Saturday, 19 February 2011

मिस्र में परिवर्तन के भारतीय सन्दर्भ




भगवान स्वरूप कटियार

उत्तरी अफ्रीकी देशों में जो कुछ भी हाल में घटित हुआ या घटित हो रहा है वह चौकाने वाला भी है और सावधान करने वाला भी. आष्चर्य इस बात का है कि दुनियां का सबसे बडा लोकतंत्र भारत जैसा देष आज भी इन घट्नाक्रमों से कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. आज यहां राजनेताओं को जनभावनाओं की ना तो कोई परवाह है और ना उसके प्रति को आदरभाव ही दिखता है . भारत की भी कमोबेश स्थिति वैसी ही है कि पूरा निजाम उलट दिया जाय. बिडम्बना यह है कि यहां चुने हुए तानाशाह हैं। भारत के राजनैतिक दलों में आन्तरिक लोकतंत्र नहीं जबकि लोकतंत्र की दुहाई देकर वे धनबल् और बाहुबल् के बूते संसद और विधान सभाओं के लिए चुने जाते हैं।काले धन की वापसी और की मुखालाफत में कोई भी दल खुल कर मैदान में नहीं आरहा है और जो दल थोडा बहुत बोल रहे है वे खुद भ्रष्टाचार में आकंळ डूबे हुए हैं इसलिए उनकी विश्वसनीयता ही जनता में नहीं रही.हमने अपने पडोसी देष नेपाल से सबक नहीं लिया जहां की जनता सामन्तवादी राजशाही के विरुध्द दस साल जंग लड्ती रही. हम उसे चीन की साजिष कहते रहे जबकि वह षुध्दरूप से न्याय,मुक्ति और मानवाधिकारों का जनयुध्द था जिसने राजशाही के निजाम को बदल दिया.हमारा नजरिया आज भी नेपाल के प्रति औपनिवेशिक है और इसीलिए भारत की हिन्दुत्ववादी ताकतों को नेपाल का बद्लाव हजम नहीं हो रहा है.भारत में आजादी के बाद 60-62 सालो़ मे़ं जो कुछ हुआ है वह अत्यन्त दुखद ,शर्मनाक और निन्द्नीय है.पूरी संवैधानिक व्यवस्था का अपराधीकरण हो गया.इसलिये भ्रष्टाचार के विरुध्द जैसै ही आवाज उळती है सब तिलमिलाने लगते हैं और गिरोह्बन्दी करने लगते हैं.उत्तर प्रदेश निधान सभा में विधायक निधि समाप्त करने के लिए लोकायुक्त की सिफारिश के विरुध्द सत्तापक्ष और विपक्ष की गिरोहबन्दी भ्रष्टाचार के पक्ष में राजनेताओं की मंशा को उजागर करती है.बिहार में नीतीश विधायकनिधि समाप्त कर देते हैं तब भाजपा विरोध नहीं करती और उत्तर प्रदेश में भजपा के विधायक् विधायकनिधि समाप्त करने का खुल्लमखुल्ला विरोध कर रहे हैं ,यह कैसा दोहरा चरित्र है,बिहार में सत्ता ना जाय और उत्तर प्रदेश में विधायकनिधि ना जाय.
उत्तर प्रदेश सरकार भी विधायकनिधि समाप्त करने के प्रति बहुत गम्भीर नहीं है.सरकार पूर्ण बहुमत में है.बिहार की नीतीष सरकार की तरह वह किसी दल पर निर्भर नहीं है.यदि उत्तर प्रदेश सरकार विधायकनिधि में ब्याप्त घोर भ्रष्टाचार के कारण इसे समाप्त करना चाहती है तो सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति की जरुरत है क्योंकि संगळित भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश सरकार का जगजाहिर है. अगर प्रदेश सरकार नगरनिगमों के मेयरों को सीधे चुने जाने से सम्बंधित कानून विधान सभा में पारित करा सकती है तो फिर विधायक् निधि समाप्त करने सम्बन्धी कानून पारित करने में क्या कळिनाई थी. सवाल सिर्फ साफ् मंशा और पक्के इरादे का
है जिसका प्रदर्शन सरकार ने मेयर वाले मुद्दे में किया.इस सम्पूर्ण विमर्ष से एक बात साफ निकल कर आती है कि इस देष को अब ना मुलायम चाहिए ना मायावती,ना पाशावान.ना लालू ना मोदी और चाहिए तो अब मनमोहन भी नहीं जो बेईमानी की पहरेदारी ईमानदारी से कर रहे हैं।पर हमें एक ऐसा नीतीश चाहिए जो भाजपा जैसी सांम्प्रदायिक पार्टी से ताल्लुक ना रखता हो साथ ही बिहार में भूमिस्वामित्व के जनोन्मुख कानून भूमाफियों के बगैर दबाव के बना सके.आशय साफ है कि इस देष को भ्रश्टाचार- अपराधमुक्त न्यायाधारित ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां हर कोई पूर्ण आत्मसम्मान मानवीय गरिमा से जी सके और जहंा किसी की तरह लाचारी और बेवशी ना हो. इस पाक इरादे के लिये जनता मिस्र और ट्यूनीशिया की तरह कैसे संगळित हो अंहिसक क्रांन्ति करे.यहां कळिनाई इस बात की है कि हम सब संगळित भारतीय नहीं हैं.हम धर्म और जातियों में विभाजित हैं,हम ऊंच- नीच और गरीब अमीर में बटे हैं.पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमने इसी रूप् में संगळित होकर ब्रिटिश साम्राज्य को ढ्हा दिया था.हालात खुदबखुद अपना रास्ता तलाश लेते हैं.उसी वक़्त का इंतजार इस देश की जनता को भी है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमने भी इसी तरह की अहिंसक लडाई 25 जून 1975 को लोकनायक जय्ाप्रकाष नारायण के नेतृत्व में लडी थी और एक पुख्ता निजाम को बदल दिया था.पर जो लोग पलट कर आये वे उनसे भी घटिया साबित हुए.डा़ अम्बेडकर का कथन बार बार याद आता है कि यह देष अपने आन्तरिक अन्तरविरोधों के कारण पतनषील हो जयेगा.कैसी बिडम्बना है कि गान्धीवादी गान्धी के ना हुए, अम्बेडकर्वादी अम्बेडकर के ना हुए.लोहियावादी लोहिया के ना हुए और जयप्रकाष के चेलों ने तो हद ही कर दी.
मिस्र में इस जन विद्रोह में अनेक विलक्षण तथ्य सामने आये जैसे कि पहला तो यह भ्रम टूटा कि इस्लामी देषों में जमूहरियत, आजादी और इंसानी हुकूकों और हकों के लिए इंक़लाब नही हो सकता. मिस्र की घट्ना सही मायने में लोकतंात्रिक चेतना का स्वतःस्फूर्त विस्फोट है जिसे वहां के नौजवानो ने अंजाम दिया. इसके लिए वे किसी नेतृत्व के मुहताज नही हुए.उन्होंने ना सिर्फ अपने को संगळित और अनुषासित रखा बल्कि लडाई को कमजोर नहीं होने दिया. अराजकता और तोडफोड से दूर पूरी तरह अंहिसक रहे और तभी वे अपने देष की जनता का विष्वास और भरोसा जीत कर उसे अपने पक्ष में खडा कर सके. यह एक बेहद मुष्किल काम था जो उन्होंने कर दिखाया. इतिहास गवाह है कि इंक़लाब हमेषा नौजवान ही लाया है. मिस्र में यह सबसे मुष्किल घडी है कि क्रान्तियां अक्सर फिसल जातीं हैं या फिर गलत ताकतें इसका नाजायज फायदा भी उळाती हैं. नौजवानों की जिम्मेदारी इस इंक़लाब की पहरेदारी और सही दिषा देने की भी है.
यह इसी वर्श 25 जनवरी से एक हफ्ता पहले की बात है कि मिस्र के चार नौजवानों ने भूख.बेकारी, जिल्लत से तंग आकर आत्मदाह कर लिया था .वे मरने का कोई और तरीका भी चुन सकते थे.जैसे वे जहर खाकर या नील,स्वेज,भूमध्यसागर में डूब कर मरने का रास्ता भी चुन सकते थे.पर उन्हे सिर्फ मरना भर नहीं था,यह मरण नहीं आत्मोत्सर्ग था एक निरंकुष सत्ता के विरुध्द जिसमें मनुश्योचित् गरिमा के साथ जीना संभव नहीं रह गया था. आत्मदाह की इस आग ने सबसे पहले 26 वर्शीय एक युवती अस्मा महफूज को स्पर्श किया.वह इस घटना से बेहद उद्वेलित हुई और् उसने फेसबुक पर लिखा कि वह वतन के अमनचैन और आज़ादी के लिए इस जालिम सत्ता को ललकारने अकेली तहरीर चौक जा रही है जिसे मेरे साथ आना हो आये, वह सिर्फ आधा घंटे में तहरीर चौक पहुंच् रही है. अस्मा ने वहां पहुंच कर सरकार के खिलाफ नारे लगाना षुरू किया.देखते देखते वहां भीड आना षुरू हो गयी. पुलिस वा भी आये और उसे एक इमारत में ले गये और उससे पूंछा कि यह् सब क्यों कर रही हो अस्मां का जबाब था कि वह यह सब अपने लोगों की आजादी और बेहतर जीवन के लिए कर रही है.उसने कहा कि वह इसके हश्र्से भी वाकिफ है. पुलिस वालों ने कहा हम इस सरकार से त्रस्त हैं.भीड ने अस्मा को पुलिस द्वार इमारत में ले जाने से रोक लिया. इंक़लाब का जन्म हो चुका था.25 जनवरी को काहिरा समेत सभी मिस्रवासियों को तहरीर चौक पहुचने की अपील की गयी. लाखों की भीड तहरीर चौक दो हफ्ते तक प्रदर्शन और नारेबाजी करती रही जिसके फलस्वरूप ब्यवस्था में कुछ फेरबदल भी किये गये पर जनता को मिस्र के तानाषाह हुस्नी मुबारक को कुर्सी से हटाये बगैर चैन नहीं था और अन्ततः वह हो के रहा और मुबारक को हटना पडा. मिस्र की सेना ने तहरीर चौक पर अपने लोगों पर बल प्रयोग से इनकार कर दिया. मुबारक के गुन्डे जनता के खिलाफ आाये तो मात खानी पडी. कुल मिलाकर लोकतंत्र के इस युग में दुनिया भर के लोगों के मन में यह बात साफ हो गयी है कि जो सरकार लोकतांत्रिक नहीं वह वैध भी नहीं है. पर भारत के सन्दर्भ में तो चुनी हुई वैध सरकारें तानाषाह से बदतर अवैध कार्य कर रही है. वास्तव में निरंकुषता केवल एकतंत्रीय षासन या सर्वसत्तावाद का प्रतिफल नहीं है.बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी बखूबी उभर सकता है.भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो यह साफ सााफ झलक रहा है. स्वतंत्रता मनुश्य मात्र की प्रथम और अन्तिम आवष्यकता है जिसकी गारंटी सिर्फ लोकतंत्र देता है.लोकतंत्र हर किसी की जरूरत है तो अरब या मिस्रवासियों की क्यों नहीं हो सकती है.पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के हिमायतियों इस बात के लिए भी सावधान रहना होगा कि लोकतांत्रिक षसन का कहीं दुरुपयोग ना हो जैसा कि भारत में पग पग पर पल पल में हो रहा है. मिस्र में जो कुछ हुआ या अन्य देषों जो कुछ हो रहा है उसका फायदा अरब की धार्मिक सत्ताएं भी उळाना चाहेंगी जबकि तहरीर चौक पर मुसलमान और ईसाई साथ साथ लडाई लड रहे हैं. रोटी आजाादी, नागरिक अधिकार उनकी साझ जरूरत है.इजराइल और इस्लाम की दुहाई देकर मुस्लिम तानाशाह बहुत दिनों तक बहला या मूर्ख नहीं बना सकते हैं.
जिस दिन हुस्नी मुबारक के जाने पर मिस्र में जष्न मना रहा था उसी दिन् अल्जीरिया की राजधानी में एक मई चौक् पर एक बडी तादात में वहां के नागरिक अपने देष के राष्ट्रपति अब्दुल अजीज के इस्तीफे की मांग कर रहे थे.इसी तरह बारह फरवरी को यमन की राजधानी माना में भी नागरिकों एक बडी तादात एकत्र हो कर राश्ट्रपति के इस्तीफे की मांग की. इंक़लाब की जो लपटें ट्यूनीषिया से उळीं वे पूरे अरब में फैल रहीं हैं.इजराइल और अमेरिका की चिन्तायें बढ रहीं हैं. एक अरब देष में पहली बार बगैर किसी विदेशी या सेना की मदद के केवल जन प्रतिरोध के बल पर एक तानाशाह निजाम का खात्मा किया है. इतिहासकारों को इंक़लाब के आगाज का अनुमान लगाना मुश्किल होता है.लेकिन अरब जगत में जो व्यापक विस्फोट हुआ है उसमें किसी अनुमान की गुंजाइश नहीं है. भारत का संसदीय लोकतंत्र पूरी तरह पतित और पथभ्रष्ट हो चुका है.संसद और विधान सभाओं में अपराधी और माफिया चुन कर रहे हैं.संासद निधि और काले धन के खिलाफ ज्यादतर दल चुप्पी साधे हुए .भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को लोकतंत्र की अपरिहार्य षर्त के रूप में स्वीकृत सा हो गया है.यह स्थिति अत्यन्त दयानीय और खतरनाक है. इसके पहले देश की जनता किसी इंक़लाबी मोड पर पहुंचे भारतीय लोकतंत्र संचालकों को जन भावनाओं और जनांकांक्षाओं को समझ लेना चाहिए.

Friday, 18 February 2011

तहरीर चौक से अस्मा महफूज की आवाज

भगवान स्वरूप कटियार


घरों के भीतर घुटन का धुआं
घरों के बाहर दहशत की आग
आखिर कहां है मेरे हिस्से का देश
जहां मैं खडी होकर सांस ले सकूँ.
देश मर रहा है और हम जी रहे हैं
बेवजह ,बेमक़सद .

अचानक नहीं होती है शुरू आत
नये जमाने की
कोई भी बदलाव पुराने के खात्मे के बाद ही आता है
नयी पौध पुराने पौधों की खाद पाकर ही पनपती और बडी होती है
हम एक ताजा शुरू आत कर सकते हैं
क्योंकि यही हमारे बस में है
और शायद वक्त के मुताबिक यही है
वाजिब और मुनासिब.

जानबूझ कर मरना कायरता नहीं होती
चाहे वह आत्महत्या ही क्यों ना हो
न्याय की ताकतें जब कमजोर पडने लगें
और भविष्य अंधेरे में डूबा दिखे
तब भी सोचा जा सकता है कुछ अलग
अजूबा.बेढंगा. अनगढ, अराजक
पर सच्चा और निश्चछल
जैसे हम खुद हैं.

मैने फेसबुक पर लिख दिया
मैं जा रही हूं तहरीर चौक अकेली
जिसको आना हो आये मेरे साथ
जब हम हजारों,लाखों, करोडों की तादात में
होंगे तो तानाशाह भी सुलगेगा अन्दर ही अन्दर
और जिन्दा मुर्दे भी दहक उळेंगे
हमारी आग की तपिश से.

मैं तहरीर चौक पर खडी आवाज दे रही हूं
आओ मेरे देशवासियो
बचाओ अपने देश को
तितलियों ,फूलों और खिलौनों से
खेलने वाले मेरे हाथों में आग का दहकता गोला है
लडकियां सिर्फ लडकियां नहीं होती
वे मशाल और चिनगारी भी बन जती हैं
और ळंडी हरी घास बन कर भी फैल जाती हैं
पूरी धरती पर विराट हरियाली के समन्दर की तरह्

Monday, 14 February 2011

किसानो का शोक गीत



भगवान स्वरूप् कटियार्

अब सब यह मान चुके हैं कि आजादी के बाद देश में शासन करने वालों की चमडी का सिर्फ रंग बदला है.शोषण का दमन चक्र पुराने ढांचे मे़ नये जुमलों के साथ यथावत जारी है.संवैधानिक मूल्यों को अनदेखा कर विकास के लिए गैरबरबरी को अनिवार्य मान लिया गया है.देष के विकास की परिधि से सात लाख गांवों को हांसिये पर धकेल दिया गया है.कृषि प्रधान भारत में जहां आज भी 60 फीसदी जनता का जीवन खेती पर निर्भर् है वहां खेती किसानी को अकुशल श्रम की श्रेणी मे रखा गया है.खेती किसानी में आज भीे श्रम का औसतन् मूल्य् 30-50 रुपये रोज है जबकि छळे वेतन आयोग के बाद साधारण कर्मचारी 400 रुपये रोज का हकदार है.सन 1948 में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र में कहा गया था कि मेहनत की हकदारी इतनी तो होनी चाहिए कि मेहनतकश और उसके परिवार का अच्छी तरह भरण-पोषण हो सके.पर उसी वर्श बने भारत के न्युनतम मजदुरी अधिनियम और बाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 43 मे़ मेहनतकष का जिक्र तो है लेकिन परिवार नदारद है. राश्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण परिवाार में औसतन पांच सदस्य माने गये हैं लेकिन हमारी सरकार चार सदस्यों को परिवार में षामिल करता है और उसमें भी दो बच्चों को एक वयस्क मान कर तीन् वयस्क सदस्यों को एक परिवर मान है.श्रम के मूल्य को निरन्तर दबा कर रखने के कारण खेती-किसानी घाटे का सौदा बानती गयी ।खेती लगातार घाटे का सौदा होते जाने के कारण किसान कर्ज मे़ डूबते चले गये और आत्महत्या के कगार पर पहुंच गये अब तक भरत में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं.दुनियां के किसी भी देश में किसानों ने इतनी आत्महत्याएं नहीं की है़.यह स्थिति दुनियां के सबसे बडे लोकतंत्र को शर्मशार करती है.खेती-किसानी के लिए कर्ज के कानूनों के तहत उस पर चक्रवृध्दि ब्याज नहीं लग सकता. .पर इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है और किसान लगातार चक्रबृध्दि ब्याज के दलदल मे फंसा हुआ है.इतना ही नहीं केन्द्र सरकार ने 1984 मे़ कम्पनी अधिनियम में संसोधन कर एक नयी धारा और जोड दी जिसके तहत किसान कर्ज की शर्तों को अदालत में चुनौती नही दे सकता. राष्ट्रीय कृषि नीति के तहत सन 2000 में खेती को घाटे का सौदा बताया ेंगया जबकि देश की अधिकांश जनता की अजीविका कृषि पर निर्भर् है.कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान कुल 18 फीसदी है जबकि 60 फीसदी जनता कृशि पर निर्भर है. कृषि क्षेत्र और गैर कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय के बीच बडी असमानता है। बिड्म्बना यह है कि खेती को घाटे का सौदा मानने के बाबजूद नीति निर्धारण में इसकी अनदेखी की गयी. कहना गलत न होगा कि किसान को लगातार गरीब बनाये रखने की साजिश सरकारों द्वार की जाती रही है.खेती किसानी के मामले में आजदी के तुरंन्त बाद से ही तात्कालिक राह्त की राजनीत चल रही है.उनके श्रम और तकनीकी कौशल का अवमूल्यन कर उनका गौरव चूर किया और फिर उसे खैरात का मुरीद बना दिया.इसी का नमूना है कि किसान के बच्चों को स्कूल में मिड डे मील के नाम पर कटोरा ले कर खडा कर दिया जाता है और उनके भीतर् शुरू से खैरात पर पलने वाले बोध को रोपा जा रहा है.देष का खाया पिया अघाया वर्ग् अपनी नजर मे़ं किसान की छवि हमेशा याचक् की रखता है.भारत की अपेक्षा अन्य देषों में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी बहुत अधिक है.भारत में प्रति किसान सब्सिडी 66 डलर है जबकि जापान में 26हजार् डालर, अमेरिका में 21 हजार डालर् और यूरोपीय देषों में 11 हजार डालर है. सरकारी आंकडों के मुताबिक 1947 में सकल राष्ट्रीय आय में खेती का हिस्सा 67 फीसदी था जो घट् कर वर्तमान् मे़ 18 फीसदी रह गया है जबकि इस बीच् खेती किसानी का उत्पादन लगभग चार गुना हो गया.इस चार गुना उत्पादन का तुलनात्मक् मूल्य एक चौथाई रह गया.और इसी बीच मानव श्रम का प्रति एकड उपयोग घट्कर एक तिहाई रह गया इन विसंगतियों पर सरकारों की चिन्तित होने की बात तो दूर सन् 2020तक सरकारी अनुमान के अनुसार उदारीकरण के इस विकास माड्ल के चलते सकल राश्ट्रीय आय में कृशि उत्पाद का हिस्सा 6 फीसदी रह जाये गा.खेती किसानी के मुद्दों पर 20सालों से आन्दोलनरत रहे बी डी षर्मा का कहना है कि राष्ट्र की कुल आय कृषि उत्पाद का हिस्सा घटते जाने का कारण सरकारी नीतियां हैं़ मेहनत के मूल्य में की गयी नीतगत कटौती के कारण सकल राश्ट्रीय आय में कृशी उत्पाद का हिस्सा होना स्वाभाविक है.इसका पहला और सब्से भारी असर खेती के उपज के समर्थन उसमे मूल्य पर पड्ता है.उसमें किसान के अपने परिवार के और मजदूरों के श्रम क मूल्य आधा तिहाई य उसासे भी कम आंका जाता है अगर मेहनत के मूल्य का सही आकलन किया जाय तो सकल राश्ट्रीय आय में कृषि उत्पाद के हिस्से में करीब 12 फीसदी की बृध्दि तत्काल हो सकती है . राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार खेती को घाटे का धंधा मान कर 27 फीसदी किसान् खेती करना नापंसन्द करते हैं तथा 40 फीसदी किसान विकल्प की स्थिति में कोई दूसरा रोजगार पसंद करें गे.पिछले चार दसकों में उपलद्ध प्रति व्यक्ति भू स्वामित्व 60 फीसदी घटा है.सन 1991 में शुरू हुई आर्थिक उदारीकरण की आंधी ने खेती के संकट को और गहरा दिया है.किसानों और प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करने वाले और उसी से जीवन यापन करने वाले समुदाय को कमजोर करने के हथियार के रूप में सेज,भूमि अधिग्रहण कानून,तथा बीज बिधेयक जैसे कानून बनाये जा रहे हैं.यह कानून जमीन पर कार्पोरेटी कब्जा करने का जरिया बन रहे हैं.इस कृषि प्रधान देश का किसान भला अपना और अपनी खेती का अस्तित्व कैसे बचा पाये गा.

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनसंघर्ष जरुरी




भगवान स्वरूप कटियार्

इतिहास गवाह है कि हर लडाई जनता को स्वंयं लडनी पड्ती है. आजादी की लडाई
की तरह यह लडाई हमें स्वयं लडनी होगी भ्रष्ट और दमनकारी सत्ता के खिलाफ है.यमन,ट्यूनीशिया तथा मिस्र में जो कुछ भी हो रहा है वह सब भ्रष्ट और दमनकारी राज्य सत्ता के खिलाफ जनता का एक परिवर्तनकामी संगळित आक्रोश है. भारत के कमोबेश सभी राजनैतिक दल भ्रष्टाचार पोषक हैं,इसीलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका रुख ढुलमुल है.कई राजनैतिक दल जैसे सपा,बसपा,राजद और रालोद आदि तो इस मुद्दे पर चुप्पी साध कर मानो यह कहना चाहते हैं कि लोकतंत्र और भ्रष्टाचार का चोलीदामन का साथ है इसिलिए दोनो साथ साथ चलते हैं.भ्रष्टाचार को विकास के लिए भी अनिवार्य शर्त के रूप मे स्वीकार कर लिया गया है. अगर हम इतिहास में झांक कर देखें तो कोई भी राजतांत्रिक व्यवस्था मौजूदा लोकतन्त्र की तरह भ्रष्ट नहीं रही।उनकी भी अपनी मर्यादायें थीं पर लोकतंत्र के चुने हुए प्रतिनिधियों ने तो लोकतंत्र की मर्यादाओं की सारी हदें पार कर दीं.विनायकसेन को गरीब आदिवासियों की सेव के लिए आजीवन कारावास दिया जाता है जबकि दो-दो बीघे के कास्तकार लालू,मुलायम,मायावती,पासवान आदि अरबो रुपयों के काले धन के मालिक देशभक्त बने हुए संसद,विधान सभाओं सरकार के मंत्रिमंडलों में छुट्टा घूम रहे हैं.भ्रष्ट राज्यसत्ता और भ्रष्ट नौकरशाही संविधान और कानून को ताक पर रख कर लगभग रोज ही बडे-बडे वित्तीय घोटाले और घपले करती है और देश की आन्दोलित जनता को कानून और मर्यादा की सीख देती है.केन्द्र सरकार ओर प्रादेश सरकारों को दुनिया भर में फैले जनाक्रोश के विस्फोट से सबक लेना चाहिए क्योंकि हिंसात्मक आन्दोलान जनता की वेवषी होती है।इसके पहले देश की निहत्थी किन्तु क्रन्तिकारी जनता अपने हकों की निर्णाय्ाक लडाई के लिए मैदान में उतरे सरकारों को अपना रुख और इरादे बद्ल लेना चाहिए ताकि हिन्दुस्तान में काहिरा का जन्म होने पाये। विभिन्न स्रोतों और रिपोर्टों के अनुसार 70लाख करोड रुपयों का काला धन विदेशों में जमां है.यह इतनी बड़ी राशि है कि साधारण आदमी इसका हिसाब नही लग सकता है.पर इसे यों समझा जा सकता है कि यदि इस काले धन को देश के गरीबों में बांट दिया जाय तो एक ही रात में 70करोड गरीब लखपति बन जायें गे.जरा सोचिये जो आदमी 20रुपये रोज पर गुजारा कर रहा है उसके हांथ में यदि एक लाख रुपये आजाते हैं तो वह क्या नहीं कर सकता है.फिर ना तो कोई आत्महत्या करेगा.जरा सोचिए कि अगर विदेशों में जमा १७० लाख करोड रुपया देश में वपस लौट आये उसे देश के उत्पादन क्षेत्र में निवेश कर रोजगार स्रजन किया जाय तो बेरोजगारी भी दूर होगी और उत्पादकता बढने के कारण अर्थ व्यवस्था भी सुद्दढ होगी. हमारा पैसा यानी देष का काला धन जो टैक्सचोरी और अपराधिक काले कारनामों से कमाया गया है सिर्फ स्विसबैंक ही नहीं जमा है बल्कि दुनिया के ७० देशों के बैंकों में जमां है.ये देश यद्यपि दिल्ली से भी छोटे हैं पर दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र् को बंधक बना रखा है.इन छोट-छोटे देशों की अर्थ व्यव्स्था इसी काले धन से चलती है.विश्व समुदाय को आज यह सोचने की परम आवश्यकता है कि आर्थिक अपराधों के इन अन्तरर्राश्टीय अड्डों को खत्म किये बगैर ना तो हम आतंकवाद से छुटकारा सकते हैं और न ही भूख तथा अंतरराश्टीय तनावे।लिष्टेंसटाइन,मोनेको,दुबई,वर्जिन आईलैण्ड तथा केमेन आईलैण्ड में अरबों खरबों का भारतीय काला धन जमा है.पूरी दुनिया काछुपा हुआ काला धन 12हजार अरब डालर आंका गया है. अकेले स्विटजरलैंण्ड में जमा काले धन में सबसे ज्याद भारत का है.रूस के 470 अरब,चीन के 96 अरब, यूक्रेन 100 अरब और भारत के 1456 अरब दालर जमा है.यानी सब मिला कर भी भारत के बराबर नहीं है.विश्व की कुल पूंजी का 57 प्रतिषत सिर्फ एक प्रतिषत लोगों के पास है।यह काला धन , तस्करी रिश्वत,लूट,चोरी,दलाली और धोखाधडी से कमाया हुआ होता है.टैक्स चोरी के लिये व्यापार का धन भी यहां जमां होता है.पर काले धन की संरक्षक ये बैंके सम्पूर्ण काले धन को कर चोरी(कर बचत) का पैसा मानतीं हैं जिसे उनका कानून अपराध नहीं मानता है.भारत सरकार भी कर चोरी को षायद अपराध नहिं मानती इसलिये उसने स्विटजरलैण्ड के उस लचर पचर समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये जो सिर्फ कर चोरी के मामले में मदद करने का आश्वासन देता है.इस समझौते का नाम दोहरे कराधान से बचाव का समझौता है.यानी कर चोरी को पूर्ण संरक्षण,कर् चोरों को दो दो बार टैक्स न भरना पडे इसकी चिंता भारत सरकार को है.ऐसी सरकारें भला काले धन वालों को क्यों बेनकाब कर दंडित करे गी.जर्मनी से हुई संधि में भारत सरकार ने कर चोरों के नाम चोरों के नाम छुपाने का वादा किया है .सरकार यह मिलीभगत साफ साबित करती है कि इस देषद्रोह के गोरखधंधे में देश के सफेदपोश राजनेता और नौकरषाह षामिल हैं.उच्चतम न्यायालय का कहना एकदम सही है कि सरकार अंतरराश्ट्रीय संधियों कि आड में इन काले धन के अपराधियों को बचाना चाहती है. आखिर इस देष को संसद चलाये गी या अंतरराश्ट्रीय सन्धियां. अपने राश्ट्रीय हितों के लिए कमजोर राश्ट्र भी युध्द तक की घोशणा कर देते हैं और हम हैं कि दोहरा कराधान समझौता तोडने में डर रहे हैं.जर्मनी ने 26 नाम दिये हैं ,उसके बाद वह नाम नहीं देगा,मत देने दे. अगर भारत सरकार देष के अन्दर ही काले धन के विरुध्द शख्ती वरते तो काले धन के खातेदारों के नाम अपनेआप पता चल जायेंगे. अगर अन्तरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किये बगैर हमारी संसद परमाणु हर्जाना कानून पारित कर सक्ती है तो कले धन वापसी कळोर कानून क्यों नहीं बना सकती.भारत सरकार का कुल सालाना कर संग्रह 7-8लाख हजार रुपये का है,जबकि इसका 10-12गुना विदेशी बैंकों में पडा है. अगर यह धन वापस आ जाय तो देष के नागरिकों को दस साल तक टैक्स ही ना देना पडे. अगर सरकार यह धन वापस नही लाती तो जनता को टैक्स देना बन्द कर देना चाहिए.भरत सरकार को उन देशों से राजनयिक सम्बंध खत्म करने पर भी सोचना चाहिए जो काले धन खातेदारों के नाम बताने से कतरा रहे हैं.संयुक्त्राष्ट्रसंघ ने 2003 में काले धन संम्बंधी जो भ्रष्टाचार विरोधी प्रस्ताव पारित किया था जिस पर भारत समेत 140देषों के हस्ताक्षर हैं. काले धन के अभियान में ये सभी देष भारत के साथ खडे होंगे बषर्ते भारत खुद भी हिम्मत दिखाये.यही काला धन हमारे चुनावों मेम इस्तेमाल होता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला करता है.इसी पैसे के बल पर दुनिया के तानाषाह अपना सीना ताने रहते हैं तथा यही धन आतंकवाद और तस्करी जैसे अपराधिक कृत्यों में इस्तेमाल होता है.यह कैसी बिडम्बना है कि लोक्तांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाली पष्चिमी दुनियां आर्थिक अपराधियों की ऐषगाह बनी हुई है. अगर अपने देष का काला धन वापस ले सकता है तो फिर दुनियां की महा आार्थिक षक्ति और सबसे बडा लोकतंत्र इतना लाचार क्यों है.पूंजी पलायन के विरुध्द 2003 में भारत सरकार ने काानून बनाया और 2005 में लागू भी कर दिया गया फिर भी सरकार काले धन के मामले में संकोच क्यों करती है. अगर विकीलीक्स ने खातेदारों के नाम खुलासा कर दिये तो हमारे लिये यह षर्म की बात होगी. अब समय आ गया है जब एकबध्द हो हम देषवासियों को देशद्रोहियों के विरुध्द एक अहिंसक जनयुध्द् षुरू करना चाहिए ताकि देष को बचाया जा सके.देष ब्चे गा तभी हम बचेगें.काले धन की संरक्षक ये विदेशी बैंकें काले धन कमाने वालों के लिए टैक्स हैवन्स हैं.ये टैक्स हैवन्स सिर्फ स्विटजरलैण्ड ही नही बल्कि छोटे-छोटे कैरबियाई देश केमैन आईलैण्ड,जिब्राल्टर चैनल आइलैण्ड,ब्रिटिश वर्जिन आईलैण्ड, मोनाको,लक्जमवर्ग,लिष्टेन्स्टइन एवं दुबई आदि हैं.ग्लोबल फैनेशियल इंटेग्रिटी के मुताबिक 1948 से2008 के बीच काले धन वालों ने भारत को 462 अरब डालर का चूना लगाया.जर्मनी के हेनिरिश कीबर के पास पूरी दुनिया के 1400 काले धन के खातेदारों की सूची है.कीबर आस्ट्रेलिया में कंही अंडरग्राउण्ड् है और इन्टरपोल को उसकी तलाष है,ट्रांसपैरेंसी इंटरनेषनल के अनुसार अब तक 115 ट्रिलियन डालर अर्थात 518 लाख करोड रुपये का काला धन विदेशों में जमा है .तमाम आयोगों और संसद की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 100लख करोड रुपये के काले धन की व्यवस्था देश में चल रही है. अमेरिका ने काले धन के खातों का पता लगा कर अपना पैसा वापस ले लिया फिर भारत क्यों झिझक रहा है. यह देश और समज से जुडा राजनैतिक और भावात्मक मुद्दा है.सरकार अगर इस मुद्दे पर गम्भीर और द्दढ नहीं दिखती तो लगातार संदेह गहराता जायेगा.इस मुद्दे पर जनता सरकार के साथ है नही तो जनता अपनी लडाई लडना बखूबी जानती है.