क्स ने “दर्षन की दरिद्रता“.“कम्युनिस्ट घोषणा पत्र “ तथा तीन खंडों में बृहद पुस्तक “पूंजी“ के अतिरिक्त अनेक महत्व्पूर्ण पुस्तकें लिखी तथा अनेक् महत्वपूर्ण अखबारों और पत्रिकाओं का संपादन किया।मार्क्स द्वारा लिखित पूंजी को सर्वहारा की बाइबिल कहा जाता है। उन्होंने “दुनियां के मजदूरो एक हो“ का नारा बुलन्द करते हुए कम्युनिस्ट इन्तरनेशनल का गळन किया। कम्युनिस्ट इन्तरनेशनल के लिए काम करते हुए उनके स्वास्थ पर गहरा असर पडा.२दिसम्बर १८८१ को उनकी जीवन संगनी जेनी का निधन हुआ.इसके कुछ दिन बाद उनकी बडी बेटी का निधन हो गया.मार्क्स के कुछ बच्चे लंदन में बचपन ही मर गये थे.१४ मार्च १८८३ को मार्क्स काम करते हुए अपनी कुर्सी पर हमेषा के लिए चिरनिद्रा में सो गये.इस महान क्रान्तिकारी चिन्तक के निधन से विष्व सर्वहारा की अपूर्ण क्षति हुई.वह कहा करते थे कि “सिर्फ और सिर्फ मानवता और मानव कल्याण के लिए काम करो“.उन्होंने अपार कश्ट और तकलीफे सही ,निर्वासन और गरीबी के थपेडे सहे पर उनके पांव नहीं डगमगाये . उनका अमर वाक्य “यह मनुश्य की चेतना नहीं होती जो उसके अस्तित्व का निर्धारण करती है,बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व होता है जो उसकी चेतना को निर्धारित करता है“ विश्व सर्वहारा की वैचारिक चेतना का सूत्र बन गया. आज कार्पोरेट पूंजीवाद ,उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जिन धारदार हथियारों के साथ हमारे सामने खडा है ,उससे लडने का एक ही हथियार हमारे सामने है कार्ल मार्क्स का सार्वभौमिक चिंतन यानी मार्क्सवाद.मार्क्सवाद की प्रासांगिकता आज पहले से अधिक है.

Friday, 15 April 2011

भारतीय रंगमंच में दलित चेतना


भगवान स्वरूप कटियार
भारतीय रंगमंच का इतिहास लम्बा और विविधतापूर्ण है.लोक जीवन में नाटक का उदभव श्रमिकवर्ग द्वारा अपनी लोक अभिव्यक्ति को संगीत और गायन के माध्यम से प्रकट करने से हुआ.यह कहना अतिषयोक्ति न होगा कि भारतीय सिनेमा भी भारतीय रंगमंच की कोख् से उपजा है.रंगमंच जनता के दुख-दर्द और सपनों- आकाक्षाओं को षिल्प के बन्धे बंधाए ढांचे को तोडते हुए नई अभिव्यक्ति देने की कोषिष करता रहा है.प्रसिध्द जनवादी सिने कलाकार बलराज साहनी कहते हैं कि आज जब हम मानवता की बात करते हैं तो प्रष्न उळता है कौन सी मानवता,किसे कला की सबसे अधिक आवष्यकता है,उनका कहना है कि मेरे विचार से कला की सबसे अधिक जरूरत उन्हें है जिनके पास खुषी के कोई साधन नहीं है,जो श्रम करते हैं,हल चलाते हैं,यदि उन्हें हम कुछ दे सकें तो कला की सार्थकता होगी.कहा जाता है कि हिन्दी का पहला नाटक 3ाप्रैल 1868 को ”जानकी मंगल” का मंचन वाराणसी के नाचघर (बनारस थियेटर) में किया गया था जिसमें भारतेन्दु जी ने लक्षमण की भूमिका निभाई थी. आज रंगमंच में विचार की कमी है. आज विजय तेन्दुलकर और बादल सरकार जैसे नाटककार हिन्दी रंगमंच के पास नहीं हैं. आज हिन्दी रंगमंच में पहली जैसी सामूहिकता नहीं दिखती,पहले जैसा जज्बा नहीं दिखता.एक समय था जब् महिलाओं के गहने गिरवी रख कर नाटक किये जाते थे,सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं था पर रंगमंच में सबकुछ था. आज सुविधाएं बढी हैं लेकिन रंगकर्मियों में जज्बा कम हुआ है.रंगमंच के माध्यम से सामाजिक सरोकारों के मुद्दे उळाये जाने की आवष्यकता है जिससे रंगमंच जनता की आवाज का सषक्त माध्यम बन सके.
भारतीय रंगमंच की षुरुआत और स्रोत के रूप में रामायण और महा भारत जैसे जिन दो महाकाव्यों का सबसे बडा योगदान है उनके रचयिता क्रमषः बाल्मीकि और व्यास दोनों ही दलित वर्ग से थे. इन दोनों महाकाव्यों में तत्कालीन समाज के हाषिए पर के लोग पूरे प्रभाव के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं.षबरी,केवट,जटायु तथा राम की तथाकथित वानर सेना जो तत्कालीन आदिवासी समाज था आादि चरित्र इतने प्रभावषाली हैं जो किसी राजा या रानी के चरित्र से ज्यादा प्रभाव डालते हैं.महा भारत में एकलव्य,हिडिम्बा,घटोत्कच,बर्बरीक यहां तक कि कर्ण जैसे चरित्र इतने प्रभावषाली हैं कि उनके सामने अन्य चरित्र गौड हो जाते हैं.इन दोनो महाकाव्यों के ये महत्वपूर्ण चरित्र दलित वर्ग के ही हैं और इसी कारण वे उपेक्षाओं और तिरिस्कार की पीडा सहते रहे हैं. यहीं पर चार वेदों से अलग नाट्य-षास्त्र की पांचवे वेद के रूप में परिकल्पना करना जिसे समाज के सभी वर्ग विषेश कर समाज का दलित वर्ग भी पढ सके एक महत्वपूर्ण उल्लेखनीय घटना है जिसकी रचना विषेश कर दलित वर्ग के लिये ही की गयी थी और इसीलिए एक लम्बे अरसे तक मंच पर अभिनय करने वाले लोग समाज के इन्हीं वर्गों के लोग थे. चाणक्य जैसे विद्वान ने इन नाट्य कलाकारों को नगर सीमा के भीतर अवास पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. मध्यकाल में जिस तरह के मौखिक, क्षेत्रीय और लोक रंगमंच का जन्म और विकास हुआ वह पूरी तरह से दलित वर्ग पर ही आश्रित था. इतना ही नहीं इन नाटकों के कथानक भी उनके अपने जैसे पात्रों से जुडे होते थे.दलित चेतना के स्तर पर रचना और रचयिता का रिष्ता और भी फैलता दिखाई देता है.भारतीय रंगमंच के पिछले देढ सौ वर्शों् के इतिहास में भारतेन्दु,जय षंकर प्रसाद ,उपेन्द्र नाथ अष्क,जगदीष चन्द्र माथुर गिरीष घोश जैसे नाटककार जो भले ही उच्च वर्ग में जन्म लेते हैं पर उनके नाट्कों में ऐसे प्रसंग हैं जो दलित चेतना और उसके आत्मसंघर्श को पूरी षिद्दत से प्रस्तुत करते हैं.सामाजिक परिवर्तन् की क्रान्ति और साहित्य में दलित विमर्ष की षुरुआत महाराश्ट्र प्रान्त से होती है. इसका मुख्य् कारण महाराश्ट्र प्रान्त की सामाजिक व्यवस्था रही है जिसने सामाजिक क्रान्ति के आन्दोलन और साहित्य में क्रान्तिकारी दलित विमर्ष की धारा को जन्म दिया और डा. भीमराव अम्बेडकर जैसे महान क्रान्तिकारी विचारक महाराश्ट्र में पैदा होते हैं.महाराश्ट्र में सबसे पहले दलित साहित्य लेखन की षुरुआत कहानियों,उपन्यासों, आत्मकथाओं और कविताओंसे होती है.कई बार तो लगता है जैसे संपूर्ण मराळी साहित्य दलित विमर्ष का ही साहित्य् है. यही कारण है कि दलित विमर्ष महाराश्ट्र के रास्ते पूरे भारत में फैलता है.विजय तेन्दुलकर के नाटक ”सखाराम बाइंडर”, ”कमला”,प्रेमानन्द गज्बी का नाटक ”महा ब्राह्मण” तथा ऊशा गंागुली का नाटक ”मैय्यत” दलित विमर्ष को प्रभाावषाली ढंग रेखांकित करते हैं और दलितों केे साथ हजारों-सैकडों साल से हो रहे सामाजिक- आर्थिक अत्याचारों और अन्याय को उघाड्ते हैं.दरसल विजय तेन्दुलकर ऐसे अकेले नाटककार हैं , जिनके नाटकों के ज्यादातर तथ्य और सन्दर्भ उन्हीं चरित्रों के भीतर से उद्घाटित होते हैं जिन्हे हम अछुत या दलित कहते हैं.पर ध्यान देने की बात यह है कि तेन्दुलकर के नाटकों में समाज में हाषिये के ये चरित्र दीन-हीन बनकर नहीं आते हैं बल्कि जुझारू और संघर्श कारते व्यक्तित्व के साथ प्रस्तुत होते हैं.”सखाराम बाइंडर” एक ऐसा ही चरित्र है जो अपनी षर्तों् पर जीवन जीता है और जीने में विष्वास रखता है.औरत,खान-पान,और सामाजिक मर्यादा कहीं कोई पर्दा नहीं है.एक दम बिन्दास और बेलौस खुलापन.यही बात उनके नाटक कमला के बारे में कही जा सक्ती है. नाटक में कमला का षुरुआती परिचय हमारे सामने बहुत ही सहमे हुए चरित्र के रूप में आता है पर जिस तरह से अन्त तक आते आते वह नायक जीवन के परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारण बनती है ,यह बहुत बडी बात है.प्रेमानन्द गजबी का”महा ब्राह्मण” एक अलग अन्दाज में दलित चेतना को रेखांकित करता है.नाटक का मुख्य पात्र है तो ब्राह्मण पर उनके वंष का मुख्य कार्य मृतकों के दाह संस्कार कराना है.इसलिए समाज में उसकी स्थिति हेय और निचले वर्ग जैसी है.लेकिन जब स्वयं उच्चवर्गीय परिवारों में मृतकों के दाह संस्कार की बात आती है ,तो बहुत ही रोचक ओर जटिल नाटकीय स्थिति का जन्म होता है जिसकी परिणिति उच्च वर्गीय ब्राह्मणों द्वारा उनके संपूर्ण स्वीकार्य में होती है.इसी प्रकार ऊशा गांगुली का नाटक ”मैय्यत” दलितों की जिन्दगी से जुडे बहुत से महत्वपूर्ण सवालों को एक अत्यन्त जटिल कथानक के भीतर से उघाड कर लाता है.इसी तरह कुछ और भी महत्वपूर्ण कृतियां हैं जिनके बारे में भी ध्यान देने की जरूरत है.हिन्दी साहित्य में महान उपन्यासकार प्रेमचन्द के घीसू माधव जैसे चरित्र सत्यजित रे की फिल्म ”सद्गति” का केन्द्रीय चरित्र हैं और मंत्र कहानी के बृध्द दम्पत्ति जो संाप काटने का इलाज झाड्फूंक से करते हैं.सन 1930 से 1940 के बीच बनी फिल्म् अछूत कन्या और 1950-60 के बीच बनी फिल्में ”देवदास,सुजाता, ओर कुछ हद तक प्यासा और दो बीघा जमीन भी दलित जो सच्चा मेहनतकष भी है की समस्याओं और संघर्शपूर्ण जीवन की सच्चाइयों को दिखातीं हैं.साहित्य में निराला के ”बिल्लेसुर बकरीहा” जो हैं तो ब्राह्मण पर दलित जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं और ”चतुरी चमार” जैसे छोटे छोटे उपन्यास बखूबी सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब करते हैं.फणीष्वरनाथ रेणु के उपन्यासों ”पंचलाइट”,”तीसरी कसम”,”रस प्रिया,” ”लाल पान की बेगम ”, ”और मैला आंचल ” में अनगिनित दलित चरित्र हैं.प्रेमचन्द के उपन्यास ”रंगभूमि” में सूरदास और ”गोदान” में गोबर और सिलया के प्रेम प्रसंगों को कैसे भुलाया जा सकता है.इन सारी रचनाओं ओर चरित्रों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि समाज इतिहास और साहित्य में दलित चेतना जैसी महत्व्पूर्ण पृवित्ति को अलग अलग द्वीप की तरह विवेचित और विष्लेशित नहीं किया जा सकता है.सभी विधाओं और माध्यमों मे लगभग एक साथ ऐसी चेतना का उदभव और विकास होता है.आज हम देख रहें हैं कि रजनीत में दलितों के उभार के साथ- साथ साहित्य ,कला और संस्कृति के क्षेत्र में आषातीत विस्तार हो रहा है. बेषक हमारा गलीज इतिहास दलितों के साथ षोशण, अन्याय और अपमान का वीभत्स चेहरा पेष करता है जो घिनौना भी है और डरावना भी. समाज के लोकतंत्रीकरण और राजनीतिककरण के बाबजूद उनकी आर्थिक-सामाजिक मुक्ति का सवाल ज्यों का त्यों खडा है. आज दलित वोट बैंक की राजनीत हो रही दलित की सम्पूर्ण मुक्ति की नहीं जो अम्बेडकर का सपना था और जिसके लिए अंबेडकर पूरी जिन्दगी लडे.वे रियायतें नहीं सम्पूर्ण मानवाधिकारों के लिए लड रहे थे. दलित वर्ग के लेखक आज नये तेवर और नये सौन्दर्यषस्त्र के साथ सामने आ रहे हैं . उम्मीद की जा सकती है कि उससे सामाजिक परिवर्तन् की राजनीत को नयी दिषा मिलेगी.

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Wednesday, 13 April 2011

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